यह सवाल आज हर भारतीय किसान के मन में उठ रहा है, और इसका जवाब भी उतना ही गंभीर है। पिछले कुछ वर्षों में खेती की लागत जिस तेजी से बढ़ी है, उसने किसानों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर समस्या कहां है। पहले जहां कम खाद और कम दवाइयों में अच्छी पैदावार मिल जाती थी, वहीं आज हर सीजन में नई-नई दवाइयाँ, हर साल नई किस्में, ज्यादा मात्रा में उर्वरक और लगातार बढ़ता खर्च एक नई चुनौती बनकर सामने आ रहा है।
हरित क्रांति के समय रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग किसानों के लिए वरदान साबित हुआ था। उत्पादन बढ़ा, देश आत्मनिर्भर बना और किसानों की आय में भी सुधार देखने को मिला। लेकिन समय के साथ यह मॉडल धीरे-धीरे एक निर्भरता में बदल गया। अब स्थिति यह है कि बिना रसायनों के खेती की कल्पना भी मुश्किल लगती है। किसान हर सीजन में अधिक उत्पादन के लिए अधिक खाद और दवा का उपयोग करने लगे हैं, लेकिन इसके परिणाम उतने सकारात्मक नहीं मिल रहे जितनी उम्मीद की जाती है।
सबसे बड़ी समस्या मिट्टी की सेहत को लेकर सामने आ रही है। लगातार रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता कम होती जा रही है। मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं, जिससे पौधों को पोषण देने की उसकी प्राकृतिक क्षमता कमजोर पड़ रही है। इसका सीधा असर यह होता है कि किसान को पहले से ज्यादा खाद डालनी पड़ती है, जिससे लागत बढ़ती जाती है। यह एक ऐसा चक्र है, जिसमें किसान फँसता चला जाता है और बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।
दूसरी तरफ कीट और रोग भी समय के साथ ज्यादा मजबूत होते जा रहे हैं। पहले जिन कीटनाशकों से आसानी से नियंत्रण हो जाता था, अब वही दवाइयाँ कम असर दिखा रही हैं। इसका कारण है कीटों में विकसित हो रही प्रतिरोधक क्षमता। जब एक ही तरह की दवा बार-बार उपयोग की जाती है, तो कीट उसके प्रति सहनशील हो जाते हैं। इसके बाद किसान को या तो दवा की मात्रा बढ़ानी पड़ती है या फिर नई और महंगी दवाइयाँ अपनानी पड़ती हैं। इससे लागत और जोखिम दोनों बढ़ जाते हैं।
किसानों की सबसे बड़ी दुविधा यही है कि वे इस स्थिति से बाहर कैसे निकलें। पूरी तरह रसायनों को छोड़ देना हर किसी के लिए संभव नहीं है, क्योंकि इससे उत्पादन पर असर पड़ सकता है और तुरंत नुकसान भी हो सकता है। लेकिन केवल रसायनों पर निर्भर रहना भी लंबे समय में घाटे का सौदा बनता जा रहा है। इसलिए अब समय आ गया है कि किसान संतुलित खेती की ओर कदम बढ़ाएं।
संतुलित खेती का मतलब है कि हम रासायनिक, जैविक और पारंपरिक तरीकों का सही मिश्रण अपनाएं। उदाहरण के तौर पर, खेत में गोबर की खाद, वर्मी-कम्पोस्ट, समुंद्री शैवाल, माइक्रोराइजा, ट्राईकोडर्मा और हरी खाद का उपयोग बढ़ाया जाए। इससे मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ेगा और उसकी संरचना बेहतर होगी। साथ ही, रासायनिक उर्वरकों का उपयोग केवल जरूरत के अनुसार और वैज्ञानिक सलाह के आधार पर किया जाए। इससे लागत भी नियंत्रित रहेगी और उत्पादन भी स्थिर बना रहेगा।
कीट और रोग प्रबंधन में भी बदलाव लाना बहुत जरूरी है। केवल रासायनिक दवाइयों पर निर्भर रहने के बजाय एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) को अपनाना चाहिए। इसमें फेरोमोन ट्रैप, लाइट ट्रैप, नीम आधारित उत्पाद और जैविक कीटनाशकों का उपयोग शामिल होता है। इससे कीटों का दबाव कम होता है और रासायनिक दवाइयों की जरूरत भी घटती है। साथ ही, दवाइयों को बदल-बदल कर उपयोग करना भी जरूरी है, ताकि कीटों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित न हो।
फसल चक्र और मिश्रित खेती भी इस समस्या का मजबूत समाधान है। अगर किसान एक ही फसल को बार-बार उगाते हैं, तो मिट्टी में पोषक तत्वों का असंतुलन हो जाता है और रोग-कीट का प्रकोप बढ़ जाता है। लेकिन अगर फसल बदल-बदल कर ली जाए, जैसे दलहन और तिलहन को शामिल किया जाए, तो मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और उत्पादन में भी स्थिरता आती है। यह एक पुराना लेकिन बेहद प्रभावी तरीका है, जिसे आज फिर से अपनाने की जरूरत है।
आज के समय में तकनीक भी किसानों के लिए एक बड़ा सहारा बन सकती है। मिट्टी परीक्षण, मौसम पूर्वानुमान और आधुनिक कृषि उपकरणों का उपयोग करके किसान अपने निर्णयों को अधिक सटीक बना सकते हैं। इससे न केवल लागत कम होगी, बल्कि उत्पादन की गुणवत्ता भी बेहतर होगी। स्मार्ट खेती की ओर बढ़ना समय की मांग है।
आर्थिक दृष्टि से देखें तो अगर किसान संतुलित खेती अपनाते हैं, तो वे धीरे-धीरे अपनी लागत को 20 से 30 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं। साथ ही, मिट्टी की सेहत में सुधार होने से उत्पादन की गुणवत्ता बेहतर होती है, जिससे बाजार में अच्छे दाम मिलने की संभावना बढ़ जाती है। यह बदलाव धीरे-धीरे होता है, लेकिन इसके परिणाम लंबे समय तक टिकाऊ होते हैं।
अंत में यही कहा जा सकता है कि केमिकल के चक्रव्यूह से बाहर निकलना आसान नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं है। इसके लिए जरूरी है सही जानकारी, धैर्य और छोटे-छोटे बदलाव। अगर किसान आज से ही अपनी खेती में संतुलन लाने की कोशिश शुरू करें, तो आने वाले वर्षों में वे इस समस्या से काफी हद तक बाहर निकल सकते हैं।
खेती केवल आज की जरूरत नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की जिम्मेदारी भी है। अगर हम आज मिट्टी को बचा लेते हैं, तो भविष्य की खेती सुरक्षित रहेगी। इसलिए समय रहते जागरूक बनें और अपनी खेती को टिकाऊ बनाएं।
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