भारत की कृषि व्यवस्था में बागवानी अब केवल पूरक क्षेत्र नहीं, बल्कि किसानों की आय, पोषण सुरक्षा, रोजगार और कृषि-विविधीकरण का महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है। वर्ष 2024–25 में देश का कुल बागवानी उत्पादन दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार 367.72 मिलियन टन रहा, जिसमें लगभग 114.51 मिलियन टन फल और 219.67 मिलियन टन सब्जियाँ शामिल हैं। तीसरे अग्रिम अनुमान में कुल उत्पादन 369.055 मिलियन टन तक पहुँचने का अनुमान लगाया गया।
लेकिन इसी तेजी से बढ़ते क्षेत्र के सामने जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। वर्ष 2000–2025 के दौरान मौसम के आंकड़ों और हालिया वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि तापमान, वर्षा की तीव्रता और मौसमीय चरम घटनाओं में बदलाव बागवानी फसलों के उत्पादन तंत्र को प्रभावित कर रहा है। 2001–2025 की अवधि भारत के अधिकांश कृषि-जलवायु क्षेत्रों में 1951–2025 के रिकॉर्ड की सबसे गर्म 25-वर्षीय अवधि रही है।
2000–2025 में मौसम की बदलती तस्वीर
इस 26 वर्षीय अवधि में सबसे प्रमुख परिवर्तन तापमान वृद्धि का रहा। वर्ष 2024 भारत में 1901 के बाद सबसे गर्म वर्ष रहा, जब देश का औसत तापमान 1991–2020 के औसत से 0.65°C अधिक था। इसके बाद भी 2025 सामान्य से 0.28°C अधिक रहा और आठवाँ सबसे गर्म वर्ष दर्ज किया गया। वर्ष 2020 भी सामान्य से 0.29°C अधिक गर्म था और 1901 के बाद आठवाँ सबसे गर्म वर्ष रहा। उस वर्ष देश में वार्षिक वर्षा दीर्घकालीन औसत की 109% रही।
वर्ष 2025 में देश की वार्षिक वर्षा 1274 मिमी, अर्थात 1971–2020 के दीर्घकालीन औसत की 110%, रही। किंतु मौसमी वितरण अत्यंत महत्वपूर्ण है- शीतकालीन वर्षा केवल 52% LPA रही, जबकि प्री-मानसून, दक्षिण-पश्चिम मानसून और उत्तर-मानसून वर्षा क्रमशः 142%, 108% और 111% Long Period Average (दीर्घकालिक औसत) रही। यही अंतर बताता है कि केवल कुल वर्षा से कृषि जोखिम का आकलन नहीं किया जा सकता; वर्षा कब, कितनी तीव्रता से और कितने अंतराल पर हुई, यह अधिक महत्वपूर्ण है।
आम और लीची पर मौसम का सीधा प्रभाव
आम में पुष्पन, परागण और फल-स्थापन तापमान तथा नमी के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं। असामान्य गर्मी, अचानक वर्षा और आर्द्रता में उतार-चढ़ाव से बौर आने का समय, पराग की जीवनक्षमता और फल-स्थापन प्रभावित हो सकते हैं। ICAR के अध्ययनों में भी आम की फेनोलॉजी और पराग जीवनक्षमता को तापीय परिस्थितियों से जोड़कर देखा गया है।
फूल आने के समय वर्षा या तेज हवा होने पर मधुमक्खियों की गतिविधि और परागण प्रभावित होता है। वहीं उच्च तापमान फल झड़ने, सनबर्न तथा फल गुणवत्ता में गिरावट को बढ़ा सकता है। अधिक आर्द्रता में एन्थ्रेक्नोज, पाउडरी मिल्ड्यू और अन्य रोगों का जोखिम बढ़ता है।
लीची के लिए सर्दियों की पर्याप्त ठंड और उसके बाद अनुकूल तापमान पुष्पन के लिए महत्वपूर्ण हैं। ICAR के अनुसार उत्तरी भारत में लीची में फरवरी–मार्च का पुष्पन नवंबर–जनवरी की कम तापमान वाली अवधि से जुड़ा है। इसलिए सर्दी की अवधि और तापमान में परिवर्तन फूल आने के समय तथा फल-स्थापन को प्रभावित कर सकता है।
केला: गर्मी, जलजमाव और रोग का त्रिकोण
केला वर्षभर उगाई जाने वाली फसल होने के कारण मौसम परिवर्तन से लगातार प्रभावित होता है। अत्यधिक वर्षा और जलजमाव से जड़ों में ऑक्सीजन की कमी, जड़-सड़न और फ्यूजेरियम विल्ट जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं। दूसरी ओर लंबे शुष्क अंतराल में सिंचाई की कमी से पत्ती क्षेत्र, पौधे की वृद्धि और गुच्छे के आकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
