केला भारत की सबसे महत्वपूर्ण फल फसलों में से एक है और लाखों किसानों की आजीविका से जुड़ा है। वर्ष 2025-26 के द्वितीय अग्रिम अनुमान के अनुसार देश का कुल उद्यानिकी उत्पादन लगभग 377.78 मिलियन टन तथा फल उत्पादन लगभग 121.48 मिलियन टन रहने का अनुमान है। सरकार ने फल उत्पादन में अनुमानित वृद्धि के लिए केला सहित कई प्रमुख फलों के बढ़े उत्पादन को महत्वपूर्ण कारण बताया है।
केले के सामने उभरती नई चुनौती: Pyricularia Angulata और पीटिंग-ब्लास्ट रोग
इतने बड़े उत्पादन आधार के बीच किसी उभरते रोग का फैलना किसानों के लिए आर्थिक रूप से गंभीर हो सकता है। ऐसी ही समस्या है केले का पीटिंग एवं ब्लास्ट रोग, जिसका प्रमुख रोगकारक फफूंद Pyricularia Angulata है। यह रोग विशेष रूप से अधिक वर्षा और लंबे समय तक बनी रहने वाली नमी वाले क्षेत्रों में महत्व प्राप्त कर रहा है।
यह समझना जरूरी है कि भारत में यह रोग बिल्कुल नया नहीं है। वैज्ञानिक अध्ययनों में वर्ष 2014-15 के दौरान पूर्वी भारत में ऊतक-संवर्धित केले के पौधों पर ब्लास्ट तथा पकने की ओर बढ़ रहे फलों पर पीटिंग के लक्षण दर्ज किए गए थे और रोगकारक की पहचान आकृति-विज्ञान, डीएनए अनुक्रमण तथा रोगजनकता परीक्षण द्वारा P. Angulata के रूप में पुष्टि की गई थी।
2025-26 के वैज्ञानिक शोध: नेंद्रन और रस्थाली किस्मों पर रोग की पुष्टि
इस रोग का महत्व इसलिए और बढ़ गया है क्योंकि अक्टूबर 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन में केरल में नेंद्रन और रस्थाली किस्मों के ऊतक-संवर्धित पौधों पर मिले रोग की आणविक जाँच में भी Pyricularia Angulata की 99-100 प्रतिशत समानता की पुष्टि की गई। इसके बाद अप्रैल 2026 में प्रकाशित एक अन्य क्षेत्रीय अध्ययन में नेंद्रन केले के फलों पर पीटिंग रोग तथा उसके प्रबंधन पर विस्तृत परीक्षण सामने आया। इसलिए उत्तर और पूर्वी भारत के केला उत्पादक क्षेत्रों में भी असामान्य फल-धब्बों को केवल सामान्य दाग, कीट क्षति या सिगाटोका मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
कैसे पहचानें पीटिंग और ब्लास्ट: पत्तियों के झुलसाव से फलों पर गड्ढों तक के लक्षण
रोग केवल फलों तक सीमित नहीं है। इसके लक्षण पत्तियों, मध्य शिरा, पर्णवृंत, संक्रमण पत्ती यानी ट्रांजिशन लीफ, पुष्पदंड, बंच-डंठल तथा फलों पर दिखाई दे सकते हैं। प्रारंभ में पत्तियों पर छोटे भूरे, अंडाकार या आंख के आकार के धब्बे बनते हैं। अधिक अनुकूल परिस्थितियों में ये आपस में मिलकर पत्ती के बड़े हिस्से को झुलसा सकते हैं।
संक्रमित ट्रांजिशन लीफ तथा सूखे पुष्पीय अवशेष रोगाणु के महत्वपूर्ण स्रोत बन सकते हैं। फलों पर शुरुआत में छोटी लाल-भूरी गोलाकार बिंदियां दिखाई देती हैं। बाद में उनका मध्य भाग दबकर छोटे गड्ढे या पिट जैसा बन जाता है।
सामान्यतः ये धब्बे लगभग 4-7 मिलीमीटर के हो सकते हैं। गंभीर अवस्था में फल की बाहरी सुंदरता बुरी तरह प्रभावित हो जाती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि अनेक मामलों में संक्रमण मुख्यतः छिलके तक सीमित रहता है और गूदे तक नहीं पहुंचता, फिर भी दागदार फल बाजार में कम कीमत पाता है। कभी-कभी इसके लक्षण डायमंड स्पॉट, अन्य फल-धब्बों अथवा यांत्रिक चोट जैसे दिखाई दे सकते हैं; इसलिए असामान्य प्रकोप की स्थिति में प्रयोगशाला से पुष्टि कराना बेहतर है।
