धान में जिंक डालने से पहले रुकें! DAP के साथ मिलाकर कहीं आप भी तो नहीं कर रहे यह बड़ी गलती? जानिए सही वैज्ञानिक तरीका

धान की खेती में अच्छी पैदावार केवल अधिक यूरिया डालने से नहीं मिलती, बल्कि सही समय पर सही पोषक तत्व देने से मिलती है। अक्सर किसान भाई धान की रोपाई के 15 से 20 दिन बाद पौधों की बढ़वार कम देखकर तुरंत यूरिया, जिंक, लोहा या दूसरे सूक्ष्म पोषक तत्व डालना शुरू कर देते हैं। बाजार में भी आज जिंक के कई प्रकार उपलब्ध हैं, जैसे जिंक सल्फेट 21%, जिंक सल्फेट 33%, चिलेटेड जिंक, लिक्विड जिंक, जिंक ऑक्साइड, जिंक ईडीटीए और विभिन्न माइक्रोन्यूट्रिएंट मिश्रण।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि आखिर कौन-सा जिंक कब डालें और किस स्थिति में कौन-सा विकल्प सबसे बेहतर रहेगा। यदि इस विषय की सही जानकारी नहीं होगी तो किसान अनजाने में हजारों रुपये की खाद खेत में डालकर भी उसका पूरा लाभ नहीं ले पाएगा। धान की रोपाई के बाद शुरुआती लगभग 20 दिनों तक पौधे का मुख्य ध्यान जड़ों के विकास पर रहता है।

इस अवस्था में सबसे अधिक आवश्यकता फास्फोरस की होती है क्योंकि मजबूत जड़ें ही आगे चलकर अधिक कल्ले, अधिक बालियां और बेहतर उत्पादन की नींव रखती हैं। इसके बाद जैसे-जैसे पौधा तेजी से बढ़ना शुरू करता है, नाइट्रोजन, जिंक, लोहा, मैग्नीशियम, मैंगनीज और सल्फर जैसे पोषक तत्वों की आवश्यकता बढ़ जाती है। यदि इस समय इन पोषक तत्वों की कमी हो जाए तो पौधे की बढ़वार रुक जाती है, पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, कल्ले कम निकलते हैं और अंततः उत्पादन प्रभावित होता है।

लेकिन यहां सबसे बड़ी गलती कई किसान यह करते हैं कि डीएपी, एनपीके या सिंगल सुपर फास्फेट डालने के तुरंत बाद जिंक सल्फेट भी मिट्टी में मिला देते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से यह तरीका सही नहीं माना जाता। डीएपी में उपस्थित फास्फोरस और जिंक सल्फेट में मौजूद जिंक आपस में प्रतिक्रिया करके जिंक फास्फेट जैसा अघुलनशील यौगिक बना सकते हैं। यह यौगिक पानी में नहीं घुलता, इसलिए पौधों की जड़ें न तो जिंक को सही मात्रा में ले पाती हैं और न ही फास्फोरस का पूरा लाभ मिल पाता है।

जिंक के विभिन्न प्रकार: कौन-सा है सबसे बेहतर?

इसका अर्थ यह है कि किसान का पैसा खर्च होने के बावजूद दोनों पोषक तत्वों की उपलब्धता कम हो जाती है। यदि आपने खेत तैयार करते समय डीएपी, एनपीके या एसएसपी का प्रयोग किया है तो उसी समय जिंक सल्फेट मिलाने से बचना चाहिए। ऐसी स्थिति में जिंक ऑक्साइड आधारित उत्पाद, कोटेड जिंक या चिलेटेड जिंक अपेक्षाकृत बेहतर विकल्प माने जाते हैं क्योंकि इनकी प्रतिक्रिया फास्फोरस के साथ उतनी तीव्र नहीं होती जितनी जिंक सल्फेट की होती है।

मिट्टी का पीएच (pH) और पोषक तत्वों का गणित

यदि खेत में पहले फास्फोरस नहीं डाला गया है तो सामान्य स्थिति में जिंक सल्फेट का उपयोग किया जा सकता है। मिट्टी का पीएच भी इस पूरे विषय में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि आपकी मिट्टी का पीएच लगभग 6.5 से 7 के बीच है तो अधिकांश पोषक तत्व आसानी से पौधों को उपलब्ध हो जाते हैं। लेकिन जैसे ही पीएच 7.5 या उससे ऊपर पहुंचता है, जिंक, लोहा, मैंगनीज, कॉपर और बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता तेजी से कम होने लगती है।

किसान चाहे जितनी मात्रा में जिंक या लोहा मिट्टी में डाल दे, उसका बड़ा हिस्सा मिट्टी में ही स्थिर हो जाता है और पौधे तक नहीं पहुंच पाता। यही कारण है कि क्षारीय मिट्टी वाले क्षेत्रों में कई बार बार-बार खाद डालने के बावजूद पौधों में कमी के लक्षण दिखाई देते हैं।ऐसी मिट्टी में केवल मिट्टी के माध्यम से पोषण देना हमेशा पर्याप्त नहीं होता।

इस स्थिति में पत्तियों पर स्प्रे करना अधिक प्रभावी तरीका माना जाता है। जब पोषक तत्व सीधे पत्तियों पर दिए जाते हैं तो वे स्टोमेटा और क्यूटिकल के माध्यम से सीधे पौधे के अंदर प्रवेश कर जाते हैं और मिट्टी की पीएच का प्रभाव काफी हद तक समाप्त हो जाता है। इसलिए जिन क्षेत्रों में मिट्टी का पीएच अधिक है वहां फोलियर स्प्रे से जिंक, लोहा और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व देना अधिक लाभदायक रहता है। जिंक के विभिन्न प्रकारों की बात करें तो जिंक सल्फेट सबसे सामान्य और सस्ता स्रोत है।

