खेती की लागत ढाई गुना बढ़ी, क्या उसी अनुपात में बढ़ा MSP? 6 राज्यों में लागत और समर्थन मूल्य की पड़ताल

किसान की आय बढ़ाने की चर्चा पिछले कई वर्षों से हो रही है, लेकिन जमीन पर किसान की सबसे बड़ी समस्या आज भी वही है-खेती की लागत लगातार बढ़ रही है और फसल बेचने के समय उसे उस अनुपात में कीमत नहीं मिल रही। सवाल यह नहीं है कि सरकार एमएसपी बढ़ा रही है या नहीं। सवाल यह है कि एमएसपी बढ़ने के बावजूद कितने किसान वास्तव में अपनी पूरी फसल उस कीमत पर बेच पा रहे हैं?

भास्कर की छह राज्यों में किसानों से बातचीत पर आधारित रिपोर्ट ने इसी अंतर को सामने रखा है। रिपोर्ट के अनुसार खेती की लागत पिछले करीब दस वर्षों में कई फसलों के मामले में दोगुनी से ज्यादा बढ़ी है, जबकि एमएसपी और बाजार भाव में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हुई। यही वह बिंदु है जिस पर कृषि नीति की गंभीर समीक्षा जरूरी है।

वर्षों में लागत ढाई गुना बढ़ी, लेकिन एमएसपी में केवल 63% का इजाफा

उदाहरण के तौर पर रिपोर्ट में मध्यप्रदेश में गेहूं की उत्पादन लागत का आंकड़ा दिया गया है। 2013-14 में गेहूं की उत्पादन लागत करीब 867 रुपय प्रति क्विंटल बताई गई थी, जो अब करीब 2234 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई है। यानी लागत में लगभग ढाई गुना की वृद्धि हुई, जबकि इसी अवधि में गेहूं के एमएसपी में करीब 63 प्रतिशत की वृद्धि बताई गई है। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लागत और एमएसपी के बीच बढ़ता अंतर किसान की वास्तविक आर्थिक स्थिति को समझने के लिए काफी महत्वपूर्ण है।

लेकिन केवल एमएसपी और लागत की तुलना करना भी पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। किसान के लिए वास्तविक समस्या तब शुरू होती है जब उसे अपनी फसल बेचने के लिए बाजार में जाना पड़ता है। कागज पर घोषित समर्थन मूल्य और मंडी में किसान को मिलने वाली वास्तविक कीमत के बीच अंतर हो सकता है। यदि सरकारी खरीद सीमित है, खरीद केंद्र पर्याप्त संख्या में नहीं हैं या किसान की पूरी उपज एमएसपी पर नहीं खरीदी जाती, तो एमएसपी की घोषणा उसके लिए सीमित महत्व रखती है।

घोषित एमएसपी बनाम जमीनी खरीद: 0.5% उपार्जन से कैसे मिलेगा लाभ?

यही वजह है कि कृषि नीति पर चर्चा करते समय एक सवाल बार-बार उठना चाहिए- एमएसपी कितनी है, यह पूछने के साथ यह भी पूछा जाए कि एमएसपी पर वास्तविक खरीद कितनी हुई? रिपोर्ट में गुजरात में सरकारी खरीद को कुल उत्पादन की तुलना में महज 0.5 प्रतिशत तक बताए जाने का उल्लेख है।

यदि किसी फसल का सरकारी खरीद तंत्र उत्पादन के बहुत छोटे हिस्से तक सीमित रहता है, तो बाकी किसानों के लिए घोषित एमएसपी एक संदर्भ मूल्य तो हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह वास्तविक बिक्री मूल्य बन जाए। यह अंतर किसानों की आय और कृषि नीति के प्रभाव का मूल्यांकन करते समय नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

