भारत विश्व का सबसे बड़ा केला उत्पादक देश है। वर्तमान में देश में लगभग 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में केले की खेती की जाती है तथा वार्षिक उत्पादन लगभग 37 से 38 मिलियन टन के आसपास है। बिहार, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक एवं मध्य प्रदेश प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। बिहार में भी पिछले दो दशकों में केले का क्षेत्रफल, उत्पादन और उत्पादकता उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, अत्यधिक तापमान तथा नए रोगों एवं कीटों के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए केवल उन्नत किस्में लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक “Do’s And Don’ts” का पालन करना भी अत्यंत आवश्यक हो गया है।
गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री का चयन सबसे महत्वपूर्ण
केले की सफल खेती की शुरुआत स्वस्थ एवं रोगमुक्त रोपण सामग्री से होती है। यदि सकर (प्रकंद) का उपयोग किया जा रहा हो तो उसे केवल स्वस्थ एवं अधिक उत्पादन देने वाले मातृ पौधों से ही लेना चाहिए। रोगग्रस्त या कमजोर पौधों से लिए गए प्रकंद खेत में अनेक रोगों के प्रवेश का प्रमुख माध्यम बन जाते हैं।
मातृ पौधे से प्रकंद अलग करते समय कुदाल अथवा लोहे की पट्टी की सहायता से दोनों को जोड़ने वाले ऊतक को सावधानीपूर्वक अलग करें। प्रकंद के पास अपनी विकसित जड़ प्रणाली अवश्य होनी चाहिए ताकि रोपाई के बाद पौधा शीघ्र स्थापित हो सके। जिन प्रकंदों का पहला या दूसरा पत्ता संकरा (Sword Sucker) होता है, वे अधिक उपयुक्त माने जाते हैं।
चौड़े पत्तों वाले “Water Suckers” अपेक्षाकृत कमजोर होते हैं और भविष्य में कम उत्पादन देते हैं। आज के समय में रोगमुक्त टिश्यू कल्चर पौधों का उपयोग सबसे सुरक्षित एवं लाभदायक विकल्प माना जाता है, विशेषकर व्यावसायिक खेती के लिए।
अधिक सिंचाई से बचें
केले को पर्याप्त नमी की आवश्यकता होती है, लेकिन जलभराव बिल्कुल सहन नहीं होता। अत्यधिक सिंचाई करने से प्रकंद सड़ने लगते हैं, जड़ें नष्ट हो जाती हैं और अंततः पौधे मर सकते हैं। वर्तमान समय में ड्रिप सिंचाई एवं फर्टिगेशन सबसे प्रभावी तकनीक मानी जाती है। इससे 35 से 50 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है, उर्वरकों का उपयोग अधिक दक्षता से होता है तथा उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। वर्षा ऋतु में खेत में जल निकासी की समुचित व्यवस्था अवश्य रखें।
बंची टॉप वायरस से रहें सतर्क
केले का बंची टॉप वायरस (Banana Bunchy Top Virus) विश्व के सबसे विनाशकारी रोगों में से एक है। एक बार पौधा संक्रमित हो जाए तो उसका उपचार संभव नहीं है। संक्रमित पौधे बौने रह जाते हैं, नई पत्तियाँ छोटी एवं गुच्छेदार निकलती हैं तथा फल उत्पादन लगभग समाप्त हो जाता है।
यह रोग एफिड (Pentalonia Nigronervosa) द्वारा फैलता है। यदि मातृ पौधा संक्रमित है तो उससे जुड़े सभी सकर भी संक्रमित हो जाते हैं। इसलिए कभी भी रोगग्रस्त पौधों से रोपण सामग्री न लें तथा ऐसे क्षेत्रों से प्रकंद लाकर दूसरे खेतों में न लगाएँ। संक्रमित पौधों को तुरंत उखाड़कर नष्ट करें तथा एफिड नियंत्रण के लिए समेकित कीट प्रबंधन अपनाएँ।
