टिशू कल्चर लैब में कंटामिनेशन का खतरा: छोटी लापरवाही से खराब हो सकती है पूरी पौध, जानें बचाव के तरीके

कुछ दिन पूर्व मुझे एक टिशू कल्चर प्रयोगशाला का भ्रमण करने का अवसर मिला। प्रयोगशाला का निरीक्षण करते समय सबसे गंभीर समस्या बड़ी संख्या में कंटामिनेटेड अर्थात संक्रमित कल्चर बोतलों के रूप में दिखाई दी। अनेक बोतलों में फफूंद तथा बैक्टीरिया की स्पष्ट वृद्धि थी और उनमें से काफी बोतलें प्रयोगशाला के अंदर ही पड़ी हुई थीं। वहां कार्यरत कर्मचारियों का कहना था कि काफी सावधानी बरतने के बावजूद बड़ी संख्या में कल्चर बार-बार संक्रमित हो रहे हैं।

यह स्थिति किसी भी व्यावसायिक टिशू कल्चर प्रयोगशाला के लिए गंभीर चेतावनी है। यदि बार-बार संक्रमण हो रहा है, तो केवल एक्सप्लांट या माध्यम को दोषी मान लेना पर्याप्त नहीं है। वास्तव में यह समस्या प्रयोगशाला की संपूर्ण एसेप्टिक प्रणाली में किसी कमी की ओर संकेत करती है।

कंटामिनेशन आखिर आता कहां से है?

टिशू कल्चर तकनीक का आधार ही यह है कि पौधे के छोटे से ऊतक, मेरिस्टेम, शूट टिप अथवा अन्य एक्सप्लांट को पूर्णतः नियंत्रित एवं निर्जीव परिस्थितियों में पोषक माध्यम पर विकसित किया जाए। इस प्रक्रिया में यदि बैक्टीरिया, फफूंद अथवा यीस्ट प्रवेश कर जाएं तो वे पोषक माध्यम में बहुत तेजी से बढ़ते हैं।

संक्रमण का स्रोत स्वयं पौध सामग्री, पानी, पोषक माध्यम, उपकरण, कल्चर वेसल, कर्मचारी, लैमिनार एयर फ्लो, कल्चर रूम अथवा संक्रमित बोतलें हो सकती हैं। कई बार पौधे के भीतर उपस्थित एंडोफाइटिक सूक्ष्मजीव सतही विसंक्रमण के बाद भी जीवित रह जाते हैं और कुछ दिनों अथवा सप्ताह बाद कल्चर में दिखाई देने लगते हैं।

इसलिए यह पहचानना महत्वपूर्ण है कि कंटामिनेशन इनोकुलेशन के तुरंत बाद दिखाई दे रहा है या कई दिनों बाद। संक्रमण दिखाई देने का समय उसके संभावित स्रोत का महत्वपूर्ण संकेत दे सकता है।

संक्रमित बोतलों को लैब में रखना सबसे बड़ी भूल

निरीक्षण के दौरान मैंने सबसे पहले सुझाव दिया कि संक्रमित कल्चर बोतलों को स्वस्थ कल्चर के साथ प्रयोगशाला में नहीं रखा जाना चाहिए। विशेष रूप से फफूंद से संक्रमित बोतलें बड़ी संख्या में बीजाणु उत्पन्न कर सकती हैं। बोतल खोलने अथवा अनुचित ढंग से हटाने पर ये बीजाणु हवा, सतहों एवं उपकरणों तक पहुंच सकते हैं।

ऐसी बोतलों को तुरंत अलग क्षेत्र में स्थानांतरित कर निर्धारित बायोसेफ़्टी तथा अपशिष्ट निस्तारण प्रक्रिया के अनुसार ऑटोक्लेव करने के बाद नष्ट करना चाहिए। संक्रमित सामग्री को खुले रूप में फेंकना या बिना निष्क्रिय किए लैब से बाहर ले जाना उचित नहीं है।

लैमिनार एयर फ्लो में काम करने की तकनीक और HEPA फिल्टर का महत्व

टिशू कल्चर प्रयोगशाला में सबसे संवेदनशील चरण इनोकुलेशन और सब-कल्चरिंग का होता है। लैमिनार एयर फ्लो कैबिनेट में कार्य प्रारंभ करने से पहले कार्य-सतह को उपयुक्त कीटाणुनाशक, सामान्यतः 70 प्रतिशत एथेनॉल, से साफ करना चाहिए। ऑपरेटर के हाथ साफ हों, आवश्यकतानुसार ग्लव्स, मास्क और स्वच्छ लैब-कोट का प्रयोग किया जाए।

