बिहार में धान खरीद पर गंभीर सवाल: 6 एकड़ जमीन को 124 एकड़ दिखाकर 45 लाख रुपये का भुगतान

महीनों पसीना बहाकर तैयार की गई धान की उपज बेचने के लिए जब एक आम किसान पैक्स और अधिकारियों के चक्कर काटता रह जाता है, तब कुछ चुनिंदा नामों पर 22 डिसमिल जमीन को 6 एकड़ और 6 एकड़ को 124 एकड़ बनाकर ₹45 लाख सरकारी खजाने से निकाल लिए जाते हैं। पूर्वी चंपारण के रामगढ़वा से लेकर बांका, भोजपुर और दरभंगा तक पैक्स खरीद में सामने आई इन कथित गड़बड़ियों और ऑनलाइन सत्यापन की खामियों को जाने बिना सरकारी खरीद का सच समझना नामुमकिन है।

किसान भाइयों, सरकारी योजनाओं का उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाना है, लेकिन जब सरकारी खरीद व्यवस्था में जमीन के रिकॉर्ड और धान की मात्रा को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आते हैं, तो इसका असर ईमानदारी से खेती करने वाले किसानों के भरोसे पर भी पड़ता है। बिहार के खरीफ विपणन सत्र 2025-26 की धान खरीद को लेकर सामने आई एक पड़ताल में कई पैक्सों के रिकॉर्ड पर सवाल उठाए गए हैं।

रामगढ़वा पैक्स में 45 लाख का खेल

रिपोर्ट के अनुसार, पूर्वी चंपारण जिले के मोतिहारी क्षेत्र के रामगढ़वा पैक्स में कुछ किसानों के धान अधिप्राप्ति आवेदनों में दर्ज जमीन का रकबा और भूमि पोर्टल पर उपलब्ध रिकॉर्ड मेल नहीं खाते। आरोप है कि जिन किसानों की जमीन वास्तविक रिकॉर्ड में कुछ डिसमिल थी, उनके आवेदन में उसे कई एकड़ तक दिखाया गया। इसके आधार पर धान की बड़ी मात्रा की उपज दर्ज की गई और सरकारी समर्थन मूल्य के हिसाब से लाखों रुपये के भुगतान का विवरण सामने आया।

पड़ताल में बताया गया कि रामगढ़वा पैक्स के कुछ आवेदनों में लगभग 6 एकड़ जमीन को कुल 124 एकड़ के रूप में दर्शाया गया। इसी रकबे के आधार पर करीब 1,889 क्विंटल धान की उपज दिखाई गई और लगभग 45 लाख रुपये के भुगतान का उल्लेख किया गया। ये रिपोर्ट में सामने आए आरोप और आँकड़े हैं; पूरे मामले में जिम्मेदारी तय करने के लिए संबंधित रिकॉर्ड और जाँच के निष्कर्ष महत्त्वपूर्ण होंगे।

जमीन के रिकॉर्ड और आवेदनों में भारी विसंगतियां

रिपोर्ट में कुछ किसानों के उदाहरण भी दिए गए हैं। संगीता देवी के आवेदन में 6 एकड़ जमीन दर्ज होने की बात कही गई, जबकि भूमि रिकॉर्ड में 22.97 डिसमिल का विवरण बताया गया। इसी तरह सिपाही राय और अनिल कुमार के आवेदनों में दर्ज जमीन के रकबे तथा पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी में अंतर होने का दावा किया गया। रिपोर्ट में इन मामलों के साथ धान की मात्रा और भुगतान के आँकड़े भी प्रस्तुत किए गए हैं।

एक ही खेसरा पर तीन अलग-अलग दावेदार

सबसे गंभीर सवाल एक ही जमीन को अलग-अलग लोगों के नाम पर दिखाए जाने को लेकर उठता है। रिपोर्ट के अनुसार, रामगढ़वा मौजा के एक ही खाता और खेसरा से संबंधित जमीन को तीन अलग-अलग आवेदनों में अलग-अलग व्यक्तियों ने अपना बताया। एक आवेदन में 20 एकड़, दूसरे में 18 एकड़ और तीसरे में 15 एकड़ जमीन दर्ज होने की बात कही गई, जबकि पोर्टल पर पूरी भूमि का क्षेत्रफल 70.29 डिसमिल बताया गया। रिपोर्ट में यह जमीन किसी अन्य व्यक्ति के नाम दर्ज होने का भी उल्लेख है। यदि दस्तावेजों की जाँच में ये विसंगतियाँ प्रमाणित होती हैं, तो यह सत्यापन प्रक्रिया की गंभीर समीक्षा की माँग करता है।