बारिश और नमी क्यों बढ़ाती है खतरा: बीजाणुओं का फैलाव और सूक्ष्म वातावरण
P. Angulata के संक्रमण में लगातार नमी, वर्षा और भीगी हुई पौध-सतह की महत्वपूर्ण भूमिका है। वर्षा की बूंदें रोगजनक बीजाणुओं को संक्रमित अवशेषों से स्वस्थ भागों तथा विकसित हो रहे बंच तक पहुंचा सकती हैं। पुराने अध्ययन में जुलाई-सितंबर की वर्षा अवधि में रोग की तीव्रता बढ़ने तथा शुष्क मौसम में नए संक्रमण में उल्लेखनीय कमी देखी गई थी।
अत्यधिक घनी फसल, अनावश्यक सकर, खेत में खराब वायु-संचार, जलभराव और संक्रमित पत्तियों तथा पुष्पीय अवशेषों को पौधे पर छोड़ना रोग के अनुकूल सूक्ष्म वातावरण बना सकता है।
रोकथाम में एकीकृत प्रबंधन सबसे प्रभावी
रोग दिखाई देने के बाद केवल फफूंदनाशक पर निर्भर होने के बजाय खेत में पहले से ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जिसमें रोग तेजी से न बढ़ सके।
1. स्वस्थ रोपण सामग्री चुनें
प्रमाणित एवं रोगमुक्त ऊतक-संवर्धित पौधों का उपयोग करें। नर्सरी में संदिग्ध पत्ती-धब्बों वाले पौधों को मुख्य खेत में लगाने से बचें।
2. खेत को हवादार रखें
अनुशंसित दूरी पर पौध लगाएं और अनावश्यक सकरों को समय पर हटाते रहें। सूखी, अत्यधिक संक्रमित पत्तियां और रोगग्रस्त अवशेष सावधानी से निकालकर नष्ट करें।
3. जल निकास सर्वोच्च प्राथमिकता हो
विशेषकर मानसून में पौधों के आसपास पानी का लंबे समय तक जमा रहना रोकें। सिंचाई ऐसी हो कि पत्तियां और बंच अनावश्यक रूप से देर तक गीले न रहें।
4. ट्रांजिशन लीफ और बंच प्रबंधन महत्वपूर्ण है
अप्रैल 2026 में प्रकाशित क्षेत्रीय परीक्षण में ट्रांजिशन लीफ हटाने के साथ बंच को पॉलीथीन कवर से सुरक्षित करने पर रोग सूचकांक नियंत्रण की तुलना में उल्लेखनीय रूप से कम पाया गया। यह परिणाम बताता है कि संक्रमण-स्रोत कम करना और फल को वर्षा-छींटों से बचाना प्रबंधन का महत्वपूर्ण गैर-रासायनिक उपाय हो सकता है।
5. रासायनिक नियंत्रण में ब्रांड नहीं,
सक्रिय तत्व और लेबल-क्लेम देखें। हाल के शोध में Tebuconazole 50% + Trifloxystrobin 25% WG के 0.14 प्रतिशत उपचार ने प्रयोगात्मक परिस्थितियों में अच्छा नियंत्रण दिया है। लेकिन इसे सभी क्षेत्रों के लिए स्वतः सामान्य सिफारिश नहीं माना जाना चाहिए। भारत में किसी भी फफूंदनाशक का प्रयोग उसी फसल और रोग के लिए करें जिसके लिए उसका CIB&RC/पंजीकृत लेबल-क्लेम, निर्धारित मात्रा और प्रतीक्षा अवधि लागू हो।
उदाहरणतः कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50% WP केले में लीफ स्पॉट और फ्रूट रॉट के लिए पंजीकृत उपयोगों में शामिल है, पर पीटिंग रोग के लिए स्थानीय वैज्ञानिक सलाह आवश्यक है।
6. नियमित निगरानी सबसे सस्ता बचाव
मानसून और अधिक आर्द्रता वाले महीनों में किसानों को सप्ताह में कम से कम एक बार नई पत्तियों, ट्रांजिशन लीफ, पुष्पदंड और विकसित होते फलों को ध्यान से देखना चाहिए। कुछ पौधों पर शुरुआती लक्षण मिलने पर तुरंत स्वच्छता, जलनिकास और बंच-सुरक्षा के उपाय अपनाना बड़े प्रकोप को रोक सकता है।
