देश का किसान आज ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां खेती करना पहले से कहीं अधिक महंगा हो गया है। हर सीजन की शुरुआत नई उम्मीदों के साथ होती है, लेकिन जैसे-जैसे खेत की तैयारी आगे बढ़ती है, किसान के सामने खर्चों की एक लंबी सूची खड़ी हो जाती है। डीजल महंगा, मजदूरी महंगी, बीज महंगे, कीटनाशक महंगे और अब सबसे बड़ी चिंता उर्वरकों की उपलब्धता और उनकी कीमत को लेकर सामने आ रही है। ऐसे समय में यदि यूरिया जैसी सबसे महत्वपूर्ण खाद की कीमत बढ़ती है या किसानों को पहले जितनी मात्रा नहीं मिलती, तो इसका सीधा असर खेती की लागत और किसान की आमदनी पर पड़ता है।
यूरिया बोरी का वजन 45 किलो से घटकर हुआ 40 किलोग्राम
पिछले कुछ वर्षों में किसानों ने एक बड़ा बदलाव देखा है। पहले यूरिया की बोरी 45 किलोग्राम की आती थी, लेकिन अब इसका वजन 40 किलोग्राम कर दिया गया है। यानी एक बोरी में पहले की तुलना में 5 किलोग्राम खाद कम हो गई। किसानों का कहना है कि यदि बोरी का वजन कम किया गया है, तो उसकी कीमत भी उसी अनुपात में तय होनी चाहिए। लेकिन यदि वजन कम होने के साथ-साथ कीमत भी बढ़ जाए, तो इसका बोझ पूरी तरह किसान के कंधों पर आ जाता है।
40 किलो यूरिया की बोरी का मूल्य ₹236 करने की मांग क्यों?
आज गांव-गांव में किसान यही सवाल पूछ रहा है कि जब खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, तब सरकार किसानों को राहत देने की बजाय उनकी लागत और क्यों बढ़ा रही है? किसान संगठनों और कई किसानों की मांग है कि 40 किलोग्राम यूरिया की बोरी का मूल्य ₹236 निर्धारित किया जाए ताकि प्रति किलोग्राम लागत पहले जैसी बनी रहे और किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े।
यूरिया कोई सामान्य खाद नहीं है। धान, गेहूं, मक्का, गन्ना, सरसों, सब्जियों और लगभग सभी प्रमुख फसलों में इसकी आवश्यकता होती है। यदि किसान को समय पर पर्याप्त मात्रा में यूरिया नहीं मिलता या महंगा मिलता है, तो फसल की बढ़वार प्रभावित होती है। कई बार किसान मजबूरी में बाजार से अधिक कीमत देकर खाद खरीदता है, जिससे उसकी लागत और बढ़ जाती है।
खेती में लाभ तभी होता है जब लागत नियंत्रित रहे। लेकिन आज स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत दिखाई देती है। किसान पहले खेत की जुताई करवाता है, फिर बीज खरीदता है, उसके बाद खाद, कीटनाशक, सिंचाई और मजदूरी पर लगातार खर्च करता है। इन सभी खर्चों के बाद यदि फसल का बाजार भाव भी उम्मीद के अनुसार नहीं मिलता, तो किसान के लिए खेती लाभ का नहीं बल्कि घाटे का सौदा बन जाती है।
कई किसानों का कहना है कि सरकार ने पहले यूरिया की बोरी का वजन कम कर दिया और अब यदि कीमत में भी वृद्धि होती है, तो यह किसानों के साथ न्याय नहीं होगा। उनका तर्क है कि यदि बोरी में 5 किलोग्राम खाद कम दी जा रही है, तो उसका मूल्य भी उसी अनुपात में कम होना चाहिए। यही कारण है कि कई किसान संगठन 40 किलो की बोरी का मूल्य ₹236 निर्धारित करने की मांग कर रहे हैं।
यूरिया की किल्लत: ई-टोकन और लंबी लाइनों की समस्या
आज किसान केवल कीमत की बात नहीं कर रहा, बल्कि उपलब्धता भी एक बड़ी समस्या बन चुकी है। कई राज्यों में किसान घंटों लाइन में लगकर खाद खरीदते हैं। कहीं ई-टोकन व्यवस्था लागू होती है, कहीं सीमित मात्रा में खाद दी जाती है और कहीं किसानों को आवश्यकता के अनुसार पूरी मात्रा नहीं मिल पाती। ऐसे में यदि कीमत भी बढ़ जाए तो समस्या और गंभीर हो जाती है।
खेती का पूरा चक्र समय पर निर्भर करता है। यदि धान की फसल में समय पर यूरिया नहीं मिली तो उसकी बढ़वार प्रभावित होती है। यदि गेहूं में पहली या दूसरी सिंचाई के समय खाद नहीं मिली तो उत्पादन कम हो सकता है। इसलिए किसान के लिए यूरिया केवल एक उत्पाद नहीं बल्कि उसकी पूरी फसल की उत्पादकता से जुड़ा हुआ विषय है।
फसलों के लिए नाइट्रोजन (यूरिया) का महत्व और वैज्ञानिक उपयोग
विशेषज्ञ भी मानते हैं कि नाइट्रोजन पौधों की वृद्धि के लिए सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्वों में से एक है। यूरिया नाइट्रोजन का प्रमुख स्रोत होने के कारण लगभग हर किसान इसका उपयोग करता है। लेकिन यह भी आवश्यक है कि इसका संतुलित और वैज्ञानिक उपयोग किया जाए। आवश्यकता से अधिक यूरिया देने से भी नुकसान हो सकता है, इसलिए किसानों को कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार ही खाद का प्रयोग करना चाहिए।
