वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारत के दलहन आयात में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। अप्रैल से जनवरी के बीच आयात मूल्य 35 प्रतिशत घटकर 2.97 अरब डॉलर रह गया है। मात्रा के आधार पर भी आयात में 18 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है। घरेलू उत्पादन में वृद्धि और पिछले साल के पर्याप्त भंडारण के चलते विदेशों पर निर्भरता कम हुई है।
फिलहाल पिछले साल के इसी अवधि के 60.1 लाख टन के मुकाबले इस बार 49 लाख टन दालें ही मँगाई गई हैं। पूरे साल के लिए कुल आयात 52 लाख टन रहने का अनुमान है, जो पिछले साल के 73 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर से काफी कम है। वैश्विक बाज़ार में कीमतों में आई नरमी ने भी इस गिरावट में योगदान दिया है। पीली मटर की कीमत 400 डॉलर से घटकर 300 डॉलर प्रति टन पर आ गई है। इसी तरह चने की कीमत 700 डॉलर से गिरकर 520 डॉलर प्रति टन तक पहुँच गई है, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत हुई है।
गौरतलब है कि भारत अब भी अपनी कुल दाल ज़रूरतों का 18 से 20 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, म्यांमार, ब्राजील और अफ्रीकी देश भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ता बने हुए हैं। यह आयात घरेलू बाज़ार में मांग और आपूर्ति के संतुलन को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। वर्ष 2024-25 में देश का कुल दलहन उत्पादन 256.8 लाख टन रहने का अनुमान है। इसमें चने की हिस्सेदारी सबसे अधिक 45 प्रतिशत है। इसके बाद मूंग 15 प्रतिशत, तूर 14 प्रतिशत और उड़द 8 प्रतिशत के साथ उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
सरकार मार्च 2026 के बाद भी तूर और उड़द पर शुल्क-मुक्त आयात जारी रख सकती है। हालांकि, पीली मटर पर 30 प्रतिशत और मसूर पर 10 प्रतिशत का आयात शुल्क बरकरार रहेगा। केंद्र सरकार अब ‘आत्मनिर्भर दाल मिशन’ और एमएसपी आधारित खरीद के जरिए घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है।
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