मध्यप्रदेश सरकार की मंत्रि-परिषद बैठक में किसानों और जनकल्याण से जुड़ी कई बड़ी घोषणाएं की गईं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा जिस फैसले की हो रही है, वह है प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के लिए अगले 5 वर्षों हेतु 11,608 करोड़ रुपये से अधिक की स्वीकृति। सरकार इसे किसानों की सुरक्षा कवच बता रही है।
लेकिन किसानों के बीच सबसे बड़ा सवाल अब भी यही है कि क्या सिर्फ बजट मंजूर होने से खेती सुरक्षित हो जाएगी, या फिर बीमा व्यवस्था में जमीनी सुधार भी देखने को मिलेगा? प्रदेश में हर साल किसान मौसम की मार झेलता है। कभी ओलावृष्टि, कभी सूखा, कभी अतिवृष्टि, तो कभी बेमौसम बारिश पूरी मेहनत पर पानी फेर देती है।
किसान कर्ज लेकर खेती करता है, महंगे बीज खरीदता है, खाद और डीजल पर भारी खर्च करता है, लेकिन जब फसल खराब होती है तो उसकी उम्मीद सिर्फ बीमा योजना पर टिक जाती है। ऐसे में सरकार द्वारा 11,608 करोड़ रुपये की मंजूरी निश्चित रूप से एक बड़ा वित्तीय फैसला माना जा सकता है। लेकिन किसानों की असली चिंता सिर्फ राशि मंजूर होने की नहीं है।
असली चिंता यह है कि क्या बीमा का पैसा समय पर मिलेगा? क्या सर्वे पारदर्शी होंगे? क्या छोटे किसानों को भी वास्तविक नुकसान का मुआवजा मिलेगा? क्योंकि जमीनी स्तर पर किसानों का अनुभव कई बार बेहद निराशाजनक रहा है। अक्सर देखा गया है कि किसान प्रीमियम समय पर जमा कर देता है, बैंक खाते से राशि कट जाती है।
लेकिन जब फसल खराब होती है तो सर्वे में उसका नाम ही नहीं आता। कई किसानों को वर्षों तक मुआवजा नहीं मिलता, जबकि कुछ जगहों पर बिना नुकसान वाले क्षेत्रों में भी भुगतान हो जाता है। यही वजह है कि फसल बीमा योजना पर किसानों का भरोसा धीरे-धीरे कमजोर होता जा रहा है। सरकार ने इस योजना के लिए अगले पांच वर्षों तक भारी बजट स्वीकृत किया है।
इसका मतलब है कि राज्य सरकार खेती को जोखिम भरा क्षेत्र मानते हुए सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करना चाहती है। लेकिन यदि बीमा कंपनियां केवल प्रीमियम वसूलने तक सीमित रहीं और भुगतान के समय तकनीकी कारणों का सहारा लिया गया, तो यह पूरी योजना किसानों के लिए राहत की बजाय बोझ बन जाएगी।
आज किसान यह भी पूछ रहा है कि आखिर बीमा का लाभ वास्तविक जरूरतमंद किसानों तक कितनी ईमानदारी से पहुंचता है। कई बार गांव में पूरी फसल बर्बाद हो जाती है, लेकिन रिपोर्ट में नुकसान कम दिखा दिया जाता है। कहीं गिरदावरी समय पर नहीं होती, कहीं मोबाइल ऐप से फोटो अपलोड नहीं हो पाती, कहीं पोर्टल बंद हो जाता है और कहीं किसानों को जानकारी ही नहीं होती कि क्लेम कैसे करना है।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का उद्देश्य किसानों को प्राकृतिक आपदाओं से आर्थिक सुरक्षा देना था। लेकिन योजना का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब सर्वे प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो, पंचायत स्तर पर जवाबदेही तय हो और बीमा भुगतान समयबद्ध तरीके से सीधे किसानों के खातों में पहुंचे।
मध्यप्रदेश जैसे बड़े कृषि प्रधान राज्य में यह राशि बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यहां लाखों किसान खरीफ और रबी दोनों सीजन में मौसम पर निर्भर खेती करते हैं। खासकर सोयाबीन, गेहूं, धान, चना, सरसों और मक्का जैसी फसलों में मौसम की थोड़ी सी गड़बड़ी भी किसानों को भारी नुकसान पहुंचाती है।
