प्रत्येक वर्ष 22 जुलाई को विश्व आम दिवस (World Mango Day) मनाया जाता है। यह दिवस केवल फलों के राजा आम के स्वाद का उत्सव नहीं है, बल्कि इसकी जैव विविधता, पोषण, आर्थिक महत्व, सांस्कृतिक विरासत और किसानों की आजीविका के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर भी है। भारत विश्व का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है और वैश्विक उत्पादन में लगभग 40 से 45 प्रतिशत योगदान देता है। देश में प्रतिवर्ष लगभग 2.5 से 2.8 करोड़ मीट्रिक टन आम का उत्पादन होता है।
बिहार भी देश के प्रमुख आम उत्पादक राज्यों में शामिल है। यहां के जर्दालू (GI टैग प्राप्त), मालदा, गुलाबखास, लंगड़ा, किशनभोग, चौसा और दशहरी जैसे आम अपनी विशिष्ट मिठास, सुगंध और गुणवत्ता के कारण देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी लोकप्रिय हैं। बदलते मौसम, जलवायु परिवर्तन और बाजार की नई चुनौतियों के बावजूद बिहार का आम आज भी अपनी मिठास और पहचान बनाए हुए है।
बिहार: आम की समृद्ध जैव विविधता और प्रमुख किस्में
बिहार में 250 से अधिक स्थानीय एवं उन्नत आम की किस्में पाई जाती हैं, जबकि लगभग 25 से 30 किस्मों की व्यावसायिक स्तर पर खेती की जाती है। इनमें जर्दालू, मालदा (मालदह), दुदीहा मालदा, गुलाबखास, लंगड़ा, किशनभोग, फजली, चौसा, दशहरी, हिमसागर, बम्बई, सफेदा तथा सुकुल प्रमुख हैं।
इनमें भागलपुर का जर्दालू अपनी अद्भुत सुगंध, पतली गुठली, आकर्षक रंग और उत्कृष्ट स्वाद के कारण भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्राप्त कर चुका है। वहीं मालदा अपनी अधिक मिठास और कम रेशे के कारण उपभोक्ताओं की पहली पसंद है। गुलाबखास अपनी गुलाब जैसी सुगंध तथा लंगड़ा अपने विशिष्ट स्वाद के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है।
बिहार में आम उत्पादन की वर्तमान स्थिति
वर्ष 2025-26 में बिहार में लगभग 15.5 से 16.0 लाख मीट्रिक टन आम उत्पादन का अनुमान है। राज्य में लगभग 1.5 से 1.6 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में आम की खेती की जाती है। भागलपुर, दरभंगा, समस्तीपुर, वैशाली, मुजफ्फरपुर, पटना, बेगूसराय, पूर्वी एवं पश्चिमी चंपारण, कटिहार तथा पूर्णिया प्रमुख उत्पादक जिले हैं।
भागलपुर जर्दालू के लिए, जबकि दरभंगा-समस्तीपुर क्षेत्र मालदा एवं लंगड़ा के लिए विशेष पहचान रखते हैं। पटना की मंडियों में अधिकांश आम इन्हीं जिलों से पहुंचते हैं, जबकि मौसम के उत्तरार्ध में उत्तर प्रदेश से भी लंगड़ा, चौसा एवं दशहरी की आपूर्ति होती है।
2026 में मौसम बना सबसे बड़ी चुनौती
इस वर्ष फरवरी से मई के बीच मौसम में लगातार असामान्य उतार-चढ़ाव देखने को मिला। कई स्थानों पर सामान्य से अधिक तापमान, बीच-बीच में वर्षा, तेज हवाएं, उच्च आर्द्रता तथा कुछ क्षेत्रों में ओलावृष्टि जैसी परिस्थितियों ने आम की फसल को प्रभावित किया।
इन परिस्थितियों के कारण अनेक बागों में- मंजर झड़ना, फल सेट में कमी, छोटे आकार के फल, गुठली का अपेक्षाकृत बड़ा होना, फल के अंदर जेली सीड (Jelly Seed) की समस्या, फल गिरना, एन्थ्रेक्नोज एवं स्टेम एंड रॉट जैसी कटाई-पश्चात बीमारियों में वृद्धि जैसी समस्याएं देखने को मिलीं।
कई असिंचित क्षेत्रों में उत्पादन में 10 से 25 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई। हालांकि जिन किसानों ने समय पर सिंचाई, संतुलित पोषण, सूक्ष्म पोषक तत्वों का उपयोग तथा वैज्ञानिक रोग एवं कीट प्रबंधन अपनाया, उनके बागों में उत्पादन और गुणवत्ता अपेक्षाकृत बेहतर रही।
बिहार के आम की देश और विदेश में बढ़ती पहचान
आज बिहार का जर्दालू, मालदा और गुलाबखास दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, हैदराबाद तथा अन्य महानगरों में प्रीमियम फल के रूप में बिक रहा है। पिछले कुछ वर्षों में बिहार से खाड़ी देशों, नेपाल तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों में आम के निर्यात में निरंतर वृद्धि हुई है। वर्ष 2024-25 के दौरान राज्य से लगभग 2,235 मीट्रिक टन आम का निर्यात किया गया। बेहतर ग्रेडिंग, पैकेजिंग, शीत श्रृंखला (Cold Chain) और GI ब्रांडिंग के विस्तार से निर्यात की संभावनाएं और मजबूत हो रही हैं।
सरकार एवं कृषि संस्थानों की महत्वपूर्ण पहल
बिहार सरकार द्वारा आम विकास योजना, उच्च गुणवत्ता वाले पौधों का वितरण, पुराने बागों का कायाकल्प (Top Working), सूक्ष्म सिंचाई, किसान प्रशिक्षण, पैक-हाउस, कोल्ड-चेन तथा आम महोत्सव जैसे कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।
साथ ही डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा तथा राज्य के विभिन्न कृषि विज्ञान केंद्र किसानों को जलवायु-स्मार्ट बागवानी, रोग-कीट प्रबंधन, पोषण प्रबंधन, कटाई-पश्चात तकनीक तथा मूल्य संवर्धन संबंधी वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन के दौर में क्या करें किसान?
आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन आम उत्पादन की सबसे बड़ी चुनौती बनने जा रहा है। इससे निपटने के लिए किसानों को कुछ वैज्ञानिक उपाय अपनाने होंगे- स्वस्थ एवं प्रमाणित पौध सामग्री का चयन। संतुलित उर्वरक एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग।
ड्रिप सिंचाई एवं मल्चिंग जैसी जल संरक्षण तकनीकों को अपनाना। नियमित छंटाई (Pruning) द्वारा वृक्षों का उचित आकार बनाए रखना। समेकित रोग एवं कीट प्रबंधन (IPM) अपनाना। समय पर फल तुड़ाई तथा वैज्ञानिक कटाई-पश्चात प्रबंधन करना। प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन पर विशेष ध्यान देना।
भविष्य की अपार संभावनाएँ
यदि बिहार में GI ब्रांडिंग, आधुनिक पैक-हाउस, कोल्ड-चेन, ई-कॉमर्स विपणन, प्रसंस्करण उद्योग, निर्यात अवसंरचना तथा जलवायु-स्मार्ट बागवानी तकनीकों का विस्तार तेज गति से किया जाए, तो राज्य आने वाले वर्षों में देश के अग्रणी आम निर्यातक राज्यों में अपनी मजबूत पहचान स्थापित कर सकता है।
निष्कर्ष: विश्व आम दिवस हमें यह संदेश देता है कि आम केवल एक फल नहीं, बल्कि हमारी कृषि, संस्कृति, पोषण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की अमूल्य धरोहर है। किसानों, वैज्ञानिकों, उद्यमियों और नीति-निर्माताओं के संयुक्त प्रयासों से बिहार के आम की मिठास आने वाली पीढ़ियों तक बरकरार रह सकती है तथा यह राज्य की समृद्धि और वैश्विक पहचान का महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।
Frequently Asked Questions (FAQ)
Q. विश्व आम दिवस (World Mango Day) कब मनाया जाता है?
उत्तर: प्रतिवर्ष 22 जुलाई को विश्व आम दिवस मनाया जाता है।
Q. बिहार के किस प्रसिद्ध आम को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्राप्त है?
उत्तर: भागलपुर के प्रसिद्ध जर्दालू आम को उसकी अद्भुत सुगंध, मिठास और पतली गुठली के लिए GI Tag प्राप्त है।
Q. वर्ष 2025-26 में बिहार में कुल कितना आम उत्पादन का अनुमान है?
उत्तर: वर्ष 2025-26 में बिहार में लगभग 15.5 से 16.0 लाख मीट्रिक टन आम उत्पादन का अनुमान लगाया गया है।
Q. आम में ‘जेली सीड’ (Jelly Seed) और ‘एन्थ्रेक्नोज’ बीमारी का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर: फल विकास के दौरान बेमौसम बारिश, अत्यधिक तापमान, उच्च आर्द्रता और पोषक तत्वों के असंतुलन के कारण जेली सीड और फफूंदजनित एन्थ्रेक्नोज बीमारी बढ़ती है।
यह भी पढ़े: बिना इंटरनेट और सैटेलाइट हमारे पूर्वज कैसे लगाते थे बारिश का सटीक अनुमान? जानें प्रकृति के 10 अद्भुत संकेत
जागरूक रहिए व नुकसान से बचिए और अन्य लोगों के जागरूकता के लिए साझा करें। कृषि लेख, सरकारी योजनाएं, कृषि तकनीक, व्यवसायिक एवं जैविक खेती से संबंधित सटीक जानकारियां प्राप्त करने के लिए जुड़े कृषि जागृति चलो गांव की ओर से या कृषि संबंधित किसी भी समस्या के जैविक समाधान के लिए WhatsApp करें।

प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह- विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी, पूर्व प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना एवं पूर्व सह निदेशक अनुसंधान, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर ( बिहार )