आज किसान यह भी चाहता है कि उसे समय पर खाद मिले, उचित मात्रा में मिले और उचित मूल्य पर मिले। यदि उसे पर्याप्त खाद उपलब्ध ही नहीं होगी, तो वह मजबूरी में निजी बाजार का सहारा लेगा, जहां कई बार अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। इससे खेती की लागत और बढ़ जाती है।
किसानों का कहना है कि सरकार यदि वास्तव में खेती को लाभकारी बनाना चाहती है, तो सबसे पहले उर्वरकों की उपलब्धता और उनकी कीमत पर ध्यान देना होगा। किसानों के लिए खाद उतनी ही आवश्यक है जितनी बीज और पानी। यदि इनमें से किसी एक की भी कमी हो जाए, तो पूरी फसल प्रभावित हो सकती है।
एक और चिंता यह है कि खेती की लागत बढ़ने के बावजूद किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य हमेशा नहीं मिल पाता। यदि एक तरफ लागत बढ़ती रहे और दूसरी तरफ फसल का उचित दाम न मिले, तो किसान आर्थिक संकट में फंस जाता है। यही कारण है कि किसान लगातार ऐसी नीतियों की मांग कर रहे हैं जिनसे खेती की लागत कम हो और उत्पादन लाभकारी बने।
किसानों का मानना है कि उर्वरकों की कीमत तय करते समय केवल उत्पादन लागत नहीं बल्कि किसानों की आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। देश का अधिकांश किसान छोटा और सीमांत किसान है, जिसके पास दो से पांच एकड़ तक ही जमीन है। ऐसे किसानों के लिए खाद की कीमत में थोड़ी सी वृद्धि भी बड़ा आर्थिक बोझ बन जाती है।
यूरिया की कालाबाजारी और वितरण प्रणाली में सुधार की आवश्यकता
इसके साथ ही किसानों की यह भी मांग है कि यूरिया की कालाबाजारी पर पूरी तरह रोक लगाई जाए। कई बार सरकारी केंद्रों पर खाद उपलब्ध नहीं होती लेकिन निजी बाजार में वही खाद अधिक कीमत पर मिल जाती है। ऐसी स्थिति में सबसे अधिक नुकसान किसान को होता है। यदि सरकार समय पर पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध कराए और वितरण व्यवस्था को पारदर्शी बनाए, तो ऐसी समस्याओं को काफी हद तक रोका जा सकता है।
कृषि क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। करोड़ों लोगों की आजीविका खेती पर निर्भर है। यदि किसान आर्थिक रूप से मजबूत होगा तभी कृषि मजबूत होगी और देश की खाद्य सुरक्षा भी सुरक्षित रहेगी। इसलिए किसानों से जुड़े ऐसे मुद्दों पर संवेदनशीलता के साथ निर्णय लेना आवश्यक है।
किसानों की मांग है कि 40 किलोग्राम यूरिया की बोरी का मूल्य ₹236 रखा जाए ताकि खेती की बढ़ती लागत पर कुछ नियंत्रण हो सके। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि किसानों को समय पर पर्याप्त मात्रा में यूरिया उपलब्ध हो, किसी प्रकार की कृत्रिम कमी न हो और वितरण प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी हो।
यह विषय केवल खाद की कीमत का नहीं बल्कि खेती की लागत, किसान की आय और देश की खाद्य सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। इसलिए आवश्यक है कि सरकार, कृषि विभाग, किसान संगठन और संबंधित सभी पक्ष मिलकर ऐसा समाधान निकालें जिससे किसानों को राहत मिले और खेती लाभकारी बन सके।
यदि आप भी मानते हैं कि किसानों को समय पर उचित मूल्य पर पर्याप्त मात्रा में उर्वरक मिलना चाहिए और खेती की लागत कम करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए, तो इस विषय पर जागरूकता फैलाना भी उतना ही आवश्यक है। एक जागरूक किसान ही अपने अधिकारों और वैज्ञानिक खेती दोनों को बेहतर ढंग से समझ सकता है।
निष्कर्ष: यूरिया की बोरी का वजन कम होने और खेती की लगातार बढ़ती लागत के बीच किसान संगठनों की यह मांग पूरी तरह व्यावहारिक प्रतीत होती है। देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले अन्नदाता के लिए यूरिया केवल एक खाद नहीं, बल्कि उसकी पूरी फसल का आधार है।
सरकार और कृषि विभाग को चाहिए कि वे वितरण प्रणाली में पारदर्शिता लाएं, ई-टोकन की समस्याओं को दूर करें और कालाबाजारी पर सख्त कदम उठाएं। यूरिया का मूल्य ₹236 निर्धारित करने और इसकी समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने से न केवल छोटे व सीमांत किसानों को बड़ी आर्थिक राहत मिलेगी, बल्कि देश का कृषि क्षेत्र भी मजबूत होगा।
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मेरा नाम Anil Kumar Prasad है। मैं एक प्रगतिशील किसान हूं और पिछले 5 वर्षों से खेती की बारीकियों को धरातल पर सीख और समझ रहा हूं। ‘कृषि जागृति – चलो गांव की ओर’ के माध्यम से मैं अपने निजी अनुभव और खेती की सटीक जानकारी साझा करता हूं। मेरा उद्देश्य सरकारी योजनाओं, आधुनिक तकनीक और जैविक खेती के जरिए साथी किसानों को सशक्त बनाना है।
