देश में कृषि क्षेत्र अब केवल मानसून के भरोसे नहीं, बल्कि विज्ञान के दम पर आगे बढ़ने को तैयार है। बढ़ते जलवायु जोखिमों के बीच खेती को सुरक्षित बनाने के लिए भारत ने पिछले एक दशक में लगभग 3,000 जलवायु-सहिष्णु फसल किस्में विकसित की हैं।
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, साल 2014 से 2025 के बीच भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने कुल 2,996 ऐसी किस्मों को अधिसूचित किया है, जो सूखे, बाढ़ और बढ़ते तापमान में भी टिकने की क्षमता रखती हैं। केवल बीजों में बदलाव ही काफी नहीं है, इसलिए सरकार जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों पर भी बड़ा दांव खेल रही है।
इसमें चावल की सीधी बुवाई, गेहूं के लिए जीरो टिलेज और फसल अवशेष प्रबंधन जैसी आधुनिक तकनीकें शामिल हैं। इन तकनीकों का सीधा उद्देश्य खेती की लागत घटाना और मिट्टी की नमी को बरकरार रखना है। इस पूरी मुहिम में ‘राष्ट्रीय जलवायु सहिष्णु कृषि नवाचार कार्यक्रम’ की भूमिका सबसे अहम रही है।
साल 2011 में शुरू हुए इस कार्यक्रम ने देश के खेती वाले जिलों का बारीकी से आकलन किया है। कुल 651 कृषि जिलों में से 310 जिलों को जलवायु परिवर्तन के लिहाज से ‘अत्यधिक संवेदनशील’ श्रेणी में रखा गया है। इन संवेदनशील इलाकों को सहारा देने के लिए 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 151 जिलों में “जलवायु सहिष्णु गांव” स्थापित किए गए हैं।
वर्तमान में ऐसे 448 गांव मौजूद हैं, जो पूरे देश के लिए टिकाऊ खेती के मॉडल के रूप में काम कर रहे हैं। राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन का मुख्य फोकस अब तीन स्तंभों पर टिका है: जल उपयोग दक्षता, मिट्टी की सेहत और टिकाऊ खेती प्रणालियाँ।
चूंकि जलवायु परिवर्तन का असर खेती पर लगातार बढ़ रहा है, इसलिए ये 3,000 किस्में और आधुनिक तकनीकें भारतीय किसानों के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच साबित होंगी।
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