डीजल, कृषि मजदूरी और महंगे इनपुट: लागत बढ़ने के प्रमुख कारण

खेती की लागत बढ़ने के पीछे कई कारण हैं। डीजल, कृषि मजदूरी, बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई, मशीनरी और परिवहन जैसे खर्च लगातार बढ़ते हैं। खेती में डीजल की हिस्सेदारी कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण है। खेत की जुताई से लेकर सिंचाई और फसल को मंडी तक पहुंचाने तक किसान कई स्तर पर ईंधन की कीमत से प्रभावित होता है।

इसी तरह कृषि मजदूरी भी खेती की कुल लागत का बड़ा हिस्सा है। मजदूरों की मजदूरी बढ़ना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि किसान की फसल का मूल्य उसी गति से नहीं बढ़ता तो अतिरिक्त लागत का बोझ किसान की आय से निकलता है। बीज और कीटनाशक की कीमतों का मामला भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।

आधुनिक कृषि में किसान उत्पादन बढ़ाने के लिए बेहतर बीज, पोषक तत्व और कीट-रोग नियंत्रण पर खर्च करता है। लेकिन अगर इनपुट महंगे होते जाएं और तैयार फसल का बाजार मूल्य अनिश्चित रहे, तो अधिक निवेश का जोखिम भी किसान के हिस्से में चला जाता है। यहां सरकार और कृषि व्यवस्था के सामने एक कठिन सवाल है- क्या किसान को सिर्फ उत्पादन बढ़ाने के लिए कहा जाना पर्याप्त है?

अगर किसान अधिक उत्पादन करता है लेकिन कटाई के समय बाजार में कीमत गिर जाती है, तो अतिरिक्त उत्पादन का लाभ किसे मिलता है? किसान को या उस पूरी आपूर्ति श्रृंखला को जिसमें व्यापारी, प्रोसेसर, थोक विक्रेता और खुदरा बाजार शामिल हैं? इस सवाल का जवाब कृषि आय की चर्चा में जरूरी है।

किसान की समस्या को केवल ‘उत्पादन कम है’ कहकर नहीं समझा जा सकता। भारत में कई फसलों में उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ कीमत और बाजार की समस्या भी सामने आती है। किसान फसल पैदा करता है, लेकिन कीमत तय करने की उसकी क्षमता बहुत सीमित रहती है। वह अपनी फसल लंबे समय तक रोककर रखने की स्थिति में भी हमेशा नहीं होता, क्योंकि उसे अगली फसल के लिए पैसा चाहिए, कर्ज चुकाना है और घरेलू खर्च चलाना है।

भंडारण का अभाव और कटाई के तुरंत बाद औने-पौने दाम पर बिकवाली की मजबूरी

यही मजबूरी कई बार किसान को कटाई के तुरंत बाद अपनी उपज बेचने के लिए मजबूर करती है। इस समय बाजार में आवक बढ़ती है और कीमतों पर दबाव आ सकता है। अगर किसान के पास भंडारण, सस्ता ऋण और बाजार तक बेहतर पहुंच हो तो वह बिक्री का समय कुछ हद तक बदल सकता है।

लेकिन छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह आसान नहीं है। इसलिए किसान की आय बढ़ाने के लिए केवल एमएसपी घोषित करना पर्याप्त नहीं है। खरीद व्यवस्था को मजबूत करना, भंडारण क्षमता बढ़ाना, किसान उत्पादक संगठनों को मजबूत करना, स्थानीय प्रसंस्करण को बढ़ावा देना और बाजार तक सीधी पहुंच बनाना भी उतना ही जरूरी है।

पारिवारिक श्रम का मूल्य और उपभोक्ता बनाम किसान का नीतिगत संतुलन

एक और महत्वपूर्ण मुद्दा खेती की वास्तविक लागत का है। किसान की लागत निकालते समय सिर्फ बीज, खाद और मजदूरी को जोड़ देना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। जमीन का किराया मूल्य, परिवार के श्रम का मूल्य, मशीनरी का मूल्यह्रास, सिंचाई, ब्याज, परिवहन और अन्य खर्चों को भी सही तरीके से शामिल करना जरूरी है। अगर लागत का आकलन ही वास्तविक नहीं होगा, तो लाभकारी मूल्य का सवाल भी अधूरा रहेगा।