गर्म एवं आर्द्र परिस्थितियाँ पत्ती धब्बा रोगों के विकास के लिए अनुकूल हो सकती हैं। विशेष चिंता Fusarium Wilt/TR4 जैसी मिट्टी एवं रोपण सामग्री से फैलने वाली बीमारी को लेकर है। मार्च 2026 में ICAR की केला विशेषज्ञ बैठक में भी रोगमुक्त एवं गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री तथा फ्यूजेरियम विल्ट प्रबंधन को प्रमुख प्राथमिकता के रूप में रेखांकित किया गया।
पपीता, अमरूद और अन्य फल फसलें
पपीते में अत्यधिक नमी जलनिकास खराब होने पर जड़-सड़न और फाइटोफ्थोरा जैसी समस्याओं को बढ़ा सकती है, जबकि लंबे सूखे काल में पौध वृद्धि और फल विकास प्रभावित होते हैं। अमरूद में अत्यधिक तापमान, अनियमित सिंचाई और वर्षा से फल फटना तथा सनबर्न जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं। नए उभरते फल, जैसे ड्रैगन फ्रूट, में भी गर्मी का प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है। ICAR-IIHR ने 2023–2025 के शोध के आधार पर ड्रैगन फ्रूट में अत्यधिक गर्मी से होने वाले सनबर्न को महत्वपूर्ण जलवायु-जनित समस्या बताया है।
सब्जियों में बढ़ता मौसमीय जोखिम
आलू में अधिक तापमान कंद निर्माण की अनुकूल अवधि को कम कर सकता है। टमाटर में अत्यधिक गर्मी से फूल एवं फल-स्थापन प्रभावित होते हैं, जबकि लगातार नमी और वर्षा ब्लाइट जैसे रोगों का खतरा बढ़ाती है। प्याज में अनियमित वर्षा, जलजमाव तथा उच्च तापमान बल्ब विकास और भंडारण क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।
मटर, गोभी, फूलगोभी तथा अन्य रबी सब्जियों में तापमान का समय से पहले बढ़ना फसल की अवधि घटा सकता है। दूसरी ओर अत्यधिक नमी में डाउनी मिल्ड्यू, पाउडरी मिल्ड्यू, ब्लैक रॉट और अन्य रोगों का दबाव बढ़ सकता है।
रोग-कीट प्रबंधन की नई चुनौती
जलवायु परिवर्तन केवल फसल वृद्धि को नहीं, बल्कि रोगजनकों और कीटों की जैविकी को भी प्रभावित करता है। गर्म एवं नम वातावरण कई फफूंदजनित रोगों के लिए अनुकूल होता है, जबकि गर्म और अपेक्षाकृत शुष्क परिस्थितियाँ थ्रिप्स, एफिड, जेसिड और सफेद मक्खी जैसे रसचूसक कीटों के प्रकोप को बढ़ा सकती हैं। Intergovernmental Panel on Climate Change (जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल ) के अनुसार एशिया में बढ़ता तापमान, वर्षा में परिवर्तन तथा चरम मौसम कृषि उत्पादकता, कीट-रोग और खाद्य सुरक्षा के प्रमुख जोखिम कारक बन रहे हैं।
अब समाधान भी मौसम आधारित होना चाहिए
बागवानी में भविष्य की रणनीति “मौसम देखकर प्रबंधन” पर आधारित होनी चाहिए। खेतों में वैज्ञानिक जलनिकास, वर्षाजल संचयन, ड्रिप एवं माइक्रो-सिंचाई, मल्चिंग और जैविक पदार्थों का उपयोग बढ़ाना होगा। जलवायु-सहिष्णु एवं रोगरोधी किस्मों तथा प्रमाणित रोगमुक्त रोपण सामग्री को प्राथमिकता देनी होगी।
रोग-कीट प्रबंधन में कैलेंडर आधारित अंधाधुंध छिड़काव के स्थान पर मौसम-आधारित पूर्वानुमान, नियमित निगरानी, जैव-नियंत्रण एजेंटों और समेकित रोग-कीट प्रबंधन (IDM/IPM) को अपनाना अधिक प्रभावी होगा। अत्यधिक गर्मी वाले क्षेत्रों में शेडनेट, पॉलिहाउस, एंटी-हेल नेट और अन्य संरक्षित खेती तकनीकों का विस्तार भी आवश्यक है।
आगे की राह
वर्ष 2000–2025 का अनुभव यह संदेश देता है कि समस्या केवल “तापमान बढ़ने” की नहीं है; वास्तविक चुनौती मौसम की अनिश्चितता और चरम घटनाओं की बढ़ती कृषि-जोखिम क्षमता है। 2025 में सामान्य से अधिक कुल वर्षा होने के बावजूद मौसम का असमान वितरण इस तथ्य को स्पष्ट करता है।
