ब्यावरा में सड़ गया ₹3.57 करोड़ का गेहूं, किसानों ने पूछा- हमारी मेहनत पर तेजाब क्यों?

किसानों के लिए यह लेख केवल एक खबर नहीं है, बल्कि यह उस दर्द, उस पीड़ा और उस हताशा का दस्तावेज़ है जो इस देश का हर किसान अपने सीने में दबाए हुए है। हम दिन-रात मिट्टी में मिल कर, अपना खून-पसीना एक करके जो अनाज पैदा करते हैं, जिसे हम भगवान मानकर पूजते हैं, आज वही अनाज सरकारी सिस्टम की लापरवाही और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है।

ब्यावरा के यादव वेयरहाउस से जो तस्वीरें और खबरें सामने आई हैं, वह किसी भी किसान का कलेजा चीर देने के लिए काफी हैं।सोचिए, एक किसान जेठ की तपती दुपहरी में लू के थपेड़े सहकर खेत जोतता है। पूस की कड़कड़ाती ठंड में जब पूरी दुनिया रजाई में सो रही होती है, तब वह रात के अंधेरे में पानी से भरे खेतों में नंगे पैर सिंचाई करता है।

कर्ज लेकर खाद, बीज और कीटनाशक लाता है। कई बार कुदरत की मार, कभी ओलावृष्टि तो कभी सूखे से लड़कर वह फसल को अपने बच्चों की तरह पालता है। हमारा मकसद सिर्फ पैसा कमाना नहीं होता, हमारा मकसद होता है कि देश का कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए। लेकिन जब हमारा वही पसीने से सींचा हुआ अनाज सरकारी गोदामों में सड़ता है, उसमें घुन और कीड़े लग जाते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने हमारी मेहनत पर तेजाब डाल दिया हो।

खबर के अनुसार, ब्यावरा के प्रभुकृपा परिसर स्थित यादव वेयरहाउस में 13,600 क्विंटल से ज्यादा सरकारी गेहूं कीड़ों की भेंट चढ़ गया है। यह कोई मामूली आंकड़ा नहीं है। यह लगभग 3.57 करोड़ रुपये कीमत का वह अनाज था जो इस देश के गरीब, मजदूर और जरूरतमंद लोगों के निवाले के लिए रखा गया था।

आज वह गेहूं सड़कर पूरी तरह से बुरादा बन चुका है। सिस्टम की यह लापरवाही केवल आर्थिक नुकसान नहीं है, यह अन्न का अपमान है, किसान की तपस्या का अपमान है और उन लाखों गरीबों का हक छीनने जैसा है जो राशन की दुकानों से मिलने वाले इसी अनाज के भरोसे अपना परिवार पालते हैं।

सबसे ज्यादा पीड़ादायक बात यह है कि इस पूरी बर्बादी के पीछे किसी प्राकृतिक आपदा का हाथ नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से मानव जनित आपदा है, जिसे हम सिस्टम का भ्रष्टाचार कहते हैं। वेयरहाउस मालिकों को सरकार हर महीने चार से आठ लाख रुपये तक का भारी-भरकम किराया सिर्फ इसलिए देती है ताकि अनाज सुरक्षित रहे।

नियम कहते हैं कि हर पंद्रह दिन में कीटनाशक का छिड़काव होना चाहिए और हर तीन महीने में कीटनाशक गोलियां रखी जानी चाहिए। लेकिन हकीकत क्या है? हकीकत यह है कि मुनाफे के लालच में न तो समय पर दवाइयां छिड़की गईं और न ही रखरखाव के कोई बुनियादी इंतजाम किए गए।

जब जवाबदेही की बात आती है, तो हमारे अधिकारी कैसे पल्ला झाड़ते हैं, यह भी इस खबर में साफ दिखाई देता है। वेयरहाउस कॉरपोरेशन के ब्रांच मैनेजर संजय दांगी का बयान पढ़कर हैरानी होती है। उनका कहना है कि जिन बोरियों में कीड़े लगे हैं, वह उनके चार्ज लेने से पहले का मामला है।

यह कैसा सिस्टम है? जब एक अधिकारी कुर्सी पर बैठता है, तो क्या वह सिर्फ अपनी तनख्वाह और सुविधाओं का चार्ज लेता है, जिम्मेदारियों का नहीं? यदि अनाज उनके चार्ज लेने से पहले भी खराब हो रहा था, तो पिछले ढाई महीनों में उन्होंने उसे बचाने के लिए आपातकालीन कदम क्यों नहीं उठाए?

इस तरह के बयान सिर्फ यह साबित करते हैं कि ऊपर से नीचे तक कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। सब एक-दूसरे पर दोष मढ़कर अपनी गर्दन बचाना चाहते हैं। अब जरा इस स्थिति की तुलना एक आम किसान की स्थिति से कीजिए। जब किसान अपना गेहूं लेकर सरकारी खरीदी केंद्रों या मंडियों में जाते हैं, तो हमारे साथ कैसा व्यवहार होता है?