यदि खेत में फास्फोरस पहले से नहीं डाला गया है और मिट्टी का पीएच सामान्य है तो इसका उपयोग किया जा सकता है। वहीं चिलेटेड जिंक अपेक्षाकृत महंगा होता है लेकिन इसकी उपलब्धता पौधों के लिए अधिक होती है। विशेष रूप से उच्च पीएच वाली मिट्टियों में इसका प्रभाव सामान्य जिंक सल्फेट की तुलना में बेहतर देखा जाता है। आजकल आयनिक जिंक आधारित उत्पाद भी बाजार में उपलब्ध हैं। इन उत्पादों में जिंक पहले से ही ऐसे रूप में होता है जिसे पौधे आसानी से अवशोषित कर लेते हैं।

इनकी विशेषता यह है कि इनकी जैव उपलब्धता (Bioavailability) अधिक होती है और पौधों की कोशिकाओं तक इनका पहुंचना आसान होता है। इसी कारण कम मात्रा में भी इनका अच्छा प्रभाव देखने को मिलता है। हालांकि इनकी कीमत सामान्य जिंक सल्फेट से अधिक होती है, इसलिए किसान को अपनी मिट्टी की स्थिति, बजट और आवश्यकता के अनुसार चुनाव करना चाहिए।

यदि खेत में लोहे की कमी दिखाई दे रही है तो फेरस सल्फेट का प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन उच्च पीएच वाली मिट्टियों में इसका प्रभाव भी सीमित हो जाता है। ऐसे क्षेत्रों में चिलेटेड आयरन या आयनिक आयरन का स्प्रे बेहतर परिणाम दे सकता है। इसी प्रकार मैग्नीशियम की कमी होने पर मैग्नीशियम सल्फेट तथा मैंगनीज की कमी होने पर मैंगनीज सल्फेट या चिलेटेड मैंगनीज का उपयोग किया जा सकता है। धान की बढ़वार के समय केवल नाइट्रोजन पर निर्भर रहना भी सही रणनीति नहीं है।

कई किसान यह मान लेते हैं कि हरियाली केवल यूरिया से आती है, जबकि वास्तव में जिंक, लोहा, मैग्नीशियम, सल्फर और मैंगनीज जैसे तत्व भी क्लोरोफिल निर्माण, प्रकाश संश्लेषण, एंजाइम क्रियाओं और पौधों की समग्र वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि इनमें से किसी एक तत्व की कमी हो जाए तो पर्याप्त यूरिया देने के बाद भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते।

यदि खेत में पत्तियां हल्की पीली पड़ रही हैं, नई पत्तियों की वृद्धि धीमी है, कल्ले कम निकल रहे हैं या पौधे कमजोर दिखाई दे रहे हैं तो सबसे पहले मिट्टी और पौधों की स्थिति का आकलन करना चाहिए। बिना आवश्यकता के किसी भी खाद या सूक्ष्म पोषक तत्व का प्रयोग करना आर्थिक दृष्टि से भी नुकसानदायक हो सकता है। यदि संभव हो तो मिट्टी परीक्षण कराकर ही पोषण प्रबंधन की योजना बनानी चाहिए। धान में बेहतर उत्पादन के लिए संतुलित पोषण सबसे महत्वपूर्ण है।

रोपाई के समय पर्याप्त फास्फोरस, शुरुआती बढ़वार में संतुलित नाइट्रोजन, समय पर जिंक और आवश्यकता अनुसार लोहा, मैग्नीशियम, मैंगनीज तथा सल्फर देने से पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं, कल्ले अधिक निकलते हैं, पत्तियां गहरे हरे रंग की रहती हैं और अंततः अधिक बालियां तथा बेहतर दाना भराव प्राप्त होता है। केवल अधिक खाद डालना समाधान नहीं है, बल्कि सही समय, सही मात्रा और सही रूप में पोषक तत्व देना ही सफल खेती की पहचान है।

इसलिए अगली बार जब आप धान की फसल में जिंक या अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व देने की योजना बनाएं, तो यह अवश्य ध्यान रखें कि आपकी मिट्टी का पीएच कितना है, खेत में पहले कौन-सी खाद डाली जा चुकी है और जिस पोषक तत्व का प्रयोग कर रहे हैं, उसका स्वरूप क्या है। यही छोटी-छोटी वैज्ञानिक बातें आपकी खाद की लागत बचाने के साथ-साथ धान की उपज और गुणवत्ता दोनों को बेहतर बना सकती हैं।

निष्कर्ष: धान की सफल और मुनाफे वाली खेती केवल महंगी खादें खरीदने से नहीं, बल्कि उनके सही इस्तेमाल के विज्ञान को समझने से होती है। डीएपी और जिंक सल्फेट को एक साथ मिलाकर खेत में फेंकना पैसे और पोषक तत्व दोनों की बर्बादी है।

यदि आपकी मिट्टी का पीएच अधिक है, तो जमीन में अंधाधुंध खाद डालने के बजाय ‘फोलियर स्प्रे’ (पत्तियों पर छिड़काव) जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाएं। मिट्टी की सेहत, पुरानी खादों के इतिहास और सही समय को ध्यान में रखकर लिया गया एक छोटा सा वैज्ञानिक निर्णय आपकी खेती की लागत को आधा और धान की पैदावार को दोगुना कर सकता है।

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