सितंबर माह में चक्रवाती बारिश के बाद बिहार और उत्तर प्रदेश के केला उत्पादक क्षेत्रों में अचानक धूप, उच्च आर्द्रता और तापमान में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। ऐसे बदलते मौसम में केले के बागों पर सूक्ष्म कीट ‘थ्रिप्स’ (Thrips) का गंभीर खतरा मंडराने लगा है। आकार में मात्र 1-2 मिलीमीटर होने के कारण यह कीट आसानी से नहीं दिखता,
लेकिन पत्तियों का रस चूसकर और कोमल फलों को खुरचकर उन पर बदसूरत जंग (Rust) जैसे निशान बना देता है, जिससे बाजार में फल की ग्रेडिंग और कीमत आधी रह जाती है। ICAR-NRCB और पूसा कृषि विश्वविद्यालय के शोध के आधार पर जानिए थ्रिप्स की सटीक पहचान, बंच कवरिंग और समेकित कीट प्रबंधन (IPM) के सुरक्षित उपाय।
अर्णव चक्रवात के बाद बदला मौसम और थ्रिप्स की प्रजातियां
सितंबर माह में अर्णव चक्रवात की सक्रियता के कारण बिहार और उत्तर प्रदेश के केला उत्पादक क्षेत्रों में मौसम तेजी से बदल गया है। लगातार बारिश के बाद धूप निकलना, तापमान में उतार-चढ़ाव, खेत में घनी वनस्पति और पौधों में नई कोमल वृद्धि ऐसी परिस्थितियां हैं, जिनमें कीटों की निगरानी विशेष रूप से जरूरी हो जाती है।
हालांकि, यह मानना सही नहीं होगा कि केवल अधिक आर्द्रता के कारण थ्रिप्स का प्रकोप बढ़ता है। केले के विभिन्न थ्रिप्स की प्रजातियां और स्थानीय मौसम इसके प्रकोप को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करते हैं। ICAR-NRCB के अनुसार Helionothrips kadaliphilus सामान्यतः पत्तियों पर पाया जाने वाला थ्रिप्स है और अनुकूल परिस्थितियों में फल को भी नुकसान पहुंचा सकता है। Thrips Hawaiiensis जैसे फूल थ्रिप्स फूलों और नव विकसित फलों को नुकसान पहुंचाते हैं।
पत्तियों पर चांदी जैसे धब्बे और फलों पर जंग के निशान
थ्रिप्स आकार में बेहद छोटे, सामान्यतः लगभग 1–2 मिलीमीटर लंबे कीट होते हैं। इसलिए किसान इन्हें आसानी से देख नहीं पाते। वयस्क और निम्फ कोमल ऊतकों को खुरचकर कोशिकाओं का रस चूसते हैं। पत्तियों पर शुरुआत में हल्के पीले या चांदी जैसे धब्बे दिखाई देते हैं, जो बाद में पीले-भूरे, कांस्य या गहरे भूरे रंग के हो सकते हैं। गंभीर स्थिति में पत्तियां सूखने लगती हैं।
ICAR-NRCB द्वारा उपलब्ध जानकारी में H. Kadaliphilus को केले का प्रमुख पर्ण-भक्षी थ्रिप्स बताया गया है और शोध में इसके कारण फल पर भी उल्लेखनीय क्षति दर्ज की गई है। कुछ प्रजातियों के प्रकोप से फल की सतह पर चांदी जैसे धब्बे, भूरे-कांस्य रंग के खुरदरे या जंग जैसे निशान और बाद में कॉर्की सतह विकसित हो सकती है। इससे फल की चमक और बाजार गुणवत्ता प्रभावित होती है।
फूल और गुच्छा अवस्था में सबसे ज्यादा खतरा
फूल थ्रिप्स के वयस्क और निम्फ फूलों के कोमल हिस्सों तथा नव विकसित फलों पर भोजन करते हैं। फूल निकलने के आसपास और उसके बाद की प्रारंभिक अवस्था में क्षति होने पर फल की बाहरी सतह पर दाग और खुरदरापन विकसित हो सकता है। बाद में यही निशान बाजार में फल की ग्रेडिंग और कीमत को प्रभावित करते हैं।
इसलिए विशेष रूप से पूवन, मोन्थन, सबा, नेय पूवन, रस्थली/मालभोग तथा अन्य संवेदनशील किस्मों में फूल निकलने से लेकर फल के प्रारंभिक विकास तक नियमित निरीक्षण करना जरूरी है।
खेत में थ्रिप्स की पहचान कैसे करें?
