बिना यूरिया-डीएपी के खेती कैसे करें? जानें प्राकृतिक खेती का वैज्ञानिक तरीका

पिछले कुछ वर्षों में खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। यूरिया, डीएपी, पोटाश, कीटनाशक और मजदूरी के बढ़ते खर्च ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे में एक सवाल बार-बार उठता है कि क्या बिना रासायनिक खादों के खेती संभव है? क्या प्राकृतिक खेती या जैविक खेती अपनाकर भी अच्छी पैदावार और मुनाफा लिया जा सकता है?

इस सवाल का जवाब न तो पूरी तरह “हां” है और न ही पूरी तरह “नहीं”। वास्तविकता यह है कि बिना रासायनिक खादों के खेती की जा सकती है, लेकिन इसके लिए सही योजना, धैर्य और वैज्ञानिक तरीके अपनाने की जरूरत होती है। जो किसान यह सोचते हैं कि आज यूरिया-डीएपी बंद कर देंगे और कल से पहले जैसी या उससे ज्यादा पैदावार मिलने लगेगी, उन्हें निराशा हो सकती है।

वहीं जो किसान धीरे-धीरे मिट्टी को पुनर्जीवित करने का काम करते हैं, उन्हें लंबे समय में अच्छे परिणाम मिल सकते हैं। आज हमारी अधिकांश कृषि भूमि वर्षों से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर हो चुकी है। लगातार यूरिया और डीएपी के उपयोग से मिट्टी की जैविक गतिविधियां कम हुई हैं। मिट्टी में मौजूद लाभकारी जीवाणु, केंचुए और सूक्ष्मजीवों की संख्या पहले की तुलना में काफी कम हो गई है।

यही कारण है कि हर साल अधिक खाद डालने के बावजूद उत्पादन में अपेक्षित वृद्धि नहीं दिखाई देती। कई कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि मिट्टी केवल एनपीके (नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश) से ही उपजाऊ नहीं बनती। मिट्टी की वास्तविक ताकत उसके ऑर्गेनिक कार्बन, सूक्ष्मजीवों और जैविक गतिविधियों में छिपी होती है।

जब मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ता है तो पौधों को पोषक तत्वों की उपलब्धता बेहतर होती है और फसल की सहनशीलता भी बढ़ती है।प्राकृतिक खेती का मूल सिद्धांत यही है कि मिट्टी को जीवित रखा जाए। जीवित मिट्टी स्वयं पौधों को पोषण देने की क्षमता विकसित कर लेती है। इसके लिए जीवामृत, बीजामृत, गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद, फसल अवशेष और जैविक सूक्ष्मजीवों का उपयोग किया जाता है। हालांकि किसानों को यह समझना होगा कि प्राकृतिक खेती कोई जादू नहीं है।

यदि किसी खेत में कई वर्षों से केवल रासायनिक खादों का उपयोग हुआ है तो उस खेत को दोबारा संतुलित होने में समय लगेगा। शुरुआत के एक-दो वर्षों में कुछ फसलों में उत्पादन में 10 से 20 प्रतिशत तक कमी देखने को मिल सकती है। लेकिन इस दौरान खेती की लागत भी काफी घट जाती है क्योंकि महंगी खाद और कीटनाशकों पर खर्च कम हो जाता है।

तीसरे और चौथे वर्ष तक स्थिति काफी बदलने लगती है। मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ने लगता है, लाभकारी सूक्ष्मजीव सक्रिय हो जाते हैं और पौधों की जड़ें अधिक मजबूत बनती हैं। इस समय तक उत्पादन सामान्य खेती के बराबर पहुंच सकता है। कई किसानों ने अनुभव किया है कि लागत कम होने के कारण शुद्ध लाभ रासायनिक खेती से भी अधिक प्राप्त हुआ।

प्राकृतिक खेती में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका जीवामृत की मानी जाती है। जीवामृत देसी गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन और मिट्टी से तैयार किया जाता है। यह मिश्रण खेत में करोड़ों लाभकारी सूक्ष्मजीवों को सक्रिय करता है। ये सूक्ष्मजीव मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों को घुलनशील बनाकर पौधों तक पहुंचाने में मदद करते हैं।

इसी तरह बीजामृत का उपयोग बीज उपचार के लिए किया जाता है। इससे बीजजनित रोगों का खतरा कम होता है और अंकुरण बेहतर होता है। बीजामृत और जीवामृत प्राकृतिक खेती के दो प्रमुख आधार माने जाते हैं। फसल चक्र भी प्राकृतिक खेती का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। यदि किसान लगातार एक ही फसल उगाते हैं तो मिट्टी में कुछ विशेष पोषक तत्वों की कमी होने लगती है।

