खारी और क्षारीय मिट्टी में भी बंपर पैदावार देगी सरसों की नई किस्म ‘CSR-68’, करनाल के वैज्ञानिकों ने विकसित की

देश के लाखों किसान वर्षों से एक ऐसी समस्या से जूझ रहे हैं, जिसका समाधान केवल खाद, बीज या सिंचाई बढ़ाने से संभव नहीं था। यह समस्या है लवणीय (खारी) और क्षारीय मिट्टी की। ऐसी भूमि में फसलें या तो ठीक से उगती नहीं हैं, या फिर उत्पादन इतना कम होता है कि खेती घाटे का सौदा बन जाती है।

उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, गुजरात और देश के कई अन्य राज्यों में हजारों हेक्टेयर भूमि आज भी इसी समस्या से प्रभावित है। ऐसे में किसानों के लिए राहत की खबर यह है कि वैज्ञानिकों ने सरसों की एक नई किस्म सीएसआर-68 (CSR-68) विकसित की है, जो लवणीय मिट्टी में भी अच्छी पैदावार देने में सक्षम बताई जा रही है। यदि यह किस्म बड़े स्तर पर सफल होती है, तो उन किसानों के लिए नई उम्मीद बन सकती है जिनकी जमीन वर्षों से खारेपन के कारण कम उत्पादन दे रही है।

CSSRI करनाल के वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि

यह नई किस्म आईसीएआर-केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (CSSRI), करनाल के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई है। संस्थान का उद्देश्य ऐसी फसल किस्में तैयार करना है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन दे सकें। सीएसआर-68 इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।

वैज्ञानिकों का दावा है कि यह किस्म केवल सामान्य खेतों में ही नहीं, बल्कि लवणीय और क्षारीय मिट्टी में भी अच्छी वृद्धि और बेहतर उत्पादन देने की क्षमता रखती है। इससे उन क्षेत्रों में भी सरसों की खेती का विस्तार संभव होगा, जहां किसान अब तक कम पैदावार के कारण दूसरी फसलों की ओर मजबूर थे।

सरसों की किस्म CSR-68 की मुख्य विशेषताएं

समाचार के अनुसार, इस नई किस्म की औसत पौधे की ऊंचाई लगभग 190 सेंटीमीटर तक होती है। पौधा मजबूत होने के कारण गिरने (Lodging) की संभावना कम रहती है। इसकी फलियां अच्छी संख्या में बनती हैं और दानों का विकास भी बेहतर होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह किस्म प्रतिकूल परिस्थितियों में भी स्थिर उत्पादन देने की क्षमता रखती है। यही कारण है कि इसे विशेष रूप से उन किसानों के लिए उपयोगी माना जा रहा है जिनकी जमीन में लवणता या क्षारीयता की समस्या है।

सरसों भारत की सबसे महत्वपूर्ण तिलहनी फसलों में से एक है। देश खाद्य तेल के मामले में अभी भी बड़ी मात्रा में आयात पर निर्भर है। हर वर्ष अरबों रुपये का खाद्य तेल विदेशों से खरीदा जाता है। यदि ऐसी उन्नत किस्में किसानों तक तेजी से पहुंचती हैं और उनका बड़े पैमाने पर विस्तार होता है, तो देश में सरसों का उत्पादन बढ़ सकता है। इससे किसानों की आय में वृद्धि के साथ-साथ खाद्य तेल आयात पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है।

लवणीय मिट्टी में खेती की चुनौतियां और CSR-68 का महत्व

लवणीय मिट्टी में खेती करना आसान नहीं होता। ऐसी भूमि में बीज का अंकुरण कमजोर रहता है, पौधों की जड़ें ठीक से विकसित नहीं हो पातीं और पोषक तत्वों का अवशोषण भी प्रभावित होता है।

परिणामस्वरूप उत्पादन सामान्य भूमि की तुलना में काफी कम रह जाता है। सीएसआर-68 जैसी किस्मों का विकास इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ये कठिन परिस्थितियों में भी फसल उत्पादन बनाए रखने का प्रयास करती हैं। यदि किसान सही कृषि तकनीकों के साथ इस किस्म को अपनाते हैं, तो अनुपयोगी या कम उपयोगी भूमि से भी बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