स्टेराइल फोर्सेप, स्कैल्पेल तथा अन्य उपकरणों को गैर-स्टेराइल सतहों के संपर्क में आने से बचाना चाहिए। बोतल अथवा कल्चर वेसल को अनावश्यक रूप से लंबे समय तक खुला नहीं रखना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लैमिनार फ्लो कैबिनेट का केवल चालू होना पर्याप्त नहीं है। उसके HEPA फिल्टर की कार्यक्षमता, एयर फ्लो की समानता, प्री-फिल्टर की सफाई और समय-समय पर तकनीकी सत्यापन भी आवश्यक है।

Parafilm से सीलिंग उपयोगी, लेकिन विवेक के साथ

इनोकुलेशन के बाद कल्चर वेसल को सही ढंग से बंद करना बहुत आवश्यक है। जहां कल्चर प्रणाली और प्रयोग की प्रकृति अनुमति देती हो, वहां कैप अथवा क्लोजर के आसपास Parafilm® जैसे उपयुक्त सीलिंग माध्यम का उपयोग बाहरी कंटामिनेशन के जोखिम को कम करने में सहायक हो सकता है।

लेकिन यह समझना भी आवश्यक है कि हर टिशू कल्चर प्रणाली में पूर्ण सीलिंग उचित नहीं होती। अत्यधिक सीलिंग से गैस विनिमय कम हो सकता है, जिसके कारण एथिलीन संचय, हाइपरहाइड्रिसिटी तथा नवजातपौध (प्लांटलेट्स) की असामान्य वृद्धि जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए सीलिंग की पद्धति पौध प्रजाति एवं कल्चर चरण के अनुरूप निर्धारित की जानी चाहिए।

ऑटोक्लेव की कार्यक्षमता भी जांचें

कई प्रयोगशालाओं में यह मान लिया जाता है कि ऑटोक्लेव चला देने से माध्यम स्वतः स्टेराइल हो गया। यह सोच उचित नहीं है। ऑटोक्लेव में निर्धारित तापमान, दबाव एवं समय प्राप्त होना चाहिए। अत्यधिक बड़ी मात्रा में सामग्री भरने, गलत लोडिंग या उपकरण में तकनीकी खराबी से प्रभावी स्टेरिलाइजेशन प्रभावित हो सकता है।

पानी की गुणवत्ता, मीडिया तैयार करने वाले क्षेत्र की स्वच्छता, कांच अथवा प्लास्टिक के वेसल की स्थिति तथा कल्चर मीडिया में मिलाए जाने वाले घटकों की शुद्धता भी जांचना जरूरी है।

एक्सप्लांट की गुणवत्ता से ही शुरुआत करें

एक स्वस्थ टिशू कल्चर उत्पादन प्रणाली की शुरुआत स्वस्थ मातृ-पौध से होती है। रोगग्रस्त, कमजोर अथवा संदिग्ध मातृ-पौध से लिए गए एक्सप्लांट बार-बार संक्रमण का स्रोत बन सकते हैं। इसलिए Mother Stock को स्वस्थ, कीट एवं रोगमुक्त और नियमित निगरानी में रखना आवश्यक है।

सतही विसंक्रमण के लिए प्रयुक्त रसायन, उनकी सांद्रता एवं एक्सपोजर अवधि को संबंधित फसल और एक्सप्लांट के अनुसार मानकीकृत करना चाहिए। बहुत कम उपचार से संक्रमण बच सकता है, जबकि अत्यधिक उपचार एक्सप्लांट को नुकसान पहुंचा सकता है।

हर कंटामिनेशन का रिकॉर्ड रखें

प्रयोगशाला में प्रत्येक बैच का रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए– किस दिन इनोकुलेशन हुआ, किस ऑपरेटर ने कार्य किया, किस माध्यम और ऑटोक्लेव बैच का उपयोग हुआ तथा किस प्रकार का संक्रमण दिखाई दिया। यदि किसी विशेष ऑपरेटर, माध्यम बैच, लैमिनार कैबिनेट अथवा सप्ताह में संक्रमण अधिक दिखाई देता है, तो समस्या का स्रोत जल्दी पहचानना संभव हो जाता है। कंटामिनेशन प्रतिशत को नियमित रूप से दर्ज करना टिशू कल्चर लैब का महत्वपूर्ण गुणवत्ता सूचकांक होना चाहिए।

