यूपी के किसानों पर दोहरी मार: हरदोई में जरीकेन में डीजल देने पर रोक, फार्मर रजिस्ट्री के कारण खाद वितरण प्रभावित

अगर आप किसान हैं और इस समय खरीफ की खेती कर रहे हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। धान की रोपाई और सिंचाई के सबसे अहम दौर में किसानों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। एक तरफ डीजल की उपलब्धता संकट बनी हुई है, तो दूसरी तरफ खाद की किल्लत और कालाबाजारी ने किसानों की चिंता कई गुना बढ़ा दी है।

खेती का हर दिन महत्वपूर्ण होता है। यदि समय पर सिंचाई, खाद और कृषि सामग्री उपलब्ध न हो, तो पूरी फसल प्रभावित हो सकती है। ऐसे में किसानों की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले से सामने आई रिपोर्ट के अनुसार, खरीफ सीजन के दौरान किसान सबसे ज्यादा डीजल और उर्वरकों की समस्या से जूझ रहे हैं।

धान की रोपाई के बाद खेतों में समय पर सिंचाई करना जरूरी है, लेकिन किसानों का आरोप है कि कई पेट्रोल पंपों पर जरीकेन, पिपिया या अन्य पात्रों में डीजल देने से इनकार किया जा रहा है। पंप संचालकों का कहना है कि नियमों के अनुसार डीजल केवल वाहन, ट्रैक्टर या पम्पसेट में ही भरा जा सकता है।

पम्पसेट को पेट्रोल पंप ले जाना असंभव, नियमों से बढ़ी व्यावहारिक समस्या

किसानों का कहना है कि यह नियम व्यवहारिक रूप से बड़ी समस्या पैदा कर रहा है। खेतों में लगे डीजल पम्पसेट को हर बार पेट्रोल पंप तक ले जाना संभव नहीं है। कई किसानों के खेत गांव से काफी दूर हैं। ऐसे में यदि जरीकेन में डीजल नहीं मिलेगा, तो सिंचाई प्रभावित होगी और धान की फसल पर सीधा असर पड़ेगा।

फार्मर रजिस्ट्री की अनिवार्यता और खाद वितरण में पारदर्शिता की कमी

दूसरी ओर खाद की स्थिति भी किसानों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। सहकारी समितियों पर लंबी-लंबी कतारें लग रही हैं। कई किसानों का कहना है कि घंटों लाइन में खड़े रहने के बाद भी उन्हें खाद नहीं मिल रही। कुछ किसानों के अनुसार फार्मर रजिस्ट्री अनिवार्य होने के कारण भी खाद वितरण में दिक्कतें आ रही हैं।

जिन किसानों की रजिस्ट्री पूरी नहीं हुई है, वे निर्धारित समय पर खाद नहीं खरीद पा रहे हैं। कई किसानों ने आरोप लगाया है कि खाद वितरण में पारदर्शिता की कमी दिखाई दे रही है। उनका कहना है कि वास्तविक जरूरतमंद किसानों की बजाय कुछ लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है। यदि ऐसे आरोप सही साबित होते हैं तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

प्रशासन के लिए जरूरी है कि वितरण प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी हो ताकि सभी पात्र किसानों को समय पर खाद मिल सके। जब सरकारी केंद्रों पर खाद उपलब्ध नहीं होती, तब मजबूरी में किसान निजी दुकानों का रुख करते हैं। इसी का फायदा उठाकर कुछ स्थानों पर अधिक कीमत वसूले जाने के आरोप भी सामने आ रहे हैं।

किसानों का दावा है कि निर्धारित मूल्य से अधिक कीमत पर यूरिया बेची जा रही है और कई जगह अतिरिक्त उत्पाद खरीदने का दबाव भी बनाया जा रहा है। यदि ऐसा हो रहा है, तो यह किसानों के आर्थिक हितों के खिलाफ है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। कुछ किसानों ने नकली या संदिग्ध गुणवत्ता वाली कृषि दवाओं और जिंक जैसे उत्पादों की बिक्री को लेकर भी चिंता जताई है। खेती में पहले से ही लागत लगातार बढ़ रही है।

