बीज व मृदा उपचार से बढ़ाएँ रबी फसलों का उत्पादन: सरसों, चना और गेहूं की वैज्ञानिक गाइड

बिना उपचार किए सीधे खेत में बीज बो देना दीमक, उकठा और फफूंद जनित रोगों को खुली दावत देने जैसा है, जहां अंकुरण से पहले ही 30% फसल जमीन के नीचे सड़ जाती है। कवकनाशी, कीटनाशी और जैव उर्वरकों के सही क्रम (F-I-R) और प्रति एकड़ गोबर खाद-ट्राइकोडर्मा कल्चर के वैज्ञानिक गणित को समझे बिना बुवाई करना अपनी महीनों की मेहनत और बीजों के पैसों को मिट्टी में मिलाने जैसा है।

बीज व मृदा उपचार का वैज्ञानिक क्रम

बीज उपचार वह प्रक्रिया हैं, जिसमें बीज को बोने से पूर्व बीज से होने वाले और मृदा जनित रोगों से बचाने के लिए रासायनिक कवकनाशियों/कीटनाशियों और जैविक कारकों की निश्चित मात्रा से बीज शोधन किया जाता हैं जिससे बीज पर एक सुरक्षात्मक परत बन जाती हैं। बीजों को कवकनाशी, कीटनाशी और जीवाणु कल्चर से उपर्युक्त क्रम में ही उपचारित करना चाहिए।

बीज उपचार करने से रोगों और कीटों से बीज की सुरक्षा के साथ बीज की अंकुरण क्षमता और फसल उत्पादन में भी वृद्धि होती हैं। मृदा और बीज उपचार करते समय हाथों में दस्ताने, मुंह पर मास्क तथा पूरे वस्त्र पहनें। प्रमुख रबी फसलों में मृदा और बीज उपचार की सिफारिशें निम्नानुसार हैं।

सरसों में झुलसा और दीमक नियंत्रण

सरसों- सरसों की फसल में झुलसा, तुलासिता, सफेद रोली, तना सड़न जैसे रोग और दीमक, एफिड, पेन्टेड बग और आरा मक्खी जैसे अन्य कीटों का प्रकोप होता हैं।

मृदा उपचार– रोगों से बचाव हेतु ट्राइकोडर्मा की 1 किलो मात्रा को 150 किलोग्राम 12 माह पुरानी सड़ी हुई गोबर की खाद में मिला कर 15 दिन तक नम और छायादार स्थान में रखें। तत्पश्चात पलेवा करते समय प्रति एक की दर से मिट्टी में एकसार मिला देवें।

कीटों की बचाव के लिए बुवाई से पूर्व अन्तिम जुताई के समय क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 7 से 10 किलो प्रति एकड़ खेत में डाल कर जुताई करें। नमी को ध्यान में रखकर जुताई के बाद पाटा लगावें।

बीज उपचार– रोगों से बचाव के लिए बीजों को मैटेलेक्जिल 35 प्रतिशत डब्ल्यू.एस. 6 ग्राम अथवा मैन्कोजेब 2.5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करें।

पूर्व में तना सड़न रोग से प्रभावित क्षेत्रों में कार्बेण्डाजिम 1 ग्राम अथवा ट्राइकोडर्मा 10 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करें। इसके बाद कीटों से बचाव के लिए बीजों को इमिडाक्लोप्रिड 600 एफ.एस. 9 मिली प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें।

चना में उकठा और जड़ गलन रोकथाम

चना- चने की फसल में जड़ गलन, सूखा जड़ गलन और उकठा जैसे हानिकारक रोग और दीमक, कटवर्म और वायरवर्म जैसे कीटों का प्रकोप होता हैं।

मृदा उपचार- रोगों की रोकथाम के लिए बुवाई से पूर्व 1 किलो ट्राईकोडर्मा को 150 किलो आर्द्रता युक्त गोबर की खाद में मिला कर 10 -15 दिन छाया में रखें। इस मिश्रण को बुवाई के समय प्रति एकड़ की दर से पलेवा करते समय मिट्टी में मिला देवें।