सरकार द्वारा एमएसपी बढ़ाना निश्चित रूप से एक नीति उपकरण है, लेकिन उसका प्रभाव खरीद के दायरे से जुड़ा है। यदि घोषित मूल्य पर पर्याप्त सरकारी खरीद नहीं होती, तो किसान को बाजार में उपलब्ध कीमत स्वीकार करनी पड़ सकती है। यही कारण है कि किसान संगठनों की ओर से लंबे समय से एमएसपी की कानूनी गारंटी जैसे मुद्दे उठाए जाते रहे हैं। इस मांग पर अलग-अलग पक्षों के अपने तर्क हैं, लेकिन किसान की वास्तविक चिंता को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि घोषित समर्थन मूल्य और वास्तविक बिक्री मूल्य के बीच कितना अंतर है।

महंगाई का असर सिर्फ किसान पर ही नहीं पड़ता। आम आदमी के लिए महंगे खाद्य पदार्थ चिंता का विषय हैं, लेकिन किसान के लिए कम फसल मूल्य भी चिंता का विषय है। यही कृषि अर्थव्यवस्था का सबसे कठिन संतुलन है। उपभोक्ता सस्ता भोजन चाहता है और किसान अपनी बढ़ती लागत के बाद लाभकारी मूल्य चाहता है। नीति का काम इन दोनों के बीच ऐसा संतुलन बनाना है जिसमें किसान की आय भी टिकाऊ रहे और उपभोक्ता पर अनावश्यक बोझ भी न पड़े।

इसलिए समाधान केवल यह नहीं हो सकता कि हर साल किसी फसल का एमएसपी कुछ प्रतिशत बढ़ा दिया जाए। यह भी देखना होगा कि किसान की लागत कितनी बढ़ी, बाजार में वास्तविक कीमत क्या रही, कितनी फसल सरकारी खरीद में गई और किसान को भुगतान कितने समय में मिला। आज जरूरत कृषि नीति के आंकड़ों को सिर्फ घोषणाओं के रूप में देखने की नहीं, बल्कि किसान के खेत से मंडी तक पूरी आर्थिक श्रृंखला को देखने की है।

उत्पादन नहीं, शुद्ध बचत ही है किसान की असली समृद्धि

किसान की आमदनी बढ़ाने का वास्तविक परीक्षण यही है कि एक किसान अपनी एक एकड़ जमीन पर खेती करने के बाद सभी खर्च निकालकर कितना शुद्ध पैसा बचा पा रहा है। अगर उसकी लागत बढ़ती जा रही है और शुद्ध आय स्थिर या घट रही है, तो सिर्फ उत्पादन बढ़ने को किसान की समृद्धि नहीं कहा जा सकता।

इसीलिए सरकारों को खेती की लागत, फसल मूल्य और सरकारी खरीद के आंकड़े नियमित रूप से सार्वजनिक और फसलवार तरीके से सामने रखने चाहिए। इससे यह साफ होगा कि नीति का लाभ वास्तव में किसान तक कितना पहुंच रहा है। किसान को लगातार यह कहना कि उत्पादन बढ़ाइए, आधुनिक तकनीक अपनाइए और लागत कम कीजिए, तब तक अधूरा संदेश है जब तक उसकी उपज के लिए स्थिर और उचित बाजार उपलब्ध नहीं कराया जाता।

कृषि सिर्फ उत्पादन की गतिविधि नहीं है। यह एक आर्थिक व्यवस्था है जिसमें किसान सबसे बड़ा जोखिम उठाता है। मौसम खराब हुआ तो जोखिम किसान का, लागत बढ़ी तो जोखिम किसान का और बाजार भाव गिरा तो जोखिम भी किसान का। अगर जोखिम का बड़ा हिस्सा किसान उठाता है, तो मूल्य व्यवस्था में उसके हित की सुरक्षा भी उतनी ही गंभीरता से होनी चाहिए। आखिर किसान को मुफ्त में कुछ नहीं चाहिए। वह अपनी मेहनत, जमीन, पानी, बीज, श्रम और पूंजी लगाकर फसल पैदा करता है।

