धान की बाली में पीली और काली गांठें दिखने के बाद महंगे फफूंदनाशी का छिड़काव करना केवल पैसे की बर्बादी है, क्योंकि यह कवक बाली निकलने से पहले ही फूल के ऊतकों को खत्म कर चुका होता है। यदि समय रहते बूटिंग अवस्था में सही फफूंदनाशी और संतुलित पोषण का फॉर्मूला नहीं अपनाया, तो यह ‘लक्ष्मी रोग’ आपकी 17 से 75 प्रतिशत तक उपज और अनाज की बाजार गुणवत्ता दोनों को चौपट कर सकता है।
धान भारत की खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और करोड़ों किसानों की आजीविका का प्रमुख आधार है। उन्नत किस्मों, हाइब्रिड बीजों और बेहतर कृषि तकनीकों से उत्पादन क्षमता बढ़ी है, लेकिन बदलती मौसमी तथा रोगों के दबाव ने नई चुनौतियाँ भी पैदा की हैं। इनमें फॉल्स स्मट (False Smut), जिसे ग्रीन स्मट या लक्ष्मी रोग भी कहा जाता है, एक महत्त्वपूर्ण पुष्प एवं दाना रोग है।
धान की उत्पादकता पर फॉल्स स्मट का प्रभाव
कभी अपेक्षाकृत कम महत्त्व का रोग समझा जाने वाला फॉल्स स्मट अब अनेक धान उत्पादक क्षेत्रों में आर्थिक नुकसान का कारण बन रहा है। हाइब्रिड सहित विभिन्न धान किस्मों में इसकी संवेदनशीलता अलग-अलग होती है। गंभीर प्रकोप में 75 प्रतिशत तक उपज हानि की रिपोर्ट उपलब्ध है, लेकिन यह असाधारण परिस्थितियों का अधिकतम अनुमान है, सामान्य खेतों में होने वाली हानि नहीं। भारतीय अनुसंधान में कुछ हाइब्रिड किस्मों में रोग की अधिक तीव्रता और लगभग 17 प्रतिशत तक उपज हानि भी दर्ज की गई है। इसलिए रोग के वास्तविक जोखिम का आकलन स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर करना आवश्यक है।
कवक संक्रमण और स्मट बॉल बनने की प्रक्रिया
फॉल्स स्मट का प्रमुख कारक कवक Ustilaginoidea Virens है, जिसे आधुनिक वर्गीकरण में Villosiclava Virens नाम से भी जाना जाता है। यह पौधे की बालियों के विकास के दौरान पुष्पीय ऊतकों को संक्रमित करता है। संक्रमित दाने के स्थान पर पहले पीले या नारंगी रंग की संरचना बनती है, जो बाद में हरे और अंततः गहरे जैतूनी या काले रंग की हो सकती है।
इसे फॉल्स स्मट बॉल कहते हैं। इन संरचनाओं पर बनने वाले बीजाणु हवा, वर्षा और खेत में कृषि कार्यों के माध्यम से फैल सकते हैं। रोग का संक्रमण सामान्यतः बाली निकलने से पहले की अवस्था से लेकर पुष्पन के आसपास होता है, जबकि स्पष्ट लक्षण बाद में दिखाई देते हैं। इसलिए जब किसान को स्मट बॉल दिखती है, तब तक संक्रमण हो चुका होता है और केवल बाद में छिड़काव करने से संक्रमित दाने स्वस्थ नहीं बनाए जा सकते।
मौसम, नाइट्रोजन और हाइब्रिड किस्मों की भूमिका
लगभग 25–30°C तापमान, अधिक आर्द्रता, बादल छाए रहना तथा बाली निकलने से पहले या पुष्पन के दौरान वर्षा और लंबे समय तक नमी बने रहना रोग के विकास को बढ़ावा दे सकते हैं। देर से या असंतुलित नाइट्रोजन प्रयोग, घनी फसल तथा संवेदनशील किस्मों की खेती भी जोखिम बढ़ा सकती है। हालाँकि, केवल हाइब्रिड बीज या अधिक नाइट्रोजन को रोग का एकमात्र कारण मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है; रोग का प्रकोप रोगजनक की उपलब्धता, मौसम और किस्म की आनुवंशिक संवेदनशीलता के संयुक्त प्रभाव से होता है।
खेत में फॉल्स स्मट की सटीक पहचान
- बाली में एक या अधिक दाने सामान्य आकार के बजाय गोल, फूली हुई संरचनाओं में बदल जाते हैं।
- प्रारंभ में इनका रंग पीला-नारंगी और बाद में हरा, जैतूनी या काला हो सकता है।
- परिपक्व स्मट बॉल की सतह पर चूर्ण जैसा बीजाणुयुक्त पदार्थ दिखाई देता है।
- प्रभावित दानों का सामान्य दानों में विकास नहीं हो पाता, जिससे उपज और गुणवत्ता प्रभावित होती है।
