आज के समय में खेती किसानों के लिए तभी लाभदायक हो सकती है जब किसान वैज्ञानिक तरीके से खेती करें और ऐसी उन्नत किस्मों का चुनाव करें जो कम समय में अधिक उत्पादन दें, रोगों से सुरक्षित रहें और बदलते मौसम को सहन कर सकें। इसी दिशा में देश के अग्रणी कृषि संस्थानों में से एक भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित मूँग की कई उन्नत किस्में पूरे भारत के किसानों के लिए एक मजबूत विकल्प बनकर सामने आई हैं। इन किस्मों का चयन विभिन्न जलवायु परिस्थितियों, मिट्टी के प्रकार और खेती प्रणालियों को ध्यान में रखकर किया गया है, जिससे छोटे, सीमांत और बड़े किसान लाभ उठा सकें।
किसानों के नजरिए से देखें तो मूँग एक ऐसी फसल है जो कम लागत, कम पानी और कम समय में तैयार होकर अच्छी आय देने की क्षमता रखती है। विशेष रूप से गेहूँ या धान की कटाई के बाद खाली खेत में मूँग की खेती करने से अतिरिक्त आमदनी के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ती है। यह फसल नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से जमीन को उपजाऊ बनाती है, जिससे अगली फसल की लागत भी कम हो जाती है। इसलिए सही किस्म का चयन किसानों के लिए उत्पादन और मुनाफे दोनों को प्रभावित करता है।
पूसा 1641 जैसी जल्दी पकने वाली किस्म किसानों के लिए बहुत उपयोगी है, क्योंकि यह लगभग 60 से 65 दिनों में तैयार हो जाती है और पीला मोज़ेक वायरस के प्रति सहनशील है। जिन क्षेत्रों में मौसम तेजी से बदलता है या किसानों को कम समय में फसल लेनी होती है, उनके लिए यह किस्म काफी लाभदायक साबित हो सकती है। इससे किसान गेहूँ या धान की मुख्य फसलों के बीच अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं और खेत खाली नहीं रहता।
इसी तरह पूसा 1431 और पीएमडी 10 जैसी किस्में भी कम अवधि में अच्छी उपज देती हैं और विभिन्न रोगों के प्रति सहनशील हैं। इन किस्मों का सबसे बड़ा फायदा यह है कि मौसम की अनिश्चितता के बावजूद इनका उत्पादन स्थिर रहता है। इससे किसानों को जोखिम कम होता है और आय में स्थिरता आती है। कई किसान बताते हैं कि सही किस्म और प्रबंधन अपनाने से उन्हें प्रति एकड़ 4 से 5 क्विंटल तक उत्पादन मिल रहा है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है।
जिन किसानों की भूमि में लवणीयता या पानी की समस्या है, उनके लिए पीएमएस 8 जैसी किस्म उपयोगी विकल्प हो सकती है। यह किस्म ऐसे क्षेत्रों में भी बेहतर प्रदर्शन करती है जहाँ सामान्य किस्में कमजोर पड़ जाती हैं। इसके अलावा पूसा 1371 पहाड़ी और ठंडे क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है, जिससे उत्तर भारत के विविध जलवायु क्षेत्रों में भी मूँग की खेती को बढ़ावा मिल सकता है।
किसानों के लिए केवल उन्नत किस्म चुनना ही पर्याप्त नहीं है। सही प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। प्रमाणित बीज का उपयोग, बीज उपचार, संतुलित उर्वरक, समय पर सिंचाई और सफेद मक्खी जैसे कीटों का नियंत्रण करना जरूरी है। विशेष रूप से फूल आने और दाना बनने के समय सिंचाई का ध्यान रखने से उत्पादन में स्पष्ट वृद्धि देखी जाती है। इसके साथ ही खेत की नियमित निगरानी करने से रोग और कीट का प्रकोप शुरुआती अवस्था में ही नियंत्रित किया जा सकता है।
आज के समय में जब खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, तब मूँग जैसी दलहनी फसलें किसानों के लिए आय का मजबूत आधार बन सकती हैं। यह फसल कम लागत, कम जोखिम और बेहतर बाजार मूल्य के कारण छोटे किसानों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है। यदि वैज्ञानिक सलाह, उन्नत किस्म और सही तकनीक अपनाई जाए तो खेती को लाभदायक बनाया जा सकता है और मिट्टी की सेहत भी सुधारी जा सकती है।
अंत में किसान भाइयों, यदि आप अपनी खेती में बदलाव लाना चाहते हैं और कम समय में अतिरिक्त आय प्राप्त करना चाहते हैं, तो मूँग की उन्नत किस्मों को जरूर अपनाएं। अपने क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी के अनुसार किस्म का चयन करें और नजदीकी कृषि वैज्ञानिक या कृषि विभाग से सलाह लेकर खेती करें। यह न केवल आपकी आय बढ़ाएगा बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए मिट्टी को भी सुरक्षित रखेगा।
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