पौधों की देखभाल में छोटी सावधानियाँ भी हैं महत्वपूर्ण
यदि रोपाई के बाद कोई पौधा यांत्रिक कारणों से क्षतिग्रस्त हो जाए, लेकिन उसका प्रकंद जीवित हो, तो पौधे को लगभग आधा काट देने पर पुनः स्वस्थ वृद्धि होने की संभावना रहती है। पौधों की नियमित निगरानी करें। सूखी एवं रोगग्रस्त पत्तियों को समय-समय पर हटाएँ। खेत को खरपतवार मुक्त रखें तथा प्रत्येक पौधे के साथ केवल आवश्यक संख्या में स्वस्थ सकर ही रखें। इससे पौधों में पर्याप्त प्रकाश एवं वायु संचार बना रहता है।
संतुलित पोषण अपनाएँ
यदि जैविक खेती करनी हो तो केवल अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट, जैव उर्वरक एवं अन्य कार्बनिक स्रोतों का उपयोग करें। रासायनिक एवं जैविक पोषण के संतुलित उपयोग से मृदा स्वास्थ्य, सूक्ष्मजीव गतिविधि तथा दीर्घकालीन उत्पादकता बेहतर बनी रहती है। जलवायु परिवर्तन की परिस्थितियों में सिलिकॉन, सूक्ष्म पोषक तत्व तथा जैविक कार्बन आधारित प्रबंधन पौधों की सहनशीलता बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं।
बंच प्रबंधन से बढ़ती है गुणवत्ता
जब घौद (बंच) में नए फल बनने बंद हो जाएँ, तब नीचे लटक रहे मुख्य नर पुष्प (Male Bud) को काट देना चाहिए। इससे पौधे के पोषक तत्व फल विकास में अधिक उपयोग होते हैं, फलों का आकार एवं गुणवत्ता बेहतर होती है तथा कई कीट एवं रोगों का प्रकोप भी कम होता है। घौद पर सुरक्षात्मक आवरण (Bunch Covering) लगाने से धूप, कीटों तथा यांत्रिक क्षति से फल सुरक्षित रहते हैं और बाजार में बेहतर मूल्य प्राप्त होता है।
कटाई एवं कटाई उपरांत प्रबंधन
कटाई से लगभग एक सप्ताह पहले सिंचाई बंद कर देना उचित रहता है। इससे खेत में श्रमिकों की आवाजाही, कटाई एवं परिवहन में सुविधा होती है। कटाई केवल तब करें जब फल लगभग तीन-चौथाई विकसित (Three-Fourth Mature) हो जाएँ। केवल स्वस्थ, हरे, पूर्ण विकसित एवं खरोंच, सनबर्न, चोट अथवा विकृति से मुक्त गुच्छों का चयन करें।
विकृत अथवा क्षतिग्रस्त फलों को तुरंत अलग कर दें। गुच्छे को पहले हैंड से लगभग 20 से 25 सेमी ऊपर अथवा पहली उँगलियों से 7.5 से 10 सेमी ऊपर एक ही बार में काटें। कटाई के बाद लगभग 15 मिनट तक लेटेक्स का प्रवाह रुकने दें, तत्पश्चात स्ट्रेचर या गद्देदार साधनों से पैकिंग शेड तक पहुँचाएँ। खेत के समीप अस्थायी छायादार पैकिंग शेड बनाना लाभदायक रहता है, जहाँ फलों की सफाई, ग्रेडिंग, आवश्यक फफूंदनाशी उपचार तथा पैकिंग सुरक्षित रूप से की जा सके।
क्या करें (Do’s)
केवल स्वस्थ, रोगमुक्त एवं प्रमाणित रोपण सामग्री का उपयोग करें। जहाँ संभव हो, प्रमाणित टिश्यू कल्चर पौधों को प्राथमिकता दें।उचित जल निकासी एवं ड्रिप सिंचाई अपनाएँ। नियमित रूप से रोग एवं कीटों की निगरानी करें। संतुलित पोषण, जैव उर्वरकों एवं कार्बनिक पदार्थों का समुचित उपयोग करें। नर पुष्प हटाकर वैज्ञानिक बंच प्रबंधन अपनाएँ। समय पर कटाई, ग्रेडिंग एवं वैज्ञानिक पैकिंग करें। खेत की स्वच्छता एवं पौधों की नियमित देखभाल बनाए रखें।
क्या न करें (Don’ts)
