डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय द्वारा हाल ही में जारी नीति-पत्र में बताया गया है कि यदि बिहार में हल्दी के लिए एक समग्र, राज्य-स्तरीय और सुविचारित कार्ययोजना लागू की जाती है, तो इससे किसानों की आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी संभव है और राज्य को भारत की हल्दी अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धी शक्ति के रूप में स्थापित किया जा सकता है। इस रणनीतिक बदलाव का केंद्र समस्तीपुर को बनाए जाने की परिकल्पना की गई है, जो पहले से ही बिहार का प्रमुख हल्दी उत्पादक जिला है।
नीति-पत्र में राज्य-स्तरीय हल्दी कार्ययोजना के निर्माण पर जोर दिया गया है, साथ ही बिहार में उगाई जा रही हल्दी किस्मों के लिए भौगोलिक संकेतक अवसरों को आगे बढ़ाने की सिफारिश की गई है, ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिहार की हल्दी को अलग पहचान मिल सके। विश्वविद्यालय द्वारा विकसित दो उन्नत किस्में राजेंद्र सोनिया और राजेंद्र सोनालिका इस पूरी रणनीति की धुरी मानी जा रही हैं।
दस्तावेज़ के अनुसार, इन किस्मों की संभावित पैदावार क्रमशः 40 से 45 टन प्रति हेक्टेयर और 50 से 55 टन प्रति हेक्टेयर आंकी गई है, जो पारंपरिक किस्मों की तुलना में कहीं अधिक है। खास बात यह है कि इनमें 7 से 8.4 प्रतिशत तक कर्फ्यूमिन पाया जाता है, जो GI-टैग प्राप्त प्रसिद्ध लाकाडोंग हल्दी करीब 7.5 प्रतिशत से भी अधिक है। इससे स्पष्ट है कि गुणवत्ता के मोर्चे पर बिहार की उन्नत किस्में वैश्विक मानकों पर खरी उतर सकती हैं।
राजेंद्र सोनिया को किसानों के बीच तेज़ी से स्वीकार्यता मिली है। इसकी रोपण सामग्री की मांग अब केवल बिहार तक सीमित नहीं रही, बल्कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र, पंजाब, गुजरात, छत्तीसगढ़ और असम जैसे राज्यों तक फैल चुकी है। यह रुझान संकेत देता है कि यदि मजबूत विपणन और प्रसंस्करण ढांचा विकसित किया जाए, तो बिहार की हल्दी राष्ट्रीय स्तर पर एक सशक्त ब्रांड के रूप में उभर सकती है।
वर्तमान में बिहार की राष्ट्रीय हल्दी उत्पादन में हिस्सेदारी मात्र 0.25 प्रतिशत है, लेकिन समस्तीपुर जिला इसमें अहम भूमिका निभाता है। नीति-पत्र के अनुसार, यह जिला राज्य के कुल हल्दी उत्पादन का 55 प्रतिशत से अधिक योगदान देता है। वर्ष 2022-23 में समस्तीपुर ने 1.54 हजार हेक्टेयर क्षेत्र से लगभग 1.56 हजार टन हल्दी का उत्पादन किया। हालांकि, औसत उत्पादकता अभी 1.01 टन प्रति हेक्टेयर ही है, जिसे तकनीकी हस्तक्षेप, उन्नत बीज, वैज्ञानिक खेती और बेहतर प्रबंधन से कई गुना बढ़ाया जा सकता है।
किसानों की आय बढ़ाने और रोजगार सृजन के उद्देश्य से नीति-पत्र में हल्दी को समस्तीपुर का फोकस कृषि उत्पाद घोषित करने का सुझाव दिया गया है। इसमें किसान उत्पादक संगठनों को मजबूत करने, उनके माध्यम से संगठित विपणन विकसित करने और विशेष रूप से समस्तीपुर में प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना पर जोर दिया गया है। उल्लेखनीय है कि ‘एक जिला एक उत्पाद’ कार्यक्रम के तहत पहले ही हल्दी को जिले की पहचान के रूप में चुना जा चुका है।
इसके अलावा, गैर-डेयरी कृषि उत्पादों के लिए राज्य-स्तरीय मार्केटिंग फेडरेशन को साझा ब्रांड के तहत स्थापित करने, किसानों व अन्य हितधारकों के क्षमता निर्माण, और हल्दी की पत्तियों से एसेन्शियल ऑयल जैसे उप-उत्पादों के विकास पर भी विशेष बल दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन उप-उत्पादों से बिहार में अतिरिक्त आय के साथ-साथ कृषि-आधारित उद्योगों में नए रोजगार अवसर सृजित हो सकते हैं।
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