केंद्र सरकार उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने और यूरिया की अत्यधिक खपत पर अंकुश लगाने के लिए एग्रीस्टैक जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का परीक्षण कर रही है। केंद्रीय कृषि सचिव रजत कुमार मिश्रा ने बताया कि इस पहल के तहत भूमि अभिलेख, उर्वरक उपयोग और बोई गई फसलों के डेटा को आपस में जोड़कर फसलों की वास्तविक पोषक तत्व आवश्यकता तय की जा रही है, ताकि उर्वरकों का लक्षित और वैज्ञानिक उपयोग संभव हो सके।
मिश्रा के अनुसार, चार राज्यों में चल रहे सात पायलट प्रोजेक्ट्स में अब तक करीब 60 प्रतिशत डेटा का मिलान हो चुका है। जैसे ही यह स्तर 80 प्रतिशत तक पहुंचेगा, सरकार नीति स्तर पर ठोस कदम उठाने की तैयारी में है। उन्होंने बताया कि हरियाणा में चल रहे एक पायलट प्रोजेक्ट में महज चार महीनों के भीतर 1.02 लाख टन यूरिया और 72,000 टन से अधिक डीएपी की बचत दर्ज की गई है, जो डिजिटल निगरानी की प्रभावशीलता को दर्शाता है।
कृषि सचिव ने कहा कि देश में लगभग 35 प्रतिशत किसान यूरिया की असमान रूप से अधिक खपत करते हैं। इसकी प्रमुख वजह छोटी जोत, सीमित पूंजी और यूरिया का अन्य पोषक तत्वों की तुलना में सस्ता होना है। इस प्रवृत्ति को बदलने के लिए सरकार ने 163 उच्च-खपत वाले जिलों में विशेष जागरूकता अभियान शुरू किए हैं। साथ ही, जमीनी स्तर पर निगरानी और सलाह के लिए 1.56 लाख से अधिक ‘धरती माता निगरानी समितियों’ का गठन किया गया है।
इस अवसर पर नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद ने कहा कि बीते वर्षों में फसल उत्पादकता में आई बढ़ोतरी को देखते हुए आदर्श एनपीके यानी नाइट्रोजन-फॉस्फोरस-पोटाश अनुपात की भी पुनर्समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि उर्वरक सिफारिशें वर्तमान उत्पादन स्तर और मिट्टी की जरूरतों के अनुरूप हो सकें। सरकार का मानना है कि डेटा-आधारित निर्णयों से न केवल उर्वरक सब्सिडी का बोझ घटेगा, बल्कि मिट्टी की सेहत सुधरेगी और दीर्घकालिक कृषि टिकाऊपन को भी मजबूती मिलेगी।
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