कीटों की रोकथाम के लिए क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 5 से 7 किलो प्रति एकड़ की दर से आखिरी जुताई से पूर्व भुरकाव कर मिट्टी में मिला देवें।

बीज उपचार– रोग से बचाव के लिए 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम+थाइरम 2.5 ग्राम अथवा कार्बोक्सीन 37.5 प्रतिशत+थाइरम 37.5 प्रतिशत 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें।

इसके बाद कीटों से बचाव के लिए बीजों को फिप्रोनिल 5 एससी. 10 मिली. अथवा इमीडाक्लोप्रिड 600 एफएस. का 5 मिली प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर बुवाई करें।

चने के बीजों को तरल आधारित राईजोबियम, पीएसबी, गंधक और जिंक घोलक जैव उर्वरकों की 3–5 मिली लीटर प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करने से फसल की पैदावार में बढ़ोतरी होती हैं।

जैविक खेती करने वाले किसान जड़ गलन, सूखा जड़ गलन और उकठा रोगों से फसल को बचाने के लिए ट्राइकोडर्मा से मृदा उपचार करें। ट्राइकोडर्मा 10 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें।

गेहूं और जौ में कण्डवा व दीमक बचाव

जौ- जौ फसल में अनावृत और आवृत कण्डवा, पत्तीधारी जैसे रोग और दीमक कीट से काफी हानि होती हैं।

मृदा उपचार– दीमक कीट से बचाव के लिए क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 5 से 7 किलो प्रति एकड़ की दर से आखिरी जुताई से पूर्व भुरकाव कर खेत में मिला देवें।

बीज उपचार– रोगों से बचाव के लिए बीज को टेबुकोनाजोल 2 प्रतिशत डीएस. 1 ग्राम अथवा कार्बोक्सिन 2 ग्राम अथवा कार्बोक्सिन 37.5 प्रतिशत+ थाइरम 37.5 प्रतिशत 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बोवें।

इसके बाद दीमक से बचाव के लिए फिप्रोनिल 5 एससी. 6 मिली. अथवा क्लोथिएनिडीन 50 डब्ल्यूडीजी. 1.5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर बुवाई करें।

​गेहूं- ​गेहूं की फसल में अनावृत, पत्ती कण्डवा जैसे रोगों और दीमक जैसे हानिकारक कीट का प्रकोप होता हैं।

​मृदा उपचार– रोगों की रोकथाम के लिए बुवाई से पूर्व 1 किलो ट्राईकोडर्मा को 150 किलो आर्द्रता युक्त गोबर की खाद में मिलाकर 10-15 दिन छाया में रखें। इस मिश्रण को बुवाई के समय प्रति बीघा की दर से पलेवा करते समय मिट्टी में मिला देवें।

दीमक कीट से बचाव के लिए क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 5 से 7 किलो प्रति एकड़ की दर से आखिरी जुताई से पूर्व भुरकाव कर खेत में मिला देवें।

​बीज उपचार– रोगों से बचाव के लिए 2 ग्राम कार्बोक्सिन अथवा टेबुकोनाजोल 1.25 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बोएं।

दीमक से बचाने के लिए इमिडाक्लोप्रिड 600 एफ.एस. की 4 मिली अथवा क्लोथिएनिडीन 50 डब्ल्यूडीजी 1.5 ग्राम अथवा फिप्रोनिल 5 एससी 6 मिली प्रति किलो बीज की दर से आवश्यकतानुसार पानी में घोल बनाकर उपचारित कर छाया में सुखाने के बाद 2 घण्टे के अन्दर बुवाई करें।