इस मामले पर पैक्स प्रबंधक ने साइबर कैफे से आवेदन भरते समय गलती होने की संभावना जताई। उन्होंने यह भी कहा कि कई लोगों की जमीन के रिकॉर्ड ऑनलाइन उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन रिपोर्ट में यह सवाल उठाया गया कि जब आवेदन में खाता-खेसरा का विवरण ही स्पष्ट नहीं था, तो संबंधित जमीन और उत्पादन का सत्यापन किस आधार पर किया गया।

बांका, भोजपुर और दरभंगा में दर्ज प्राथमिकियां

पड़ताल में बिहार के अन्य जिलों के पैक्सों से जुड़े मामलों का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, बांका जिले के भवानीपुर-कठौन पैक्स अध्यक्ष के खिलाफ लगभग एक करोड़ रुपये, भोजपुर के तियर पैक्स से जुड़े मामले में 43.80 लाख रुपये और दरभंगा के सनहपुर पैक्स से संबंधित मामले में 2.77 लाख रुपये की कथित गड़बड़ी या धान गबन के आरोपों पर प्राथमिकी दर्ज होने की जानकारी दी गई है। कुछ अन्य पैक्सों के खिलाफ भी शिकायतों का उल्लेख है। इन मामलों में आरोप, प्राथमिकी और दोष सिद्ध होने की स्थिति को अलग-अलग समझना जरूरी है।

ऑनलाइन सत्यापन तंत्र और जरूरी सुधार

किसान भाइयों, धान खरीद की प्रक्रिया में किसान पहले ऑनलाइन आवेदन करके अपनी जमीन का विवरण देते हैं। इसके बाद निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार सत्यापन होता है, पैक्स के माध्यम से धान खरीदा जाता है और भुगतान किसान के बैंक खाते में भेजा जाता है। इस व्यवस्था में जमीन का सही रिकॉर्ड, वास्तविक उपज, खरीद की मात्रा, गोदाम में उपलब्ध धान और भुगतान के दस्तावेजों का आपस में मिलान होना जरूरी है।

यदि आवेदन में जमीन का रकबा गलत दर्ज हो, तो उससे जुड़ी संभावित उपज की गणना भी गलत हो सकती है। इसलिए केवल आवेदन स्वीकार कर लेना पर्याप्त नहीं है। सत्यापन करने वाले अधिकारियों और खरीद व्यवस्था से जुड़े जिम्मेदार लोगों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दर्ज जमीन वास्तविक भूमि रिकॉर्ड से मेल खाती है और खरीद की मात्रा उचित आधार पर दर्ज की गई है।

इस मामले में निष्पक्ष जाँच के दौरान यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि आवेदन किसने भरा, जमीन के रिकॉर्ड की पुष्टि किसने की, खरीद की मात्रा किस आधार पर स्वीकृत हुई और भुगतान जारी करने से पहले किन दस्तावेजों की जाँच की गई। यदि अनियमितता प्रमाणित होती है, तो नियमों के अनुसार जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए और सरकारी धन की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए।

वास्तविक किसानों के अधिकार और पारदर्शी खरीद

ईमानदार किसान के लिए सरकारी खरीद व्यवस्था बहुत महत्त्वपूर्ण है। किसान महीनों मेहनत करके धान तैयार करता है और उम्मीद करता है कि उसे निर्धारित समर्थन मूल्य पर उपज बेचने का अवसर मिलेगा। ऐसे में खरीद प्रक्रिया पारदर्शी रहना, वास्तविक किसानों का रिकॉर्ड सही होना और भुगतान समय पर मिलना आवश्यक है। किसी भी अनियमितता की जाँच इस तरह होनी चाहिए कि वास्तविक किसान परेशान न हों और दोषी पाए जाने वालों की जवाबदेही तय हो।

धान अधिप्राप्ति और पैक्स व्यवस्था से जुड़ी 3 जरूरी बातें

ऑनलाइन आवेदन का खसरा-खतियान खुद जांचें: साइबर कैफे या बिचौलिए के भरोसे न रहें; आवेदन भरते समय अपनी जमीन का खाता, खेसरा और वास्तविक रकबा खुद चेक करें ताकि आपका रकबा किसी दूसरे के आवेदन में फर्जी तरीके से न चढ़ जाए।