पीटिंग एवं ब्लास्ट रोग का सबसे बड़ा नुकसान कई बार उत्पादन घटने से अधिक फलों की बाजार-योग्यता और आकर्षक रूप में कमी के कारण होता है। इसलिए इसे केवल “फल पर दाग” समझकर उपेक्षित करना उचित नहीं है। समय पर पहचान, स्वच्छ रोपण सामग्री, बेहतर वायु-संचार, उचित जलनिकास, संक्रमण-स्रोतों की सफाई और वैज्ञानिक बंच प्रबंधन—इन सबको मिलाकर अपनाना ही सबसे टिकाऊ रास्ता है।
अस्वीकरण
यह लेख किसानों एवं कृषि से जुड़े हितधारकों की सामान्य वैज्ञानिक जानकारी के लिए Dr. SK Singh द्वारा व्यक्तिगत हैसियत से लिखा गया है। रोग की पुष्टि केवल तस्वीर अथवा एक-दो लक्षणों के आधार पर न करें।
फफूंदनाशक का प्रयोग संबंधित फसल एवं रोग के लिए वर्तमान CIB&RC पंजीकरण/लेबल-क्लेम, अनुशंसित मात्रा, प्रतीक्षा अवधि तथा राज्य कृषि विश्वविद्यालय/कृषि विज्ञान केंद्र/स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही करें। बिना लेबल-क्लेम के किसी उत्पाद या ब्रांड का प्रयोग न करें।
निष्कर्ष: केले की खेती में पीटिंग एवं ब्लास्ट रोग का सबसे बड़ा जोखिम उत्पादन की कुल मात्रा घटने से ज्यादा फलों की बाहरी गुणवत्ता और बाजार मूल्य में भारी गिरावट आना है। छिलके पर दिखने वाले 4 से 7 मिमी के छोटे गड्ढे कई बार पूरी फसल के मुनाफे पर पानी फेर देते हैं।
इसलिए इसे केवल साधारण मौसमी दाग या कीट क्षति समझने की भूल न करें। स्वस्थ टिश्यू-कल्चर पौधों का रोपण, खेत में बेहतर वायु-संचार, जल निकास का पुख्ता प्रबंध, ट्रांजिशन लीफ की छंटाई और बंच कवरिंग जैसे समन्वित प्रबंधन को अपनाकर किसान इस रोग के आर्थिक नुकसान से अपनी फसल को पूरी तरह सुरक्षित रख सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. केले में पीटिंग एवं ब्लास्ट रोग का मुख्य कारक क्या है?
उत्तर: यह रोग Pyricularia angulata नामक कवक (फंगस) के संक्रमण से फैलता है, जो अत्यधिक नमी और वर्षा के दिनों में सबसे ज्यादा सक्रिय होता है।
Q2. क्या पीटिंग रोग से केले का गूदा भी खराब हो जाता है?
उत्तर: अधिकांश मामलों में संक्रमण केवल फल के बाहरी छिलके तक सीमित रहता है और गूदा सुरक्षित रहता है; फिर भी छिलके पर गहरे धब्बों के कारण बाजार में फल के भाव बुरी तरह गिर जाते हैं।
Q3. बंच कवरिंग (पॉलीथीन से ढकना) इस रोग में कैसे मददगार है?
उत्तर: घौद पर पॉलीथीन कवर लगाने से बारिश की सीधी बूंदें और संक्रमित पत्तियों से टपकने वाले बीजाणु कोमल फलों के संपर्क में नहीं आ पाते, जिससे संक्रमण की संभावना काफी कम हो जाती है।
Q4. खेत में इस रोग की रोकथाम के लिए सबसे पहला कदम क्या होना चाहिए?
उत्तर: अतिरिक्त सकरों को हटाकर खेत में हवा का संचार बढ़ाना, जल निकासी दुरुस्त करना और संक्रमित ट्रांजिशन लीफ को समय पर काटकर नष्ट करना सबसे प्राथमिक उपाय है।
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प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह- विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी, पूर्व प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना एवं पूर्व सह निदेशक अनुसंधान, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर ( बिहार )