मसाला फसलों में मृदा व बीज उपचार

धनियां- धनिया फसल में तना सड़न, लौंगिया रोग, कटवर्म और वायरवर्म जैसे रोग-कीटों का प्रकोप होता हैं। कीटों से बचाव के लिए मृदा उपचार करने के लिए अन्तिम जुताई से पूर्व क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 5 से 7 किलो अथवा मैलाथियान 5 प्रतिशत चूर्ण 5 से 7 किलो प्रति एकड़ की दर से खेत में भुरकाव कर जुताई करें।

बीज उपचार- बीजों को कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम या ट्राईकोडर्मा 4 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें।

जिन क्षेत्रों में लौंगिया रोग का प्रकोप होता हैं वहां हैक्सोकोनाजोल 5 ईसी 2 मिली या प्रोपीकोनाजोल 25 ईसी 2 मिली प्रतिकिलो बीज दर से बीजोपचार कर बुवाई करें।

जीरा- जीरा फसल में उकठा रोग से बचाने के लिए बुवाई से पूर्व 1 किलो ट्राईकोडर्मा को 150 किलो आर्द्रता युक्त गोबर की खाद में मिला कर बुवाई के समय प्रति हैक्टेयर की दर से मिट्टी में मिलाकर मृदा उपचार करें। बीजों को बुवाई से पूर्व कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम अथवा ट्राईकोडर्मा 6 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर बुवाई करें।

मैथी- मैथी फसल में जड़ गलन रोग और भूमिगत कीटों का प्रकोप होता हैं।

मृदा उपचार– बुवाई से पूर्व 1 किलो ट्राईकोडर्मा को 150 किलो 12 माह पुरानी सड़ी हुई गोबर की खाद में मिला कर बुवाई के समय प्रति एकड़ की दर से मिट्टी में मिला देवें।

भूमिगत कीटों की बचाव के लिए बुवाई से पूर्व अन्तिम जुताई के समय क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 5 से 7 किलो प्रति हैक्टेयर खेत में डाल कर जुताई करें।

बीज उपचार– बीजों को ट्राईकोडर्मा 4-6 ग्राम अथवा कार्बेन्डाजिम 12 प्रतिशत+मैन्कोजेब 63 प्रतिशत 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें।

सौंफ- रोगों से बचाने के लिए बीजों को बुवाई से पूर्व कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर बुवाई करें।

तारामीरा- मृदा उपचार करने के लिए बुवाई से पूर्व अन्तिम जुताई के समय क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 5 से 7 किलो प्रति एकड़ खेत में डाल कर जुताई करें।

रोगों से बचाव हेतु बीजों को मैन्कोजेब 2.5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर बुवाई करें।

दलहन व तिलहन के त्वरित उपाय

मसूर- मसूर फसल को उकठा से बचाने के लिए बीजों को कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम अथवा कार्बोक्सिन 37.5 प्रतिशत + थाइरम 37.5 प्रतिशत 200 डब्ल्यूपी 2 ग्राम अथवा कार्बोक्सिन 75 डब्ल्यूपी. 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बोवें।

अलसी- अलसी की फसल में उकठा रोग से बचाने के लिए बुवाई से पूर्व अन्तिम जुताई के समय क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 5 से 7 किलो प्रति एकड़ की दर से खेत में डाल कर जुताई कर मृदा उपचार करें।

बीजों को कार्बोक्सिन 37.5 प्रतिशत + थाइरम 37.5 प्रतिशत 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर बोवें।

बीज व मृदा उपचार के 3 जरूरी नियम (F-I-R फॉर्मूला)

उपचार का सही क्रम याद रखें (F-I-R): पहले F (Fungicide – कवकनाशी) से बीजोपचार करें, फिर I (Insecticide – कीटनाशी) लगाएं, और सबसे अंत में R (Rhizobium/Bio-fertilizer – जैव उर्वरक/जीवाणु कल्चर) लगाएं; क्रम उलटने पर जीवाणु मर जाते हैं।