किसान सप्ताह में कम से कम दो बार पौधों का निरीक्षण करें और विशेष रूप से निम्न स्थान देखें। नई खुल रही पत्तियों और पत्ती-गर्भ के अंदर। पत्तियों की निचली सतह पर पीले, चांदी जैसे अथवा कांस्य रंग के धब्बे। पेटिओल और पत्ती-आवरण पर असामान्य भूरे या काले निशान। नरम पुष्पीय भाग और फूलों के अंदर।
नव विकसित केले की उंगलियों पर चांदी जैसे धब्बे या बाद में जंग जैसे भूरे निशान। प्रभावित भाग पर छोटे, तेजी से चलने वाले पीले, भूरे या गहरे रंग के कीट। बहुत छोटे होने के कारण हाथ से पहचान कठिन हो सकती है। संदिग्ध नमूने को सफेद कागज पर हल्के से झटककर या हैंड-लेंस से देखकर पहचान करना अधिक आसान है।
थ्रिप्स प्रबंधन में अपनाएं IPM की रणनीति
1. स्वस्थ रोपण सामग्री सबसे पहली सुरक्षा
केले की पौध हमेशा प्रमाणित, स्वस्थ और कीट-मुक्त स्रोत से लें। ऊतक-संवर्धित पौधों का उपयोग करते समय प्रमाणित नर्सरी से ही पौधे प्राप्त करें। गुणवत्तापूर्ण एवं स्वस्थ रोपण सामग्री को केले की टिकाऊ खेती का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
2. खेत की स्वच्छता रखें
मुख्य पौधे के आसपास अनावश्यक सकर्स न बढ़ने दें। अत्यधिक संक्रमित एवं सूखी पत्तियों को हटाकर खेत से बाहर नष्ट करें। पुराने और उपेक्षित केले के खेत थ्रिप्स सहित अनेक कीटों के लिए आश्रय बन सकते हैं; इसलिए ऐसे खेतों की स्वच्छता जरूरी है।
3. गुच्छों को कवर करना बेहद उपयोगी
फल गुच्छा निकलने के बाद उचित समय पर बंच कवरिंग अपनाना थ्रिप्स से फल को बचाने की प्रभावी भौतिक रणनीति हो सकती है। RPCAU, पूसा एवं ICAR-NRCB के प्रायोगिक परिणामों में बंच कवरिंग से थ्रिप्स क्षति में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।
4. प्राकृतिक शत्रुओं का संरक्षण
थ्रिप्स के अनेक प्राकृतिक शत्रु होते हैं। खेत में अनावश्यक और बार-बार कीटनाशक छिड़काव करने से इन लाभकारी जीवों को नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए पहले जैविक एवं जैव-तार्किक उपायों को प्राथमिकता दें। नीम आधारित पंजीकृत उत्पाद तथा Beauveria Bassiana जैसे जैव-कीटनाशी उत्पाद स्थानीय अनुशंसा एवं उत्पाद-लेबल के अनुसार इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
5. रासायनिक नियंत्रण-अंतिम विकल्प
थ्रिप्स की संख्या आर्थिक नुकसान की स्थिति तक पहुंचने पर ही रासायनिक नियंत्रण पर विचार करें। केवल वही कीटनाशी प्रयोग करें जो भारत में केले और संबंधित कीट के लिए वर्तमान में पंजीकृत/लेबल-क्लेम वाला हो। उत्पाद के लेबल पर दी गई मात्रा, पानी की मात्रा, फसल अवस्था और कटाई पूर्व प्रतीक्षा अवधि (PHI) का अनिवार्य रूप से पालन करें।
पुरानी पुस्तकों या इंटरनेट पर उपलब्ध किसी पुराने सुझाव के आधार पर क्लोरपाइरीफॉस, डाइमिथोएट, इमिडाक्लोप्रिड अथवा किसी अन्य कीटनाशी का अंधाधुंध छिड़काव न करें। कीटनाशी बदलते समय अलग-अलग IRAC समूहों की प्रभावकारी रसायन-श्रेणियों का विवेकपूर्ण रोटेशन प्रतिरोध प्रबंधन में मदद करता है। ICAR का वर्तमान IPM दृष्टिकोण भी निगरानी, रोकथाम और गैर-रासायनिक उपायों को प्राथमिकता देते हुए आवश्यकता पड़ने पर ही अनुशंसित मात्रा में कीटनाशकों के उपयोग पर जोर देता है।
बारिश के बाद किसान क्या करें?
