दिलीप सिंह भाटी की असफल उद्यमी से सफल पुदीना उत्पादक बनने की यात्रा इस बात की गवाह है कि विशेषीकृत खेती किस तरह पारंपरिक व्यवसायों की तुलना में अधिक लाभकारी और टिकाऊ विकल्प बन सकती है। राजस्थान के टिनवारी क्षेत्र के बलरावा गांव निवासी भाटी ने दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़कर करीब 13 वर्षों तक गुजरात के ऑयल मिलिंग सेक्टर में काम किया। अनुभव तो मिला, लेकिन आय की संभावनाएं सीमित रहीं।
वर्ष 2010 में राजस्थान लौटकर उन्होंने खेती के साथ ऑयल मिल व्यवसाय शुरू किया, पर लगातार घाटे के चलते 2017 में उसे बंद करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने पूरी तरह कृषि पर ध्यान केंद्रित किया और पुदीना की खेती को अपना मुख्य व्यवसाय बनाया। छोटे स्तर से शुरुआत कर भाटी ने पुदीना का रकबा बढ़ाकर करीब 150 बीघा कर लिया है, जबकि कुल मिलाकर लगभग 250 बीघा भूमि पट्टे पर लेकर खेती कर रहे हैं।
उन्होंने मशीनीकरण में निवेश किया है और अब छह ट्रैक्टर सहित आधुनिक कृषि उपकरणों के साथ खेती करते हैं। व्यवस्थित फसल प्रबंधन, हरी खाद, जैविक इनपुट और चरणबद्ध बुवाई से वे साल के अधिकांश समय कटाई कर पाते हैं। एक रोपाई चक्र में करीब आठ महीनों में सात कटिंग मिलती हैं। बाजार की मांग के अनुसार वे हरा और सूखा, दोनों तरह का पुदीना बेचते हैं। हरा पुदीना 30-50 प्रति किलो बिकता है, जबकि सूखा पुदीना कम रिकवरी के कारण कहीं अधिक कीमत पर जाता है।
सिर्फ पुदीना से ही भाटी की सालाना आय करीब 60 लाख तक पहुंच गई है। वे दिल्ली, जयपुर और अहमदाबाद की प्रमुख मंडियों में ताजा पुदीना भेजते हैं, जबकि सूखा पुदीना मसाला कंपनियों और क्षेत्रीय बाजारों में जाता है। पीक सीजन में व्यापारी सीधे खेत से खरीद करते हैं, जिससे विपणन लागत भी घटती है। भाटी की सफलता से प्रेरित होकर क्षेत्र में पुदीना की खेती का रकबा तेजी से बढ़ा है और अब 20,000 बीघा से अधिक क्षेत्र में यह फसल उगाई जा रही है, क्योंकि इसकी मांग स्थिर और रिटर्न मजबूत माने जा रहे हैं।
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