यदि किसान को अधिक कीमत पर निम्न गुणवत्ता की सामग्री मिलेगी, तो उत्पादन और आय दोनों प्रभावित होंगे। इसलिए कृषि आदानों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है जितना उनकी उपलब्धता सुनिश्चित करना। किसानों का कहना है कि इस समय धान की फसल सबसे संवेदनशील अवस्था में है। यदि समय पर सिंचाई नहीं हुई या आवश्यक उर्वरक नहीं मिला, तो पौधों की बढ़वार रुक सकती है, कल्ले कम निकल सकते हैं और अंततः उपज में कमी आ सकती है।

खरीफ सीजन में कुछ दिनों की देरी भी कई बार पूरे उत्पादन पर असर डाल देती है। खेती केवल किसान का निजी काम नहीं है, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा से जुड़ा विषय है। यदि किसान को समय पर डीजल, खाद और कृषि सामग्री नहीं मिलेगी, तो इसका असर केवल एक किसान तक सीमित नहीं रहेगा।

उत्पादन घटने की स्थिति में बाजार, उपभोक्ता और पूरी कृषि अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इस स्थिति में प्रशासन और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। यदि कहीं कालाबाजारी, ओवररेटिंग या नकली कृषि सामग्री की शिकायतें मिल रही हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।

साथ ही जिन क्षेत्रों में खाद की कमी है, वहां अतिरिक्त आपूर्ति सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। इसी तरह यदि डीजल वितरण के नियमों के कारण किसानों को व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, तो प्रशासन को ऐसा समाधान तलाशना चाहिए जिससे नियमों का पालन भी हो और किसानों का काम भी बाधित न हो।

खेती के मौसम में छोटे-छोटे प्रशासनिक निर्णय भी लाखों किसानों को प्रभावित करते हैं। किसानों की यह भी मांग है कि कृषि विभाग नियमित रूप से खाद, बीज और कृषि दवा की दुकानों का निरीक्षण करे, अधिक कीमत वसूलने वालों के खिलाफ कार्रवाई करे और निर्धारित मूल्य पर सामग्री उपलब्ध कराना सुनिश्चित करे।

इससे ईमानदार दुकानदारों को भी लाभ मिलेगा और किसानों का भरोसा भी मजबूत होगा। यह समय किसानों को परेशान करने का नहीं, बल्कि उनका सहयोग करने का है। खरीफ सीजन के दौरान यदि समय पर आवश्यक संसाधन उपलब्ध करा दिए जाएं, तो किसान बेहतर उत्पादन देकर देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत बना सकते हैं।

लेकिन यदि समस्याएं लगातार बनी रहीं, तो इसका आर्थिक नुकसान किसानों के साथ-साथ पूरे कृषि क्षेत्र को उठाना पड़ सकता है।आपके क्षेत्र में खाद और डीजल की क्या स्थिति है? क्या आपको समय पर यूरिया, डीएपी या डीजल मिल रहा है, या आपको भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है? अपने जिले का नाम लिखकर अपना अनुभव जरूर साझा करें।

निष्कर्ष: हरदोई जिले से सामने आई यह रिपोर्ट साफ करती है कि कई बार कागजी नियम जमीनी स्तर पर अन्नदाता के लिए कितनी बड़ी मुसीबत बन जाते हैं। कालाबाजारी रोकने के नाम पर जरीकेन में डीजल बंद करना या फार्मर रजिस्ट्री के नाम पर खाद रोकना सीधे तौर पर धान की संवेदनशील फसल को सुखाने जैसा है।

प्रशासन को चाहिए कि वह नियमों को कड़ा करने के साथ-साथ किसानों की व्यावहारिक दिक्कतों का ‘सिंगल-विंडो’ या टोकन आधारित त्वरित समाधान निकाले। जब तक खेती के इस पीक सीजन में संसाधनों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा दोनों खतरे में रहेंगे।

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