राजस्व कर्मचारी और CO स्तर के सत्यापन की जिम्मेदारी: केवल आवेदन भर देना खरीद की गारंटी नहीं होता; अंचल कार्यालय के राजस्व कर्मचारियों को जमीन के वास्तविक मालिकाना हक और खेत में खड़ी फसल की भौतिक जांच करने के बाद ही रिपोर्ट लगानी चाहिए।

पक्की रसीद और वजन पर्ची अनिवार्य लें: पैक्स में धान देते समय तौल कांटे पर डिजिटल पावती और बैंक खाते में अंतरण की पुष्टि जरूर लें; बिना रसीद के धान छोड़ना बिचौलियों को फर्जीवाड़े का मौका देता है।

निष्कर्ष: सरकारी समर्थन मूल्य पर धान खरीद की व्यवस्था किसानों की आर्थिक रीढ़ है, लेकिन 6 एकड़ को 124 एकड़ दिखाकर करोड़ों के भुगतान जैसे मामले पूरी प्रणाली की साख पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार और सहकारिता विभाग डिजिटल पोर्टल, भू-अभिलेख और भौतिक गोदाम का त्रि-स्तरीय सत्यापन कड़ा करे, ताकि दोषी अधिकारियों व बिचौलियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो सके और वास्तविक व ईमानदार किसान को बिना परेशानी के उसकी उपज का पूरा दाम मिल सके।

अस्वीकरण (Disclaimer): यह खोजी व विश्लेषणात्मक रिपोर्ट Anil Kumar Prasad द्वारा विभिन्न प्रशासनिक जांच रिपोर्टों, समाचार स्रोतों और आधिकारिक एफआईआर में दर्ज आरोपों के अध्ययन के आधार पर तैयार की गई है। प्रस्तुत आंकड़े रिपोर्टों में लगाए गए आरोपों पर आधारित हैं; अंतिम दोष और जिम्मेदारी सक्षम जांच एजेंसियों व न्यायालय के अंतिम निर्णय के अधीन है। इस विषय पर अपने क्षेत्र की स्थिति और विचार जरूर साझा करें।

आपकी राय में धान खरीद में जमीन के रकबे, उत्पादन और भुगतान का सत्यापन किस तरह होना चाहिए, ताकि वास्तविक किसानों को उनका हक मिले और सरकारी धन का दुरुपयोग रोका जा सके? अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. पूर्वी चंपारण के रामगढ़वा पैक्स में धान खरीद से जुड़ा मुख्य आरोप क्या है?

उत्तर: आरोप है कि कुछ किसानों के आवेदनों में लगभग 6 एकड़ जमीन को कुल 124 एकड़ दर्शाकर करीब 1,889 क्विंटल धान की उपज दिखाई गई और लगभग 45 लाख रुपये के भुगतान का विवरण तैयार किया गया।

Q2. जमीन के रिकॉर्ड और धान आवेदन में क्या विसंगति पाई गई?

उत्तर: भूमि पोर्टल पर जहां वास्तविक रकबा मात्र 22.97 डिसमिल या 70.29 डिसमिल दर्ज था, वहीं आवेदन में उसे 6 एकड़ से लेकर 20 एकड़ तक बढ़ाकर दिखाया गया था।

Q3. पैक्स प्रबंधन ने इस गड़बड़ी पर क्या सफाई दी है?

उत्तर: पैक्स प्रबंधक ने कहा कि साइबर कैफे से ऑनलाइन आवेदन भरते समय तकनीकी गलतियां हो सकती हैं और कई जमीनों के रिकॉर्ड ऑनलाइन पोर्टल पर उपलब्ध न होने से यह भ्रम हुआ।

Q4. बिहार के अन्य किन जिलों में पैक्स के खिलाफ प्राथमिकियां दर्ज हुई हैं?

उत्तर: रिपोर्टों के अनुसार बांका के भवानीपुर-कठौन पैक्स (करीब ₹1 करोड़), भोजपुर के तियर पैक्स (₹43.80 लाख) और दरभंगा के सनहपुर पैक्स (₹2.77 लाख) में गड़बड़ी को लेकर एफआईआर दर्ज की गई हैं।

Q5. धान खरीद में इस तरह के फर्जीवाड़े को रोकने का सही तरीका क्या है?

उत्तर: किसान के भूमि रिकॉर्ड को बिहार भूमि पोर्टल (ऑनलाइन जमाबंदी) से सीधे ऑटो-लिंक किया जाए, राजस्व कर्मचारियों द्वारा भौतिक स्थलीय जांच अनिवार्य हो और गोदाम में धान की आवक का डिजिटल स्टॉक ऑडिट हो।

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