सितंबर में बारिश रुकने के बाद खेत में पानी जमा न रहने दें। पौधों को जल-तनाव से भी बचाएं, लेकिन अनावश्यक सिंचाई न करें। घनी छाया और अत्यधिक सकर्स को नियंत्रित करें। फूल और गुच्छे वाले पौधों का अलग से निरीक्षण करें। यदि किसी खेत में लगातार थ्रिप्स दिखाई दे रहे हैं तो पूरे खेत में बिना निगरानी के छिड़काव करने के बजाय पहले प्रकोप की तीव्रता और प्रभावित पौधों का आकलन करें।
अंत में
केले में थ्रिप्स का महत्व केवल पत्तियों को नुकसान पहुंचाने तक सीमित नहीं है। फूल और फल की शुरुआती अवस्था में इसका प्रकोप सीधे फल की बाहरी गुणवत्ता, ग्रेडिंग और बाजार मूल्य को प्रभावित कर सकता है। इसलिए सितंबर की बदलती मौसम परिस्थितियों में “पहचान–निगरानी–भौतिक रोकथाम–जैविक उपाय–और आवश्यकता पड़ने पर पंजीकृत कीटनाशी” की रणनीति अपनाना अधिक सुरक्षित और टिकाऊ रास्ता है।
किसानों को यह भी समझना होगा कि थ्रिप्स का नियंत्रण केवल एक बार के कीटनाशी छिड़काव से नहीं होता। लगातार निगरानी, स्वस्थ पौध सामग्री, खेत की स्वच्छता, बंच कवरिंग, प्राकृतिक शत्रुओं का संरक्षण और वैज्ञानिक IPM ही लंबे समय तक प्रभावी प्रबंधन की आधारशिला हैं।
निष्कर्ष: सितंबर और अक्टूबर के बदलते मौसम में केले के बाग की सुरक्षा केवल खाद-पानी देने तक सीमित नहीं है, बल्कि सूक्ष्म कीटों की समय पर पहचान ही आपकी मेहनत का पूरा मूल्य दिला सकती है। थ्रिप्स भले ही आकार में 1-2 मिलीमीटर का छोटा कीट हो, लेकिन फल पर जंग जैसे निशान बनाकर यह किसान की साल भर की कमाई को आधी कर देता है।
किसानों को किसी भी पुरानी या प्रतिबंधित रासायनिक दवा के अंधाधुंध छिड़काव से बचना चाहिए और बंच कवरिंग, बाग की साफ-सफाई, प्राकृतिक शत्रुओं के संरक्षण तथा बवेरिया बैसियाना जैसे समेकित कीट प्रबंधन (IPM) के वैज्ञानिक सूत्रों को अपनाना चाहिए, ताकि केले की चमक भी बरकरार रहे और मंडी में उच्चतम प्रीमियम भाव भी मिले।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. केले में थ्रिप्स कीट पत्तियों और फलों को कैसे नुकसान पहुंचाते हैं?
उत्तर: थ्रिप्स के वयस्क और निम्फ पत्तियों व फलों के कोमल ऊतकों को खुरचकर उनका रस चूसते हैं। इससे पत्तियों पर चांदी जैसे या कांस्य रंग के धब्बे बनते हैं और फलों की सतह पर खुरदरे, जंग (Rust) जैसे बदसूरत निशान बन जाते हैं।
Q2. खेत में थ्रिप्स की पहचान करने का सबसे आसान तरीका क्या है?
उत्तर: थ्रिप्स 1-2 मिमी जितने सूक्ष्म होते हैं। संदिग्ध पत्ती या फूल के हिस्से को एक सफेद कागज पर रखकर हल्के से थपथपाएं; कागज पर गिरकर तेजी से रेंगते हुए पीले या गहरे भूरे कीट आसानी से देखे जा सकते हैं।
Q3. क्या थ्रिप्स के हमले से केले के गूदे (स्वाद) पर असर पड़ता है?
उत्तर: आमतौर पर थ्रिप्स फल के अंदरूनी गूदे को नहीं सड़ाता, लेकिन फल के छिलके पर गहरे भूरे और कॉर्की निशान बनने से फल की चमक खत्म हो जाती है और मंडी में व्यापारी इसके बहुत कम दाम देते हैं।
Q4. बंच कवरिंग (Bunch Covering) थ्रिप्स नियंत्रण में कितनी मददगार है?
उत्तर: RPCAU पूसा और ICAR-NRCB के अनुसंधानों के अनुसार, फूल निकलने के बाद गुच्छे को छिद्रित पॉलीथीन या नॉन-वूवेन बैग से ढकने पर फल थ्रिप्स के सीधे संपर्क से बच जाते हैं और फल दाग-धब्बों से पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं।
Q5. थ्रिप्स के जैविक नियंत्रण के लिए कौन-से उपाय सबसे प्रभावी हैं?
उत्तर: मित्र फफूंद आधारित जैव-कीटनाशक Beauveria bassiana या अच्छी गुणवत्ता वाले नीम आधारित पंजीकृत फॉर्मूलेशन का अनुशंसित मात्रा में छिड़काव थ्रिप्स की संख्या को जैविक रूप से नियंत्रित करता है।
यह भी पढ़े: पपीते की खेती पर दोहरा खतरा: जड़ गलन और रिंग स्पॉट वायरस से बचाव के 8 वैज्ञानिक उपाय
जागरूक रहिए व नुकसान से बचिए और अन्य लोगों के जागरूकता के लिए साझा करें। कृषि लेख, सरकारी योजनाएं, कृषि तकनीक, व्यवसायिक एवं जैविक खेती से संबंधित सटीक जानकारियां प्राप्त करने के लिए जुड़े कृषि जागृति चलो गांव की ओर से या कृषि संबंधित किसी भी समस्या के जैविक समाधान के लिए WhatsApp करें।

प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह- विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी, पूर्व प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना एवं पूर्व सह निदेशक अनुसंधान, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर ( बिहार )
