सुप्रीम कोर्ट की कृषि सुधार उच्चाधिकार समिति के सदस्य एवं प्रख्यात कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि वर्ष 2000 से 2025 के बीच भारतीय किसानों को सामूहिक रूप से लगभग 110 लाख करोड़ रुपय का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा है।
ओईसीडी की वार्षिक ‘प्रोड्यूसर सपोर्ट एस्टिमेट’ रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए शर्मा ने कहा कि भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है, जहां कृषि क्षेत्र लगातार नीतिगत असंतुलन और मूल्य दबाव के कारण वित्तीय प्रतिकूलता में कार्य कर रहा है। उनके अनुसार, बीते दो दशकों में किसानों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा और घरेलू मूल्य संरचना के बीच संतुलन की कमी का खामियाजा उठाना पड़ा है।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अब तक 75 से अधिक समितियां कृषि संकट पर रिपोर्ट प्रस्तुत कर चुकी हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर ठोस और प्रभावी नीतिगत बदलाव अपेक्षित हैं। सुप्रीम कोर्ट की समिति फिलहाल विभिन्न किसान संगठनों से सुझाव आमंत्रित कर रही है और प्राप्त सुझावों के आधार पर अपनी सिफारिशें तैयार कर कर्नाटक को सौंपेगी।
शर्मा ने केंद्रीय बजट में कृषि क्षेत्र के हिस्से में आई हल्की गिरावट पर भी चिंता जताई। उनके अनुसार, कुल बजट में कृषि का हिस्सा पिछले वर्ष के 3.15 प्रतिशत से घटकर इस वर्ष 3.04 प्रतिशत रह गया है, जो कृषि क्षेत्र की प्राथमिकता पर पुनर्विचार की आवश्यकता को दर्शाता है।
देविंदर शर्मा तर्क देते हैं कि 1970 में एक सरकारी कर्मचारी का वेतन जितना बढ़ा, या एक स्कूल टीचर की तनख्वाह में जितनी वृद्धि हुई, उसकी तुलना में किसान की उपज का मूल्य (MSP) नाममात्र बढ़ा है। अगर गेहूं की कीमत भी सरकारी कर्मचारियों के भत्तों की तरह बढ़ती, तो आज गेहूं शायद 8,000 रुपए प्रति क्विंटल होता!
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