अंत में: इलाज नहीं, रोकथाम ही सर्वोत्तम रणनीति

टिशू कल्चर प्रयोगशाला में संक्रमण को केवल “कुछ बोतलों के खराब होने” की समस्या नहीं समझना चाहिए। बड़ी मात्रा में कंटामिनेशन उत्पादन लागत बढ़ाता है, श्रम और समय नष्ट करता है तथा गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री की आपूर्ति प्रभावित करता है।

इसका वैज्ञानिक समाधान है— संक्रमण के स्रोत की पहचान, संक्रमित सामग्री का तत्काल निष्कासन, कठोर एसेप्टिक तकनीक, प्रभावी स्टेरिलाइजेशन, लैमिनार फ्लो एवं HEPA फिल्टर की नियमित जांच, स्वस्थ मातृ-पौधों का चयन और लगातार गुणवत्ता निगरानी। टिशू कल्चर में सफलता महंगे उपकरणों से अधिक अनुशासित कार्यप्रणाली, स्वच्छता और मानकीकृत प्रोटोकॉल पर निर्भर करती है।

अस्वीकरण: यह लेख Dr. SK Singh द्वारा व्यक्तिगत हैसियत से लिखा गया है। इसका मेरे संस्थान जहां मैं वर्तमान में कार्यरत हूं से कोई संबंध नहीं है। टिशू कल्चर प्रयोगशाला में उपयोग किए जाने वाले विसंक्रमक, स्टेरिलाइजेशन अवधि, सीलिंग प्रणाली तथा अन्य तकनीकी प्रक्रियाएं फसल, एक्सप्लांट, कल्चर चरण एवं प्रयोगशाला की मानक संचालन प्रक्रिया के अनुसार निर्धारित की जानी चाहिए। किसी भी रसायन अथवा प्रक्रिया को अपनाने से पूर्व प्रशिक्षित विशेषज्ञ की सलाह एवं संस्थागत SOP का पालन करें।

निष्कर्ष: टिशू कल्चर प्रयोगशाला में कंटामिनेशन को केवल कुछ बोतलों का नुकसान मानकर नजरअंदाज करना उत्पादन लागत और समय दोनों की बर्बादी है। आधुनिक प्रयोगशालाओं की सफलता केवल महंगे उपकरणों से नहीं, बल्कि सख्त स्वच्छता, एसेप्टिक प्रोटोकॉल, लैमिनार फ्लो के नियमित रखरखाव और जिम्मेदार अपशिष्ट निस्तारण पर टिकी होती है।

प्रयोगशाला के हर बैच का लिखित रिकॉर्ड रखकर और संक्रमित सामग्री को समय रहते ऑटोक्लेव कर बाहर निकालने से न केवल संक्रमण की दर को न्यूनतम रखा जा सकता है, बल्कि उच्च गुणवत्ता वाली रोगमुक्त रोपण सामग्री का उत्पादन भी सुनिश्चित किया जा सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. टिशू कल्चर में इनोकुलेशन के कितने दिनों बाद संक्रमण दिखाई देता है?

उत्तर: सतही संक्रमण या उपकरणों की खराबी से होने वाला कंटामिनेशन 24 से 72 घंटे में दिखने लगता है, जबकि पौधे के अंदर छिपे एंडोफाइटिक बैक्टीरिया कई हफ्तों बाद उभरते हैं।

Q2. संक्रमित बोतलों को कल्चर रूम में क्यों नहीं रखना चाहिए?

उत्तर: संक्रमित बोतलों में पनपने वाले फंगल स्पोर्स (बीजाणु) हवा और उपकरणों के जरिए लैब के बाकी स्वस्थ कल्चर को भी दूषित कर देते हैं।

Q3. क्या कल्चर वेसल पर पैराफिल्म (Parafilm) लगाना हमेशा सुरक्षित है?

उत्तर: पैराफिल्म बाहरी हवा से फंगल बीजाणु तो रोकती है, लेकिन बहुत सख्त सीलिंग से बोतल में एथिलीन गैस जमा हो सकती है, जिससे पौधों की बढ़वार असामान्य हो सकती है।

Q4. ऑटोक्लेविंग के बाद भी मीडिया संक्रमित क्यों हो जाता है?

उत्तर: ऑटोक्लेव में अत्यधिक बर्तन ठूंसने, हवा पूरी तरह न निकलने, या 121°C (15 psi) का मानक समय चक्र पूरा न होने पर स्पोर्स जीवित रह जाते हैं।

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