भारत में बागवानी उत्पादन लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इस उपलब्धि को बनाए रखने के लिए उत्पादन बढ़ाने के साथ जलवायु-लचीली बागवानी प्रणाली विकसित करनी होगी। मौसम पूर्वानुमान को खेत-स्तरीय सलाह से जोड़ना, वैज्ञानिक जल प्रबंधन, रोगमुक्त रोपण सामग्री, जैविक एवं एकीकृत रोग-कीट प्रबंधन तथा फसल बीमा को मजबूत करना समय की आवश्यकता है।
भविष्य की बागवानी का मूल मंत्र स्पष्ट है- “मौसम को केवल समझना नहीं, बल्कि मौसम के अनुसार खेती को बदलना होगा।” यही दृष्टिकोण किसानों की आय, फसल गुणवत्ता और देश की पोषण सुरक्षा को बदलती जलवायु के दौर में सुरक्षित रखने का आधार बनेगा।
अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख Dr. SK Singh द्वारा व्यक्तिगत हैसियत से लिखा गया है । इसका मेरे संस्थान जहाँ मैं वर्तमान मे कार्यरत हूँ से कोई संबंध नहीं है।
निष्कर्ष: वर्ष 2000 से 2025 तक के 26 वर्षों के आंकड़े यह स्पष्ट चेतावनी देते हैं कि कृषि और बागवानी के सामने असली संकट केवल तापमान बढ़ने का नहीं, बल्कि मौसम की तीव्र अनिश्चितता और चरम घटनाओं का है। भारत को अपनी 369 मिलियन टन की बागवानी उपलब्धि को सुरक्षित रखने के लिए अब पारंपरिक तरीकों से बाहर निकलकर “जलवायु-लचीली बागवानी” की ओर बढ़ना होगा। खेतों में ड्रिप सिंचाई, आधुनिक जलनिकासी, प्रमाणित रोगमुक्त रोपण सामग्री, शेडनेट और मौसम-आधारित कीट प्रबंधन को अपनाकर ही किसान अपनी आय और देश की पोषण सुरक्षा को सुरक्षित रख सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. पिछले 25 वर्षों में भारत के मौसम में क्या सबसे बड़ा बदलाव देखा गया है?
उत्तर: वर्ष 2001-2025 की अवधि 1951 के बाद से सबसे गर्म 25 साल की अवधि रही है, जिसमें वर्ष 2024 सबसे गर्म (+0.65°C) दर्ज हुआ। इसके अलावा कुल बारिश बढ़ने के बावजूद सर्दियों की बारिश में लगभग 48% की भारी कमी आई है।
Q2. सर्दियों की ठंड घटने से लीची की फसल पर क्या असर पड़ता है?
उत्तर: उत्तरी भारत में लीची में बेहतर पुष्पन के लिए नवंबर से जनवरी के बीच पर्याप्त ठंड की जरूरत होती है। ठंड कम रहने या तापमान बढ़ने से बौर आने और फल बनने की प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित होती है।
Q3. असामान्य गर्मी से आम की फसल को क्या नुकसान होता है?
उत्तर: अचानक तापमान बढ़ने से आम के पराग कणों की जीवनक्षमता घटती है, मधुमक्खियों द्वारा परागण बाधित होता है, बौर जल्दी झड़ने लगते हैं और फलों में सनबर्न की समस्या बढ़ जाती है।
Q4. ड्रैगन फ्रूट की खेती में अत्यधिक गर्मी से क्या समस्या आ रही है?
उत्तर: ICAR-IIHR के हालिया शोध के अनुसार, अत्यधिक गर्मी और सीधी तेज धूप से ड्रैगन फ्रूट के पौधों में गंभीर सनबर्न (तने का जलना) देखा जा रहा है, जिससे पौधे की बढ़वार रुक जाती है।
Q5. जलवायु परिवर्तन के दौर में किसानों को कीटनाशक छिड़काव में क्या बदलाव करना चाहिए?
उत्तर: किसानों को कैलेंडर आधारित अंधाधुंध छिड़काव छोड़कर मौसम-आधारित पूर्वानुमान, समेकित कीट प्रबंधन (IPM) और जैविक नियंत्रण एजेंटों को अपनाना चाहिए।
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प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह- विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी, पूर्व प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना एवं पूर्व सह निदेशक अनुसंधान, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर ( बिहार )