रोगग्रस्त मातृ पौधों से सकर न लें। जलभराव अथवा अत्यधिक सिंचाई न करें। बंची टॉप प्रभावित क्षेत्रों से रोपण सामग्री न लाएँ।संक्रमित पौधों को खेत में न छोड़ें। क्षतिग्रस्त एवं विकृत फलों को बाजार हेतु न रखें। कटाई एवं परिवहन के दौरान गुच्छों को गिरने या चोट लगने से बचाएँ। बिना परीक्षण के अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का प्रयोग न करें।
निष्कर्ष: केले की खेती में छोटी-छोटी वैज्ञानिक सावधानियाँ ही बड़े आर्थिक लाभ का आधार बनती हैं। गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री, स्वस्थ मातृ पौधों का चयन, जल प्रबंधन, समेकित रोग एवं कीट नियंत्रण, संतुलित पोषण, वैज्ञानिक बंच प्रबंधन तथा आधुनिक कटाई एवं कटाई उपरांत तकनीकों को अपनाकर किसान न केवल उत्पादन एवं गुणवत्ता बढ़ा सकते हैं, बल्कि बदलती जलवायु परिस्थितियों में भी अपनी खेती को अधिक टिकाऊ, लाभकारी एवं प्रतिस्पर्धी बना सकते हैं।
आने वाले वर्षों में डिजिटल कृषि, सेंसर आधारित सिंचाई, ड्रोन निगरानी, जैविक एवं सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकों तथा जलवायु-स्मार्ट कृषि पद्धतियों का समावेश केले की खेती को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
Frequently Asked Questions (FAQ)
Q. केले की रोपाई के लिए कौन सा सकर (Sucker) सबसे उपयुक्त माना जाता है?
उत्तर: जिन प्रकंदों का पहला या दूसरा पत्ता संकरा होता है (Sword Sucker), वे खेती के लिए सबसे उपयुक्त माने जाते हैं। चौड़े पत्तों वाले Water Suckers कमजोर होते हैं और कम उत्पादन देते हैं।
Q. केले में बंची टॉप वायरस (Banana Bunchy Top Virus) कैसे फैलता है और इसका नियंत्रण कैसे करें?
उत्तर: यह वायरस एफिड (Aphid) कीट द्वारा फैलता है। संक्रमित पौधा ठीक नहीं हो सकता, इसलिए संक्रमित पौधों को तुरंत उखाड़कर नष्ट करें, एफिड नियंत्रण के लिए आईपीएम अपनाएं और प्रमाणित रोगमुक्त पौधों का ही उपयोग करें।
Q. केले के घौद से नर पुष्प (Male Bud) को काटना क्यों आवश्यक है?
उत्तर: जब घौद में नए फल बनना बंद हो जाएं, तब मुख्य नर पुष्प काटने से पौधे के पोषक तत्व सीधे फलों के विकास में उपयोग होते हैं, जिससे फलों का आकार, वजन और गुणवत्ता बेहतर होती है।
Q. केले की फसल में ड्रिप सिंचाई प्रणाली अपनाने के क्या फायदे हैं?
उत्तर: ड्रिप सिंचाई और फर्टिगेशन तकनीक से 35 से 50 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है, उर्वरकों की बर्बादी रुकती है और प्रकंद सड़न (Rhizome Rot) जैसी समस्याओं से बचाव होता है।
Q. केले के फलों की कटाई किस अवस्था में करनी चाहिए?
उत्तर: केले की कटाई तब करनी चाहिए जब फल लगभग तीन-चौथाई विकसित (Three-Fourth Mature) हो जाएं और उन पर खरोंच या चोट के निशान न हों। कटाई से 1 सप्ताह पूर्व सिंचाई रोक देनी चाहिए।
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प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह- विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी, पूर्व प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना एवं पूर्व सह निदेशक अनुसंधान, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर ( बिहार )