धूप में कभी न सुखाएं, 2 घंटे में बोएं: उपचारित बीजों को हमेशा तिरपाल पर छायादार स्थान में सुखाएं और रासायनिक घोल से उपचारित बीजों को सूखने के 2 घंटे के भीतर खेत में बो देना चाहिए।

दस्ताने और मास्क का अनिवार्य प्रयोग: रासायनिक कवकनाशी और कीटनाशी जहरीले होते हैं; बीजोपचार करते समय नंगे हाथों का प्रयोग कभी न करें, हमेशा रबर के दस्ताने, मुंह पर मास्क और पूरे कपड़े पहनें।

निष्कर्ष: रबी सीजन की फसलों में भरपूर पैदावार और 100% जमाव हासिल करने का सबसे सस्ता और अचूक सुरक्षा कवच बीज और मृदा उपचार ही है। कवकनाशी, कीटनाशी और राइजोबियम कल्चर के सही क्रम (F-I-R) को अपनाकर किसान भाई फसल को दीमक, उकठा और जड़ गलन जैसी गंभीर बीमारियों से बचा सकते हैं, जिससे लागत घटती है और शुद्ध मुनाफा बढ़ता है।

लेखक परिचय- डॉ. जितेन्द्र शर्मा, रामगोपाल कड़वा, जगदीश लाल शर्मा, संजय कुमार अरोड़ा, एग्री क्लिनिक – मृदा परीक्षण प्रयोगशाला, टोंक

अस्वीकरण (Disclaimer): यह तकनीकी सिफारिश एग्री क्लिनिक – मृदा परीक्षण प्रयोगशाला, टोंक के कृषि वैज्ञानिकों (डॉ. जितेन्द्र शर्मा, रामगोपाल कड़वा, जगदीश लाल शर्मा, संजय कुमार अरोड़ा) के अनुसंधान और Anil Kumar Prasad के 5 वर्षों के व्यावहारिक खेती के अनुभव पर आधारित है। रासायनिक दवाओं के प्रयोग के समय सुरक्षा नियमों का पालन करें और स्थानीय KVK या कृषि रक्षा अधिकारी से सलाह अवश्य लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. बीज उपचार का सही वैज्ञानिक क्रम (FIR फॉर्मूला) क्या है?

उत्तर: बीज उपचार हमेशा पहले फफूंदनाशी (Fungicide), उसके बाद कीटनाशी (Insecticide) और सबसे अंत में जीवाणु कल्चर/राइजोबियम (Rhizobium/Culture) के क्रम में ही किया जाना चाहिए।

Q2. ट्राइकोडर्मा से मृदा उपचार का सही तरीका क्या है?

उत्तर: 1 किलो ट्राइकोडर्मा को 150 किलो पुरानी सड़ी व नम गोबर खाद में मिलाकर 10-15 दिन छाया में बोरी से ढककर रखें, फिर पलेवा के समय प्रति एकड़ मिट्टी में मिला दें।

Q3. गेहूं और जौ में दीमक से बचाव के लिए कौन-सी दवा सबसे असरदार है?

उत्तर: दीमक से बचाव के लिए गेहूं में इमिडाक्लोप्रिड 600 FS (4 मिली) या क्लोथिएनिडीन 50 WDG (1.5 ग्राम) और जौ में फिप्रोनिल 5 SC (6 मिली) प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें।

Q4. चने में उकठा (विल्ट) रोग को बीज उपचार से कैसे रोकें?

उत्तर: चने के बीजों को कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम + थाइरम 2.5 ग्राम या कार्बोक्सीन 37.5% + थाइरम 37.5% (2 ग्राम) अथवा जैविक खेती में ट्राइकोडर्मा (10 ग्राम) प्रति किलो बीज से उपचारित करें।

Q5. उपचारित बीजों को कितनी देर में बो देना चाहिए?

उत्तर: बीजों को रासायनिक घोल से उपचारित करने के बाद छाया में अच्छी तरह सुखाकर 2 घंटे के भीतर खेत में बो देना सर्वोत्तम माना जाता है।

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