महंगे बीज की बुवाई के बाद सोयाबीन पर सूखे का संकट, दोबारा बुवाई से पहले अपनाएं ये वैज्ञानिक उपाय

कोटा जिले सहित राजस्थान के कई क्षेत्रों में इस खरीफ सीजन में किसानों को मौसम की दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। एक ओर किसानों ने लगभग 11,000 रुपय प्रति क्विंटल तक की ऊंची कीमत पर सोयाबीन बीज खरीदकर समय पर बुवाई की, वहीं दूसरी ओर बुवाई के बाद पर्याप्त वर्षा नहीं होने से फसल संकट में आ गई है।

शुरुआती अच्छी बारिश के बाद कई दिनों तक बारिश का लंबा अंतराल रहने से खेतों की नमी तेजी से कम हुई और अब कई स्थानों पर सोयाबीन की फसल सूखने की स्थिति में पहुंच गई है। खेती पूरी तरह मौसम पर निर्भर होने के कारण ऐसी परिस्थितियां किसानों की आर्थिक स्थिति पर सीधा प्रभाव डालती हैं।

सोयाबीन की फसल के लिए शुरुआती 15-20 दिन क्यों हैं महत्वपूर्ण?

सोयाबीन एक ऐसी फसल है जिसकी सफल स्थापना के लिए बुवाई के बाद शुरुआती 15 से 20 दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यदि इस अवधि में मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहे तो अंकुरण अच्छा होता है, जड़ें मजबूत बनती हैं और पौधे तेजी से बढ़ते हैं।

लेकिन यदि बुवाई के बाद लगातार 7 से 10 दिनों तक वर्षा न हो और तापमान अधिक बना रहे, तो अंकुरण कमजोर पड़ सकता है, पौधों की संख्या घट सकती है और कई स्थानों पर दोबारा बुवाई की आवश्यकता तक पड़ सकती है। यही कारण है कि इस समय किसान सबसे अधिक चिंता में हैं।

दोबारा बुवाई का निर्णय कब लें किसान? विशेषज्ञ की सलाह

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यदि खेत में पौधों की संख्या सामान्य से बहुत कम हो गई है या 40 से 50 प्रतिशत से अधिक पौधे नष्ट हो चुके हैं, तभी पुनः बुवाई पर विचार करना चाहिए। यदि खेत में पर्याप्त पौधे मौजूद हैं तो घबराकर तुरंत दोबारा बुवाई करना आर्थिक रूप से उचित निर्णय नहीं माना जाता। पहले खेत का निरीक्षण करें, मिट्टी में उपलब्ध नमी का आकलन करें और आगामी मौसम पूर्वानुमान को ध्यान में रखते हुए निर्णय लें।

सोयाबीन के खेतों में नमी संरक्षण (Moisture Conservation) के उपाय

जिन खेतों में अंकुरण हो चुका है, वहां नमी संरक्षण सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। खेत में अनावश्यक खरपतवार तुरंत हटाएं क्योंकि खरपतवार उपलब्ध नमी और पोषक तत्वों का बड़ा हिस्सा स्वयं उपयोग कर लेते हैं। हल्की गुड़ाई या इंटरकल्चर करने से मिट्टी की ऊपरी परत टूटती है, वाष्पीकरण कम होता है और जड़ों को बेहतर वायु मिलती है। इससे फसल को उपलब्ध नमी अधिक समय तक सुरक्षित रहती है।

यदि खेत में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है तो जीवनरक्षक सिंचाई (Life Saving Irrigation) देना फसल को बचाने में अत्यंत उपयोगी हो सकता है। बहुत अधिक पानी देने के बजाय हल्की सिंचाई करें ताकि जड़ क्षेत्र में नमी बनी रहे। जिन क्षेत्रों में सिंचाई उपलब्ध नहीं है, वहां खेत में अवशेष या जैविक मल्च का उपयोग भी नमी संरक्षण में सहायक हो सकता है।

सूखे के तनाव में कैसा हो पोषण प्रबंधन (Fertilizer Management)?

पोषण प्रबंधन के दृष्टिकोण से भी इस समय सावधानी आवश्यक है। अत्यधिक सूखे की स्थिति में अधिक मात्रा में नाइट्रोजन उर्वरकों का प्रयोग करने से बचना चाहिए क्योंकि पर्याप्त नमी के अभाव में पौधे उसका पूरा लाभ नहीं ले पाते। वर्षा होने के बाद ही आवश्यकता के अनुसार उर्वरकों का प्रयोग करना अधिक लाभदायक रहता है।

यदि पौधों में हल्का तनाव दिखाई दे और मौसम अनुकूल हो जाए तो कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार 19:19:19 या 20:20:20 जैसे जल में घुलनशील उर्वरकों का 1 प्रतिशत घोल (10 ग्राम प्रति लीटर पानी) का पर्णीय छिड़काव किया जा सकता है। इसी प्रकार 13:00:45 का 1 प्रतिशत घोल भी पोटाश की उपलब्धता बढ़ाकर पौधों को तनाव से उबरने में सहायता कर सकता है। किसी भी छिड़काव से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित रहेगा।

