कपास का शुल्क-मुक्त आयात बढ़ा तो घरेलू कीमतों पर पड़ेगा असर, गिरावट की आशंका

भारत में कपास की कीमतें फिलहाल लगभग 9,000 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास बनी हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में आई तेजी और घरेलू उत्पादन में कमी की आशंका से कीमतों को सहारा मिल रहा है। वैश्विक स्तर पर कपास के दाम तीन साल के उच्च स्तर पर पहुंच गए हैं, जहां वायदा कारोबार 88 सेंट और हाजिर बाजार 80 सेंट प्रति पाउंड के करीब दर्ज किया गया है। अमेरिकी कृषि विभाग ने भी भारत सहित वैश्विक स्तर पर कपास उत्पादन घटने का अनुमान जताया है।

सूखे से फसल को नुकसान और 11% आयात शुल्क छूट का असर

कपास का बुवाई रकबा पिछले वर्ष के लगभग समान रहने के बावजूद महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और गुजरात के कई क्षेत्रों में अपर्याप्त बारिश के कारण फसल को नुकसान पहुंचा है। इससे देश में कुल उत्पादन घटने की आशंका प्रबल हो गई है। घरेलू उपलब्धता बढ़ाने और कीमतों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से सरकार ने 1 जून से 31 अक्टूबर तक 11 प्रतिशत आयात शुल्क समाप्त किया था, जिसके तहत पूरे वित्त वर्ष में आयात रिकॉर्ड 64 लाख गांठ तक पहुंचने का अनुमान है।

31 दिसंबर तक शुल्क-मुक्त आयात बढ़ाने की सिफारिश

सस्ते कच्चे माल की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कपड़ा उद्योग ने आयात शुल्क छूट की अवधि 31 दिसंबर तक बढ़ाने की मांग की है। हालांकि, कृषि विशेषज्ञों ने इस प्रस्तावित विस्तार के समय को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। देश में नया कपास विपणन सीजन 1 अक्टूबर से शुरू हो रहा है और अक्टूबर से जनवरी के बीच घरेलू नई फसल की मुख्य आवक मंडियों में पहुंचेगी।

किसानों पर दोहरी मार की आशंका

विशेषज्ञों की चेतावनी है कि घरेलू नई फसल की आवक और शुल्क मुक्त आयात का एक साथ बढ़ना बाजार में कपास की कीमतों पर अत्यधिक दबाव बना सकता है। सूखे के कारण पहले ही कम पैदावार की मार झेल रहे किसानों के लिए कीमतों में गिरावट दोहरी आर्थिक चुनौती बन सकती है, जिससे कपास उत्पादकों के वित्तीय संकट में वृद्धि होने की आशंका है।

निष्कर्ष: कपड़ा उद्योग को सस्ता कच्चा माल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुल्क-मुक्त आयात की अवधि को 31 दिसंबर तक बढ़ाना भले ही विनिर्माण क्षेत्र के लिए राहत भरा कदम लगे, लेकिन नए विपणन सीजन में घरेलू फसल की आवक के ठीक समय यह फैसला किसानों के लिए आर्थिक झटका साबित हो सकता है। सूखे और प्रतिकूल मौसम के कारण पहले ही कम उत्पादन की मार झेल रहे किसानों को यदि मंडियों में उचित मूल्य नहीं मिला, तो उनकी लागत निकलना भी मुश्किल हो जाएगा।

ऐसे में सरकार को कपड़ा उद्योग की आवश्यकताओं और अन्नदाता के हितों के बीच संतुलन साधते हुए एक संतुलित व्यापार नीति अपनानी चाहिए, जिसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर पुख्ता सरकारी खरीद की गारंटी और आवश्यकता पड़ने पर आयात पर तर्कसंगत नियंत्रण शामिल हो, ताकि कपास उत्पादक किसानों को वित्तीय संकट से बचाया जा सके।

Frequently Asked Questions (FAQ)

Q1. वर्तमान में भारत में कपास के औसत मंडी भाव क्या चल रहे हैं?

उत्तर: अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूती और उत्पादन घटने की आशंका के चलते वर्तमान में घरेलू मंडियों में कपास के भाव लगभग ₹9,000 प्रति क्विंटल के आसपास बने हुए हैं।

Q2. सरकार ने कपास पर कितना आयात शुल्क माफ किया था?

उत्तर: घरेलू बाजार में कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाने और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने 1 जून से 31 अक्टूबर तक 11 प्रतिशत का आयात शुल्क पूरी तरह समाप्त किया था।

Q3. कपड़ा उद्योग (Textile Industry) की क्या मांग है?

उत्तर: सस्ता कच्चा माल लगातार पाने के लिए कपड़ा उद्योग मांग कर रहा है कि 11 प्रतिशत शुल्क-मुक्त आयात की छूट को 31 अक्टूबर से बढ़ाकर 31 दिसंबर तक कर दिया जाए।

Q4. शुल्क-मुक्त आयात बढ़ने से किसानों को क्या नुकसान हो सकता है?

उत्तर: अक्टूबर से जनवरी के बीच देश में नई फसल की मुख्य आवक मंडियों में होती है। यदि उसी समय सस्ता विदेशी कपास बड़ी मात्रा में आएगा, तो स्थानीय मंडियों में कपास के दाम तेजी से गिर सकते हैं, जिससे किसानों को घाटा होगा।

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