वहां बैठे अधिकारी और क्वालिटी कंट्रोलर हमारे गेहूं में हजार कमियां निकालते हैं। कभी कहा जाता है कि गेहूं में नमी ज्यादा है, कभी कहते हैं कि दाना बारीक है, तो कभी रंगत पर सवाल उठा दिए जाते हैं। जरा सी कमी होने पर हमारी पूरी की पूरी ट्रॉली रिजेक्ट कर दी जाती है। किसान को अपनी उपज बेचने के लिए खरीदी केंद्रों के बाहर ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में कई-कई दिनों और रातों तक इंतजार करना पड़ता है।

किसान वहां मच्छरों के बीच सोते हैं, भूखे-प्यासे रहते हैं, सिर्फ इसलिए कि हमारी फसल सही दाम पर बिक जाए। जब किसान से अनाज खरीदा जाता है, तब तो सिस्टम बहुत सख्त होता है, लेकिन वही अनाज जब सरकारी गोदामों में पहुंच जाता है, तो वहां उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होता।

वहां वह खुलेआम सड़ता है, कीड़े उसे खाते हैं, लेकिन तब किसी अधिकारी का क्वालिटी चेक काम नहीं आता। यह दोहरा मापदंड आखिर क्यों? किसान से कड़ाई और वेयरहाउस मालिकों, बिचौलियों को पूरी छूट? यही नहीं, खरीदी केंद्रों पर बिचौलियों का जो बोलबाला है, वह किसी से छिपा नहीं है। असली किसान को एमएसपी का लाभ समय पर नहीं मिलता।

उसे भुगतान के लिए हफ्तों चक्कर काटने पड़ते हैं। दूसरी तरफ, बिचौलिए जो किसानों से औने-पौने दाम पर फसल खरीद लेते हैं, वे सांठगांठ करके अपनी फसल आसानी से सरकारी सिस्टम में खपा देते हैं। यह पूरा ढांचा इस तरह से काम कर रहा है कि इसमें हर तरफ से किसान ही पिस रहा है। यह 3.57 करोड़ रुपये का नुकसान सिर्फ सरकार का नुकसान नहीं है।

यह जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा है जो टैक्स के रूप में दिया गया था। इसी पैसे से किसानों की भलाई के लिए योजनाएं बन सकती थीं, गांवों में सिंचाई के साधन उपलब्ध कराए जा सकते थे, या कर्जमाफी की जा सकती थी। लेकिन यह करोड़ों रुपया कुछ भ्रष्ट लोगों की लापरवाही की वजह से मिट्टी में मिल गया। देश के किसान ससरकार और प्रशासन से सीधे सवाल पूछना चाहते हैं।

आखिर कब तक किसानों की मेहनत को इस तरह मिट्टी में मिलाया जाता रहेगा? क्या इस मामले में उन अधिकारियों और वेयरहाउस मालिकों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए जिन्होंने गरीबों का निवाला कीड़ों को खिला दिया? सरकार को एक ऐसी पारदर्शी नीति बनानी चाहिए जिसमें गोदामों में रखे अनाज की हर महीने स्वतंत्र ऑडिटिंग हो।

अगर एक भी बोरी अनाज खराब होता है, तो उसकी पूरी भरपाई उस वेयरहाउस के मालिक और संबंधित अधिकारी की संपत्ति कुर्क करके की जानी चाहिए। जब तक सजा सख्त नहीं होगी, तब तक यह भ्रष्टाचार रुकने वाला नहीं है। अब समय आ गया है कि सभी किसानों को एकजुट होकर इस सड़े हुए सिस्टम के खिलाफ आवाज उठानी होगी।

अगर हम आज चुप रहे, तो कल फिर किसी और गोदाम में हमारा उगाया हुआ अनाज इसी तरह सड़ेगा और अधिकारी कागजों में हेराफेरी करके बच निकलेंगे। हमें अन्न का सम्मान और अपनी मेहनत की कद्र करवानी होगी। किसानों से इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए कुछ सवाल पूछना चाहता हूं।

क्या आपने भी कभी मंडियों या खरीदी केंद्रों पर अधिकारियों की ऐसी मनमानी का सामना किया है?

आपके अनुसार, गोदामों में अनाज सड़ने के इस महापाप के लिए असली जिम्मेदार कौन है, सरकार, अधिकारी या वेयरहाउस मालिक?

ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सरकार को क्या सख्त कदम उठाने चाहिए?

क्या आपको लगता है कि एमएसपी पर खरीदी की प्रक्रिया में बिचौलियों को खत्म करने के लिए कोई नया सिस्टम बनना चाहिए?

निष्कर्ष: ब्यावरा के यादव वेयरहाउस की यह दर्दनाक घटना कोई इकलौता मामला नहीं, बल्कि हमारे देश के उस पूरे सिस्टम की नाकामी का आईना है जो किसान की हाड़-तोड़ मेहनत की कद्र करना भूल चुका है।

एक तरफ जब किसान अपनी फसल का एक-एक दाना बेचने के लिए मंडियों में कड़कड़ाती ठंड और तपती धूप में कड़े नियमों और अधिकारियों की मनमानी का सामना करता है, वहीं दूसरी तरफ उसी अनाज को सरकारी गोदामों में भ्रष्टाचार और लापरवाही की दीमक चाट जाती है। 3.57 करोड़ रुपये के गेहूं का सड़कर बुरादा बन जाना सिर्फ एक आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि इस देश के अन्नदाता की तपस्या का अपमान और लाखों गरीबों के निवाले पर डकैती है।

अब समय आ गया है कि जिम्मेदार अधिकारियों और वेयरहाउस मालिकों की जवाबदेही तय कर उन पर सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि कागजी दावों से इतर धरातल पर अन्न और किसान दोनों की गरिमा सुरक्षित रह सके; क्योंकि जब तक व्यवस्था का यह दोहरा मापदंड नहीं बदलेगा, तब तक ‘जय किसान’ का नारा अधूरा ही रहेगा।

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