जो किसान गेहूं की बुवाई देर से की है तो इस समय फसल में बालियां निकलना शुरू हो गई होंगी। समय से बोए गए गेहूं में बालियां पूरी तरह बाहर आ चुकी हैं, जबकि देर से बोई गई फसल में अभी बाली निकलने की अवस्था चल रही है। आमतौर पर देर से बुवाई वाले गेहूं में बालियां छोटी रह जाती हैं, दाना पतला बनता है और कुल उत्पादन कम हो जाता है। लेकिन सही समय पर सही प्रबंधन कर लिया जाए तो किसान इस नुकसान को काफी हद तक कम कर सकते हैं।
सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात है नमी प्रबंधन। जब बाली निकल रही होती है, उस समय पौधे की पूरी ऊर्जा बाली के विकास में लगती है। यदि इस अवस्था में खेत में नमी की कमी हो जाए तो बाली पूरी तरह विकसित नहीं हो पाती और छोटी रह जाती है। इसलिए इस समय हल्की लेकिन समय पर सिंचाई अवश्य करें। खेत में न तो अत्यधिक पानी खड़ा रहे और न ही सूखे की स्थिति बने। संतुलित नमी ही बाली की लंबाई और दाने की संख्या को प्रभावित करती है।
दूसरी महत्वपूर्ण बात है पोटाश का प्रबंधन। इस अवस्था में अक्सर पोटेशियम की कमी सामने आती है। पोटाश पौधे में पत्तियों द्वारा बनाए गए भोजन को बाली तक पहुंचाने का काम करता है। जब बाली निकल रही हो, उस समय पोटाश का छिड़काव बहुत अच्छे परिणाम देता है। इसके लिए आप 150 लीटर पानी में एक लीटर जी-पोटाश को मिलाकर प्रति एकड़ खेत में स्प्रे कर सकते हैं।
शुरू से ही गेहूं के पौधों को पोषक तत्व मिले तो दाने की गुणवत्ता सुधारने में सहायक होता है। वहीं पोटेशियम नाइट्रेट देने से 13 प्रतिशत नाइट्रोजन और लगभग 45 प्रतिशत पोटाश मिलता है, जिससे पत्तियों का हारापन बना रहता है और पौधा सक्रिय रहता है।
इस समय ऊपर की जो अंतिम पत्ती होती है, उसे हम झंडा पत्ती या फ्लैग लीफ कहते हैं। यही पत्ती बाली को सबसे अधिक पोषण देती है। जितने समय तक यह पत्ती हरी और स्वस्थ रहेगी, उतना ही अच्छा दाना भरेगा। इसलिए पोटाश या पोटेशियम नाइट्रेट का छिड़काव फ्लैग लीफ को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करता है।
यदि आपको लगे कि फसल में सामान्य एनपीके की कमी है, पौधा दबा हुआ है या शुरुआती खाद पर्याप्त नहीं दी गई थी, तो अब खेत में दानेदार खाद डालने से लाभ नहीं मिलेगा। इस अवस्था में केवल पत्तियों पर पोषक तत्वों का छिड़काव ही प्रभावी रहेगा। ऐसे में आप जी-एनपीके का स्प्रे कर सकते हैं।
मात्रा का विशेष ध्यान रखें। 150 लीटर पानी में एक लीटर जी-एनपीके को मिलाकर प्रति एकड़ खेत में स्प्रे ठंडे वातावरण में। यही सुरक्षित और प्रभावी मात्रा है। इससे अधिक मात्रा लेने पर पत्तियों पर जलन या नुकसान हो सकता है। प्रति एकड़ में लगभग 100 से 150 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। उसी हिसाब से दवा या खाद की मात्रा तैयार करें। छिड़काव साफ टंकी से करें और बेहतर होगा कि शाम के समय स्प्रे करें ताकि पत्तियां पोषक तत्वों को अच्छे से अवशोषित कर सकें।
याद रखें, देर से बोई गई गेहूं की फसल में उत्पादन सामान्य से थोड़ा कम रहना स्वाभाविक है, लेकिन सही समय पर नमी और पोषण का प्रबंधन करके हम बाली की लंबाई, दानों की संख्या और दाने की मोटाई को बेहतर बना सकते हैं। इस अवस्था में दो बातों पर विशेष ध्यान दें: पहला, खेत में नमी की कमी न होने दें। दूसरा, पोटाश और आवश्यक पोषक तत्वों का संतुलित छिड़काव अवश्य करें।
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