उसकी मांग इतनी सी है कि जब वह अपनी उपज बाजार में लेकर जाए तो उसकी मेहनत और लागत का आर्थिक मूल्य भी दिखाई दे। अब असली सवाल यही है- अगर खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, तो किसान की शुद्ध आमदनी बढ़ाने के लिए केवल एमएसपी बढ़ाना पर्याप्त है या फिर लागत, सरकारी खरीद, बाजार व्यवस्था और भंडारण-पूरी कृषि अर्थव्यवस्था में बदलाव की जरूरत है? इस सवाल का जवाब केवल किसान के लिए नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष: किसान की आय बढ़ाने का वास्तविक पैमाना केवल हर साल एमएसपी में कुछ प्रतिशत की औपचारिक बढ़ोतरी या उत्पादन के रिकॉर्ड आंकड़े नहीं हो सकते, बल्कि यह देखना होगा कि सभी इनपुट खर्च निकालने के बाद किसान के हाथ में कितनी शुद्ध बचत बचती है।

जब तक डीजल, मजदूरी और बीजों की बढ़ती लागत के अनुपात में फसल के दाम तय नहीं होंगे और सरकारी खरीद का दायरा हर पात्र किसान तक नहीं पहुंचेगा, तब तक किसान कर्ज और अनिश्चितता के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल सकता। इसलिए टिकाऊ ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एमएसपी घोषणा के साथ-साथ मजबूत उपार्जन तंत्र, पारदर्शी मंडी व्यवस्था, स्थानीय स्तर पर भंडारण और खाद्य प्रसंस्करण की ठोस नीतियां लागू करना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. पिछले 10 वर्षों में गेहूं की उत्पादन लागत में कितनी बढ़ोतरी दर्ज की गई है?

उत्तर: ग्राउंड रिपोर्ट और आधिकारिक अध्ययनों के अनुसार, मध्य प्रदेश में गेहूं की उत्पादन लागत 2013-14 के ₹867 प्रति क्विंटल से बढ़कर वर्तमान में लगभग ₹2,234 प्रति क्विंटल (ढाई गुना) हो चुकी है।

Q2. क्या केवल एमएसपी (MSP) बढ़ाने से किसानों की शुद्ध आय बढ़ सकती है?

उत्तर: नहीं। एमएसपी के साथ-साथ पर्याप्त खरीद केंद्र, शत-प्रतिशत सरकारी उपार्जन और भंडारण सुविधाएं होना आवश्यक है; अन्यथा किसान खुले बाजार में एमएसपी से नीचे बेचने पर मजबूर होते हैं।

Q3. गुजरात जैसे राज्यों में सरकारी खरीद को लेकर क्या आंकड़े सामने आए हैं?

उत्तर: रिपोर्ट के अनुसार, कई राज्यों में कुल उत्पादन की तुलना में सरकारी खरीद महज 0.5 से 1 प्रतिशत तक ही सीमित रहती है, जिससे अधिकांश किसान एमएसपी लाभ से वंचित रह जाते हैं।

Q4. खेती की लागत में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी किन चीजों की बढ़ी है?

उत्तर: डीजल की कीमतें, जुताई और ढुलाई भाड़ा, कृषि मजदूरी, हाइब्रिड बीज, रासायनिक व जैविक उर्वरक और फसल सुरक्षा रसायनों के दामों में सबसे अधिक वृद्धि हुई है।

Q5. कृषि नीति में उपभोक्ता और किसान के बीच क्या टकराव रहता है?

उत्तर: उपभोक्ता सस्ता अनाज व खाद्य सामग्री चाहता है, जबकि किसान बढ़ती इनपुट लागत के कारण लाभकारी मूल्य की मांग करता है। इस संतुलन को साधना ही कृषि अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती है।

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