आईसीएआर- भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के एक ताजा अध्ययन ने देश के किसानों और नीति-निर्माताओं के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, एल नीनो की परिस्थितियों ने भारत के कई जिलों में प्रमुख खरीफ फसलों की उत्पादकता पर गहरा घाव किया है।
शोध के आंकड़े बताते हैं कि एल नीनो वाले वर्षों में 77 जिलों में धान और 65 जिलों में मक्का की पैदावार में 10% से भी अधिक की गिरावट दर्ज की गई। यह गिरावट केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती है।
इसका सबसे घातक असर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, झारखंड और ओडिशा जैसे प्रमुख कृषि प्रधान राज्यों में देखा गया। इसके साथ ही ज्वार और बाजरा की पैदावार में भी दर्जनों जिलों में भारी कमी आई है, जिससे वर्षा आधारित खेती की संवेदनशीलता उजागर हुई है।
वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि जब प्रशांत महासागर की सतह का तापमान असामान्य रूप से बढ़ता है, तो भारत में मानसून कमजोर पड़ जाता है। यह मानसूनी अनिश्चितता हमारी वर्षा आधारित खेती को, जो पहले से ही जोखिमों से घिरी है, सीधे तौर पर निशाना बनाती है।
कृषि भौतिकी विभाग के प्रमुख सुभाष एन. पिल्लई का मानना है कि अब जिला स्तर पर ‘जलवायु अनुकूल’ योजनाएं बनाना अनिवार्य हो गया है। हाल के वर्षों में जिस तरह से उत्पादकता गिरी है, उसे देखते हुए अब हमें क्षेत्र विशेष की सटीक रणनीतियों पर ध्यान देना होगा। अध्ययन में जोरदार सिफारिश की गई है कि हमें सूखा सहनशील किस्मों के विकास को प्राथमिकता देनी चाहिए।
इसके साथ ही बेहतर कृषि परामर्श और प्रभावी जल प्रबंधन को अपनाकर ही हम मौसम के इस मिजाज से अपनी फसलों को बचा सकते हैं। यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब किसान अगले खरीफ सीजन की तैयारी में जुटे हैं। बढ़ते तापमान और मौसम के अनिश्चित जोखिमों को देखते हुए, खेती को ‘क्लाइमेट स्मार्ट’ बनाना अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन गया है।
निष्कर्ष: एल नीनो के कारण कमजोर पड़ते मानसून ने भारत की वर्षा आधारित खेती और खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर संकट पैदा कर दिया है, जिसके चलते देश के दर्जनों जिलों में धान, मक्का, ज्वार और बाजरा जैसी प्रमुख खरीफ फसलों की पैदावार में 10% से अधिक की भारी गिरावट आई है।
उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र जैसे प्रमुख कृषि प्रधान राज्यों पर इसका सबसे घातक असर पड़ा है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है। ऐसी स्थिति में अब जिला स्तर पर ‘जलवायु अनुकूल’ योजनाएं बनाना, सूखा सहनशील फसलों की किस्मों को बढ़ावा देना और खेती को ‘क्लाइमेट स्मार्ट’ बनाना कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारी अनिवार्य जरूरत बन चुका है।
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