धान किसानों के लिए इस समय एक बड़ी बहस खड़ी हो गई है। केंद्र सरकार द्वारा यूरिया की कमी के बीच धान की फसल में अमोनियम सल्फेट को विकल्प के रूप में इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है, लेकिन कई कृषि वैज्ञानिक इसे खतरनाक बता रहे हैं।
पूर्व कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि धान जैसी जलभराव वाली फसल में जरूरत से ज्यादा सल्फर पहुंचने पर जड़ों पर विपरीत असर पड़ सकता है, पौधे कमजोर हो सकते हैं और उत्पादन घट सकता है। असल सवाल यह है कि क्या यूरिया का पूरा विकल्प अमोनियम सल्फेट बन सकता है?
यूरिया में लगभग 46% नाइट्रोजन होती है, जबकि अमोनियम सल्फेट में करीब 21% नाइट्रोजन और 24% सल्फर होता है। यानी जितनी नाइट्रोजन यूरिया से मिलती है, उतनी पाने के लिए अमोनियम सल्फेट की मात्रा काफी ज्यादा देनी पड़ेगी। इसी के साथ खेत में सल्फर की मात्रा भी बहुत बढ़ जाएगी।
वैज्ञानिकों का तर्क है कि धान की फसल में सल्फर की जरूरत सीमित होती है। जरूरत से अधिक सल्फर जलभराव वाली मिट्टी में पौधों की जड़ों पर नकारात्मक असर डाल सकता है। इससे पौधों की बढ़वार रुक सकती है, पत्तियां कमजोर पड़ सकती हैं और पैदावार पर सीधा असर पड़ सकता है।
खासकर उन किसानों के लिए यह चिंता की बात है जो पहले से ही बढ़ती लागत, डीजल के दाम और मौसम की मार से परेशान हैं।दूसरी तरफ कुछ कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि अमोनियम सल्फेट पूरी तरह खराब विकल्प नहीं है। जिन मिट्टियों में सल्फर की कमी है या पीएच ज्यादा है वहां सीमित मात्रा में इसका फायदा भी हो सकता है।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब इसे यूरिया का सीधा विकल्प बताकर बड़े स्तर पर उपयोग करने की सलाह दी जाए। धान की खेती में हर खेत की मिट्टी अलग होती है, हर इलाके की जरूरत अलग होती है। इसलिए बिना मिट्टी जांच के किसी एक उर्वरक को सार्वभौमिक समाधान बताना जोखिम भरा हो सकता है।
आज सबसे जरूरी बात यह है कि किसान बिना वैज्ञानिक सलाह के अचानक पूरा खाद प्रबंधन न बदलें। अगर आपके खेत में पहले से सल्फर की पर्याप्त मात्रा है तो अमोनियम सल्फेट का अधिक प्रयोग नुकसान कर सकता है। वहीं जिन खेतों में सल्फर की कमी है वहां संतुलित मात्रा में इसका उपयोग फायदेमंद भी हो सकता है। इसलिए मिट्टी परीक्षण सबसे जरूरी कदम है।
धान की खेती में संतुलित पोषण ही सबसे बड़ा समाधान है। केवल नाइट्रोजन बढ़ाने से उत्पादन नहीं बढ़ता। फास्फोरस, पोटाश, जिंक, सल्फर और जैविक कार्बन का संतुलन भी उतना ही जरूरी है। लगातार सिर्फ यूरिया डालने से भी मिट्टी कमजोर होती है और पोषक तत्वों का असंतुलन बढ़ता है।
इसलिए किसानों को जैविक खाद, नीम कोटेड यूरिया, संतुलित एनपीके और सूक्ष्म पोषक तत्वों पर भी ध्यान देना होगा। सरकार की चिंता खाद की उपलब्धता और आयात संकट को लेकर हो सकती है, लेकिन किसानों की चिंता उत्पादन और मुनाफे को लेकर है। अगर गलत सलाह के कारण उत्पादन घटा तो सबसे बड़ा नुकसान किसान और देश की खाद्य सुरक्षा दोनों को होगा।
इसलिए जरूरी है कि कृषि विश्वविद्यालय, वैज्ञानिक और सरकार मिलकर क्षेत्रवार स्पष्ट गाइडलाइन जारी करें। किसान भाइयों, बिना पूरी जानकारी के किसी भी नई सलाह को आंख बंद करके लागू न करें। अपने कृषि विभाग, कृषि वैज्ञानिक या मिट्टी परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर ही उर्वरक का चुनाव करें।
क्या आपके इलाके में भी अमोनियम सल्फेट के इस्तेमाल की सलाह दी जा रही है?
आप धान में यूरिया ज्यादा इस्तेमाल करते हैं या दूसरे विकल्प भी अपनाते हैं?
निष्कर्ष: यूरिया के विकल्प के रूप में अमोनियम सल्फेट का अंधाधुंध और सार्वभौमिक (Universal) उपयोग धान की फसल के लिए फायदेमंद होने के बजाय नुकसानदेह साबित हो सकता है। यूरिया के मुकाबले अमोनियम सल्फेट में नाइट्रोजन की मात्रा आधी से भी कम (21%) होती है, जिसके कारण समान नाइट्रोजन पाने के लिए इसकी दोगुनी से अधिक मात्रा डालनी पड़ेगी।
इससे जलभराव वाले धान के खेतों में सल्फर (24%) का स्तर जरूरत से ज्यादा बढ़ जाएगा जो पौधों की जड़ों को कमजोर कर उत्पादन घटा सकता है। हालांकि, जिन मिट्टियों में पहले से सल्फर की कमी या पीएच (pH) मान अधिक है, वहां संतुलित मात्रा में इसका सीमित लाभ मिल सकता है।
अतः सरकार के खाद संकट प्रबंधन और किसानों की उत्पादन सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने के लिए, बिना मिट्टी परीक्षण (Soil Test) के पूरा खाद प्रबंधन बदलने के बजाय जैविक कार्बन, नीम कोटेड यूरिया और सूक्ष्म पोषक तत्वों के संतुलित पोषण को अपनाना तथा कृषि वैज्ञानिकों की क्षेत्रवार स्पष्ट गाइडलाइन के आधार पर ही निर्णय लेना सबसे सुरक्षित और वैज्ञानिक समाधान है।
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