लेकिन जब अनाज वाली फसलों के बाद दलहनी फसलें जैसे मूंग, उड़द, चना या ढैंचा उगाई जाती हैं तो मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन का स्तर बढ़ता है। इससे अगली फसल को लाभ मिलता है। मल्चिंग या आच्छादन भी खेती की लागत कम करने और मिट्टी को स्वस्थ रखने का प्रभावी तरीका है। फसल अवशेष, सूखी घास या पत्तियों को खेत में बिछाने से नमी लंबे समय तक बनी रहती है। इससे सिंचाई की आवश्यकता कम होती है और मिट्टी का तापमान भी संतुलित रहता है।

साथ ही केंचुओं और लाभकारी जीवों की संख्या बढ़ती है। रोग और कीट प्रबंधन के लिए भी कई जैविक विकल्प उपलब्ध हैं। ट्राइकोडर्मा, स्यूडोमोनास, बवेरिया, बेसियाना, समुंद्री शैवाल, माइक्रोराइजा, और मेटाराइजियम जैसे जैव एजेंट फफूंद और कीटों के नियंत्रण में मदद करते हैं। इनका उपयोग करने से रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम हो सकती है।

एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि प्राकृतिक खेती हर क्षेत्र और हर किसान के लिए एक जैसी नहीं हो सकती। जिन क्षेत्रों में मिट्टी पहले से जैविक पदार्थों से भरपूर है, वहां परिणाम जल्दी मिल सकते हैं। वहीं जिन क्षेत्रों में लंबे समय से रासायनिक खेती हो रही है, वहां परिवर्तन में अधिक समय लग सकता है।

किसानों के लिए सबसे अच्छा तरीका यह हो सकता है कि वे एकदम से पूरे खेत में बदलाव न करें। पहले एक छोटे हिस्से यानी प्रति एकड़ खेत में प्रयोग करें। वहां जीवामृत, गोबर खाद, वार्मी कंपोस्ट, जैविक उपचार और फसल चक्र अपनाएं। परिणाम देखने के बाद धीरे-धीरे क्षेत्र बढ़ाएं। इससे जोखिम कम रहेगा और अनुभव भी बढ़ेगा।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि प्राकृतिक खेती का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं बल्कि मिट्टी, पानी और पर्यावरण को सुरक्षित रखना भी है। आज भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, मिट्टी की उर्वरता घट रही है और खेती की लागत बढ़ रही है। ऐसे में टिकाऊ कृषि पद्धतियों पर विचार करना समय की मांग बन चुका है। भविष्य की खेती केवल अधिक खाद डालने से नहीं चलेगी। भविष्य की खेती मिट्टी के स्वास्थ्य, जल संरक्षण और संतुलित पोषण पर आधारित होगी।

चाहे किसान पूरी तरह प्राकृतिक खेती अपनाएं या एकीकृत पोषण प्रबंधन, दोनों ही स्थितियों में जैविक पदार्थों का उपयोग बढ़ाना आवश्यक है। किसानों के लिए खेती में सफलता का कोई एक फार्मूला नहीं होता। हर खेत, हर मिट्टी और हर क्षेत्र की अपनी परिस्थितियां होती हैं। इसलिए किसी भी नई तकनीक को अपनाने से पहले छोटे स्तर पर परीक्षण जरूर करें।

धीरे-धीरे अनुभव और परिणामों के आधार पर आगे बढ़ें। बिना यूरिया और डीएपी के खेती संभव है, लेकिन इसके लिए मिट्टी को पुनर्जीवित करने का धैर्य और सही तकनीक अपनाने की आवश्यकता होती है।  जो किसान मिट्टी को केवल उत्पादन का साधन नहीं बल्कि एक जीवित संसाधन मानते हैं, वे लंबे समय में अधिक टिकाऊ और लाभदायक खेती की ओर बढ़ सकते हैं।

निष्कर्ष: रासायनिक खादों और कीटनाशकों के बढ़ते खर्च के बीच बिना यूरिया और डीएपी के खेती करना पूरी तरह संभव है, लेकिन इसके लिए जादुई परिणाम की उम्मीद के बजाय धैर्य और सही वैज्ञानिक तरीकों की जरूरत है।

वर्षों से रसायनों पर निर्भर रही मिट्टी को पुनर्जीवित करने और उसका ‘ऑर्गेनिक कार्बन’ बढ़ाने में 2 से 3 साल का समय लग सकता है, जिसके लिए जीवामृत, फसल चक्र, मल्चिंग और जैविक कीट प्रबंधन जैसे प्राकृतिक विकल्प अपनाने होंगे। शुरुआत में पैदावार में थोड़ी कमी आ सकती है, लेकिन लागत में भारी गिरावट आने के कारण किसानों का शुद्ध मुनाफा बढ़ता है।

समझदारी इसी में है कि किसान भाई अचानक पूरे खेत में बदलाव करने के बजाय पहले एक छोटे हिस्से (जैसे एक एकड़) से शुरुआत करें, और धीरे-धीरे अनुभव के साथ इसका दायरा बढ़ाएं ताकि मिट्टी के स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा के साथ-साथ खेती को लंबे समय तक टिकाऊ और लाभदायक बनाया जा सके।

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