बीज उपलब्धता और प्रबंधन: सबसे बड़ी चुनौती

हालांकि केवल नई किस्म विकसित कर देना ही पर्याप्त नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह बीज किसानों तक समय पर और पर्याप्त मात्रा में पहुंचे। अक्सर देखा गया है कि नई विकसित किस्मों की जानकारी तो किसानों तक पहुंच जाती है, लेकिन बीज उपलब्ध नहीं हो पाता। कई बार सीमित उत्पादन के कारण बीज केवल कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित रह जाता है। इसलिए आवश्यक है कि बीज उत्पादन, प्रमाणित बीज वितरण और कृषि विभाग के माध्यम से इसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए।

किसानों को यह भी समझना होगा कि कोई भी नई किस्म तभी अच्छा परिणाम देती है जब उसके साथ वैज्ञानिक खेती की पूरी तकनीक अपनाई जाए। केवल नया बीज लेने से उत्पादन नहीं बढ़ेगा। समय पर बुवाई, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण, सिंचाई प्रबंधन और रोग-कीट नियंत्रण भी उतने ही आवश्यक हैं। यदि इन सभी पहलुओं पर ध्यान दिया जाए, तभी सीएसआर-68 जैसी उन्नत किस्म अपनी वास्तविक क्षमता दिखा सकेगी।

टिकाऊ कृषि और खाद्य तेल उत्पादन में आत्मनिर्भरता

विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती जलवायु और बढ़ती भूमि क्षारीयता को देखते हुए भविष्य में ऐसी किस्मों की आवश्यकता और बढ़ेगी। कई क्षेत्रों में सिंचाई के लिए उपयोग होने वाले पानी में भी लवणता बढ़ रही है। ऐसे में ऐसी फसल किस्में, जो प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन कर सकें, कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

यदि आपके क्षेत्र की मिट्टी में लवणीयता या क्षारीयता की समस्या है, तो इस किस्म के बारे में अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विभाग से जानकारी अवश्य प्राप्त करें। प्रमाणित स्रोत से ही बीज खरीदें और वैज्ञानिकों द्वारा अनुशंसित तकनीक के अनुसार इसकी खेती करें। इससे बेहतर उत्पादन और अधिक लाभ मिलने की संभावना बढ़ सकती है।

निष्कर्ष: भारत को खाद्य तेल उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए केवल क्षेत्रफल बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि ऐसी उन्नत और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सफल किस्मों को किसानों तक पहुंचाना भी उतना ही आवश्यक है। सीएसआर-68 इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। यदि इसका व्यापक स्तर पर विस्तार होता है और किसान इसे सफलतापूर्वक अपनाते हैं, तो यह न केवल लवणीय भूमि वाले किसानों की आय बढ़ाएगी, बल्कि देश के तिलहन उत्पादन को भी नई दिशा दे सकती है।

Frequently Asked Questions (FAQ)

Q. सरसों की नई किस्म सीएसआर-68 (CSR-68) को किस संस्थान ने विकसित किया है?

Ans. इस उन्नत किस्म को आईसीएआर-केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (CSSRI), करनाल के कृषि वैज्ञानिकों द्वारा विशेष रूप से विकसित किया गया है।

Q. CSR-68 किस्म की सबसे बड़ी खासियत क्या है?

Ans. इस किस्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सामान्य खेतों के साथ-साथ लवणीय (खारी) और क्षारीय मिट्टी में भी अच्छी वृद्धि करने और स्थिर व बेहतर उत्पादन देने की क्षमता रखती है।

Q. सरसों की CSR-68 किस्म के पौधे की औसत ऊंचाई कितनी होती है?

Ans. वैज्ञानिकों के अनुसार, इस किस्म के पौधे की औसत ऊंचाई लगभग 190 सेंटीमीटर तक होती है। इसका पौधा मजबूत होता है, जिससे तेज हवाओं में फसल के गिरने (Lodging) का खतरा बहुत कम रहता है।

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