फसल में सूखे के लक्षण और कीटनाशकों के प्रयोग में सावधानी

यदि लंबे समय तक सूखा बना रहता है तो पौधों में पत्तियों का पीला पड़ना, वृद्धि रुकना, पत्तियों का मुरझाना तथा पौधों का सूखना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। ऐसे समय में बिना आवश्यकता बार-बार कीटनाशक या फफूंदनाशक का छिड़काव करने से बचना चाहिए, क्योंकि समस्या का मूल कारण नमी की कमी होती है, न कि हमेशा कीट या रोग। पहले खेत की वास्तविक स्थिति का आकलन करें और उसके बाद ही कोई निर्णय लें।

जलवायु परिवर्तन के कारण इस प्रकार की अनियमित वर्षा अब अधिक सामान्य होती जा रही है। कभी बहुत कम समय में अत्यधिक वर्षा और उसके बाद लंबे समय तक सूखा किसानों के लिए नई चुनौती बन गया है। ऐसी परिस्थितियों में केवल अच्छी किस्म का बीज खरीद लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि खेत की तैयारी, नमी संरक्षण, संतुलित पोषण, समय पर खरपतवार नियंत्रण और मौसम आधारित कृषि प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है।

यदि मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार अगले कुछ दिनों में अच्छी वर्षा होती है तो वर्तमान में तनाव झेल रही सोयाबीन की फसल काफी हद तक संभल सकती है। सोयाबीन में प्रारंभिक अवस्था का तनाव यदि बहुत अधिक न हो तो पर्याप्त वर्षा मिलने के बाद पौधे दोबारा सामान्य वृद्धि करने लगते हैं। इसलिए किसानों को घबराकर जल्दबाजी में खेत नष्ट करने या पुनः बुवाई का निर्णय लेने के बजाय वास्तविक स्थिति का आकलन करना चाहिए।

निष्कर्ष: महंगे बीज, बढ़ती खेती लागत, उर्वरकों और डीजल की कीमतों में वृद्धि तथा अनिश्चित मौसम ने किसानों की आर्थिक चुनौती को और बढ़ा दिया है। यदि समय पर वर्षा नहीं होती है तो केवल उत्पादन ही नहीं बल्कि किसान की पूरी निवेश लागत भी प्रभावित होती है। यही कारण है कि मौसम आधारित खेती, जल संरक्षण, सूखा सहनशील किस्मों का चयन और फसल बीमा जैसी व्यवस्थाओं का महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है।

इस समय सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसान अपने खेतों का नियमित निरीक्षण करें, मिट्टी की नमी बचाने के हर संभव उपाय अपनाएं, अनावश्यक खर्च से बचें और मौसम की स्थिति को देखते हुए वैज्ञानिक सलाह के अनुसार आगे की रणनीति बनाएं। उम्मीद है कि आगामी दिनों में अच्छी वर्षा होने पर सोयाबीन सहित अन्य खरीफ फसलों को नया जीवन मिलेगा और किसानों की मेहनत रंग लाएगी।

Frequently Asked Questions (FAQ)

Q. सोयाबीन की फसल में दोबारा बुवाई (Re-sowing) कब करनी चाहिए?

Ans. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सूखे या खराब अंकुरण के कारण खेत में 40 से 50 प्रतिशत से अधिक पौधे पूरी तरह नष्ट हो चुके हों, तभी दोबारा बुवाई का निर्णय लेना चाहिए। अगर खेत में पर्याप्त पौधे मौजूद हैं, तो जल्दबाजी में खर्च बढ़ाने के बजाय मौसम के अनुकूल होने का इंतजार करना बेहतर होता है।

Q. सूखे के तनाव (Water Stress) से सोयाबीन की फसल को बचाने के उपाय क्या हैं?

Ans. यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, तो फसल को तुरंत एक हल्की जीवनरक्षक सिंचाई (Life Saving Irrigation) दें। इसके अलावा खेत से अनावश्यक खरपतवारों को तुरंत साफ करें ताकि मिट्टी की बची हुई नमी केवल मुख्य फसल को मिले। बिना सिंचाई वाले क्षेत्रों में जैविक मल्च का प्रयोग भी नमी बचाने में सहायक होता है।

Q. क्या सूखे के समय सोयाबीन में यूरिया या अन्य रासायनिक खादों का प्रयोग करना चाहिए?

Ans. अत्यधिक सूखे या नमी की कमी की स्थिति में खेत में सीधे यूरिया या अन्य भारी नाइट्रोजन खादों को डालने से बचना चाहिए, क्योंकि पर्याप्त पानी के बिना पौधे इनका अवशोषण नहीं कर पाते। इसके विपरीत, मौसम थोड़ा अनुकूल होने पर जल में घुलनशील उर्वरकों जैसे 19:19:19 का 1% घोल बनाकर पत्तों पर छिड़काव करना अधिक फायदेमंद रहता है।

Q. सूखे के कारण सोयाबीन की पत्तियां पीली होने पर क्या कीटनाशक छिड़कना ज़रूरी है?

Ans. नहीं, हमेशा पत्तियां पीली होने का कारण कीट या बीमारी नहीं होती। लंबे समय तक सूखा रहने पर पौधे तनाव में आकर प्राकृतिक रूप से पीले पड़ने या मुरझाने लगते हैं। ऐसे समय पर बिना सोचे-समझे कीटनाशकों पर पैसा खर्च करने के बजाय खेत का बारीकी से निरीक्षण करें और मिट्टी में नमी का स्तर सुधारने का प्रयास करें।

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