ऐसे में बीमा योजना किसानों के लिए सुरक्षा कवच बन सकती है, लेकिन इसके लिए व्यवस्था को ईमानदारी से लागू करना होगा।सरकार ने बैठक में यह भी बताया कि जनकल्याण और विकास कार्यों के लिए कुल 30 हजार करोड़ रुपये से अधिक की स्वीकृति दी गई है। वृद्ध, दिव्यांग और महिला पेंशन के लिए 15,184 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं।
श्रमिक कल्याण योजनाओं, जल प्रदाय योजनाओं, लोक सेवा गारंटी और महिला एवं बाल सुरक्षा योजनाओं के लिए भी बड़ी राशि स्वीकृत हुई है। लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ आज भी किसान ही है। यदि किसान आर्थिक रूप से सुरक्षित नहीं रहेगा, तो गांव की अर्थव्यवस्था भी मजबूत नहीं हो पाएगी।
फसल बीमा योजना को लेकर सबसे बड़ी जरूरत यह है कि किसानों को सिर्फ आंकड़ों और घोषणाओं तक सीमित न रखा जाए। बीमा कंपनियों और प्रशासन की जवाबदेही तय हो। गांव स्तर पर नुकसान का सही आकलन हो। ड्रोन सर्वे और डिजिटल तकनीक का उपयोग किसानों की मदद के लिए हो, न कि क्लेम रोकने के लिए।
आज भी हजारों किसान ऐसे हैं जिन्हें पिछले वर्षों का बीमा क्लेम नहीं मिला। कई किसानों को यह तक पता नहीं होता कि उनका बीमा हुआ भी है या नहीं। बैंक खाते से प्रीमियम कट जाता है लेकिन पॉलिसी की जानकारी तक किसानों को नहीं मिलती। जब नुकसान होता है तब किसान दफ्तरों के चक्कर काटता रहता है।
यदि सरकार वास्तव में किसानों को सुरक्षा देना चाहती है तो सिर्फ बजट बढ़ाना काफी नहीं होगा। बीमा प्रक्रिया को सरल बनाना होगा। ग्राम स्तर पर सहायता केंद्र बनाने होंगे। बीमा क्लेम की निगरानी के लिए स्वतंत्र तंत्र बनाना होगा और सबसे महत्वपूर्ण बात, किसानों के साथ संवाद बढ़ाना होगा।
आज किसान यह पूछ रहा है कि क्या यह 11,608 करोड़ रुपये सिर्फ कागजों में खर्च होंगे या खेतों तक राहत बनकर पहुंचेंगे? क्या बीमा कंपनियों की जवाबदेही तय होगी? क्या फसल खराब होने पर किसान को समय पर मुआवजा मिलेगा? या फिर हर साल की तरह इस बार भी किसान सिर्फ इंतजार ही करता रह जाएगा?
खेती अब पहले जैसी सुरक्षित नहीं रही। लागत लगातार बढ़ रही है, मौसम अनिश्चित होता जा रहा है और बाजार का जोखिम अलग है। ऐसे समय में फसल बीमा योजना किसानों के लिए सबसे बड़ी उम्मीद बन सकती है। लेकिन यह तभी संभव है जब योजना का लाभ वास्तविक किसानों तक बिना भ्रष्टाचार, बिना देरी और बिना भेदभाव के पहुंचे।
अब देखना यह होगा कि मध्यप्रदेश सरकार द्वारा स्वीकृत यह हजारों करोड़ रुपये का बजट किसानों की जिंदगी में वास्तविक बदलाव लाता है या फिर यह भी सिर्फ सरकारी घोषणाओं तक सीमित रह जाता है।
यह भी पढ़े: पंजाब के खेतों में तेजी से फैल रही धान की बौनी बीमारी, सभी किस्मों पर संकट गहराया
जागरूक रहिए व नुकसान से बचिए और अन्य लोगों के जागरूकता के लिए साझा करें। कृषि लेख, सरकारी योजनाएं, कृषि तकनीक, व्यवसायिक एवं जैविक खेती से संबंधित सटीक जानकारियां प्राप्त करने के लिए जुड़े कृषि जागृति चलो गांव की ओर से या कृषि संबंधित किसी भी समस्या के जैविक समाधान के लिए WhatsApp करें।

मेरा नाम Anil Kumar Prasad है। मैं एक प्रगतिशील किसान हूं और पिछले 5 वर्षों से खेती की बारीकियों को धरातल पर सीख और समझ रहा हूं। ‘कृषि जागृति – चलो गांव की ओर’ के माध्यम से मैं अपने निजी अनुभव और खेती की सटीक जानकारी साझा करता हूं। मेरा उद्देश्य सरकारी योजनाओं, आधुनिक तकनीक और जैविक खेती के जरिए साथी किसानों को सशक्त बनाना है।
