₹266 की यूरिया बोरी का ₹4000 वाला गणित: जानिए इसके पीछे की पूरी सच्चाई

हमें लगता है कि यूरिया बहुत सस्ता है। किसान भाई 45 किलो की एक बोरी सिर्फ ₹266.50 में खरीद लेते हैं और अक्सर यही मान लेते हैं कि इसकी असली कीमत भी लगभग इतनी ही होगी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस एक बोरी के पीछे सरकार कितनी भारी सब्सिडी देती है? 45 किलो नीम लेपित यूरिया की बोरी की वास्तविक कीमत ₹4336 है, जबकि किसान को यह मात्र ₹266.50 में मिलती है। यानी एक बोरी पर भारत सरकार लगभग ₹4069.50 की सब्सिडी देती है।

दूसरे शब्दों में कहें तो किसान जो कीमत चुकाता है, उससे लगभग 16 गुना अधिक राशि सरकार वहन करती है। यही कारण है कि भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां किसानों को सबसे अधिक उर्वरक सब्सिडी दी जाती है। सरकार का उद्देश्य है कि किसानों को खेती के लिए आवश्यक नाइट्रोजन सस्ती दर पर उपलब्ध हो सके और उत्पादन लागत कम रहे।

लेकिन इस कहानी का दूसरा पक्ष भी है। जब कोई चीज बहुत सस्ती मिलती है तो उसका उपयोग अक्सर आवश्यकता से अधिक होने लगता है। पिछले कई वर्षों में कई क्षेत्रों में यूरिया का अत्यधिक उपयोग हुआ है, जिसके कारण मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा घटती गई, जिंक, सल्फर और बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी बढ़ी और कई खेत पोषण असंतुलन की समस्या से जूझने लगे।

यूरिया पौधों को नाइट्रोजन देता है, लेकिन केवल नाइट्रोजन से खेती सफल नहीं होती। फसल को फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर, जिंक और अन्य सूक्ष्म तत्वों की भी आवश्यकता होती है। यदि किसान केवल यूरिया पर निर्भर रहेंगे तो शुरुआत में फसल हरी-भरी जरूर दिखाई दे सकती है, लेकिन लंबे समय में उत्पादन, मिट्टी की गुणवत्ता और फसल की रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित हो सकती है।

आज जरूरत इस बात की है कि हम यूरिया को सस्ता खाद समझकर अंधाधुंध प्रयोग करने के बजाय संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाएं। मिट्टी परीक्षण कराएं, आवश्यकता के अनुसार खाद दें, जैविक पदार्थ बढ़ाएं और नाइट्रोजन के साथ पोटाश एवं अन्य आवश्यक पोषक तत्वों का भी संतुलित उपयोग करें।

याद रखिए, यूरिया सस्ता नहीं है। इसकी वास्तविक कीमत देश के करदाताओं और सरकार द्वारा दी जा रही हजारों करोड़ रुपये की सब्सिडी से चुकाई जा रही है। इसलिए इसका हर दाना सोच-समझकर और वैज्ञानिक सलाह के अनुसार ही उपयोग करें। आपके अनुसार किसानों को यूरिया पर सब्सिडी जारी रहनी चाहिए या संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए नई नीति बननी चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए।

निष्कर्ष यह है कि यूरिया पर दी जाने वाली भारी सरकारी सब्सिडी (वास्तविक कीमत ₹4336 के मुकाबले मात्र ₹266.50) किसानों को कम लागत में नाइट्रोजन तो उपलब्ध कराती है, लेकिन इसके अत्यधिक और असंतुलित उपयोग से मिट्टी की सेहत, जैविक कार्बन और सूक्ष्म पोषक तत्वों को भारी नुकसान पहुंच रहा है।

अतः समय की मांग है कि यूरिया को “सस्ता” समझकर अंधाधुंध इस्तेमाल करने के बजाय वैज्ञानिक तरीके से मिट्टी परीक्षण आधारित ‘संतुलित पोषण प्रबंधन’ अपनाया जाए, ताकि देश के संसाधनों और खेतों की उपजाऊ क्षमता दोनों को सुरक्षित रखा जा सके।

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