- रोगग्रस्त बालियों को अलग पहचानकर खेत में प्रकोप का आकलन करना चाहिए।
ध्यान रहे, हर बाली का संक्रमित होना आवश्यक नहीं है। कभी-कभी केवल कुछ दाने प्रभावित होते हैं, जबकि गंभीर प्रकोप में अनेक बालियाँ संक्रमित हो सकती हैं।
फॉल्स स्मट का एकीकृत वैज्ञानिक प्रबंधन
1. सही किस्म और प्रमाणित बीज का चयन: स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा अनुशंसित किस्में चुनें। उपलब्ध क्षेत्रीय जानकारी के आधार पर कम संवेदनशील किस्मों को प्राथमिकता दें। केवल प्रमाणित बीज इस्तेमाल करें। चूँकि संक्रमण मुख्यतः पुष्पीय अवस्था में होता है, इसलिए बीज उपचार को अकेले इस रोग का पूर्ण समाधान न मानें।
2. संतुलित पोषण: मिट्टी परीक्षण के आधार पर नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का प्रयोग करें। नाइट्रोजन की अनावश्यक अधिक मात्रा तथा देर से भारी टॉप ड्रेसिंग से बचें। उर्वरकों की मात्रा किस्म, मिट्टी, मौसम और स्थानीय अनुशंसा के अनुसार निर्धारित करें।
3. खेत की स्वच्छता: खेत और मेड़ों से खरपतवार हटाएँ, रोगग्रस्त बालियों की निगरानी करें तथा कटाई के बाद संक्रमित अवशेषों का उचित निपटान करें। अवशेषों को खुले में जलाने के बजाय स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार सुरक्षित तरीके से नष्ट या प्रबंधित करें।
4. समय पर निगरानी: बाली निकलने से पहले की अवस्था से नियमित निरीक्षण शुरू करें। मौसम पूर्वानुमान में लगातार वर्षा, अधिक आर्द्रता और बादल छाए रहने की संभावना हो, तो विशेष सतर्कता रखें। संवेदनशील किस्मों और पिछले वर्षों में रोगग्रस्त खेतों को प्राथमिकता से निगरानी में रखें।
5. वैज्ञानिक सलाह के अनुसार फफूंदनाशी का प्रयोग: रोग के लक्षण दिखने तक प्रतीक्षा करने के बजाय जोखिम वाले खेतों में बूटिंग अवस्था में निवारक प्रबंधन पर विचार करें। भारतीय अनुसंधान में कुछ ट्रायाजोल तथा मिश्रित फफूंदनाशी प्रभावी पाए गए हैं।ICAR–राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान ने रोगग्रस्त क्षेत्रों में बूटिंग अवस्था पर कॉपर हाइड्रॉक्साइड 77% या टेबुकोनाजोल 25% EC जैसे विकल्पों तथा 7–10 दिन बाद दूसरे छिड़काव का उल्लेख किया है।
लेकिन उत्पाद का वर्तमान पंजीकरण, धान में फॉल्स स्मट के लिए लेबल दावा, निर्धारित मात्रा, प्रतीक्षा अवधि और स्थानीय अनुशंसा जाँचे बिना दवा का प्रयोग न करें। सभी परिस्थितियों में दो छिड़काव आवश्यक नहीं होते। अनावश्यक मिश्रण, बार-बार एक ही क्रियाविधि वाली दवा तथा फूलों पर परागण करने वाले जीवों के लिए जोखिमपूर्ण छिड़काव से बचें।
6. जैविक उपाय और समेकित प्रबंधन: Trichoderma आधारित उत्पादों सहित जैव-नियंत्रण उपायों पर अनुसंधान जारी है। इनका प्रयोग केवल धान एवं संबंधित रोग के लिए उपयुक्त, गुणवत्तापूर्ण और अनुशंसित उत्पाद के रूप में करें। इन्हें पुष्पन के समय प्रभावी निवारक फफूंदनाशी का स्वतः विकल्प न मानें।
नवीनतम अनुसंधान क्या संकेत देता है?
2024–2026 के शोध साहित्य में फॉल्स स्मट की रोगजनक जीवविज्ञान, धान की आनुवंशिक प्रतिरोधकता, विषाक्त चयापचयों तथा टिकाऊ रोग प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया गया है। शोध यह भी दर्शाता है कि केवल रासायनिक नियंत्रण पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। भविष्य में मौसम-आधारित पूर्वानुमान, आणविक निदान, कम संवेदनशील किस्मों का विकास और जैविक उपायों का वैज्ञानिक सत्यापन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
फॉल्स स्मट बॉल में कुछ परिस्थितियों में ustiloxins जैसे विषाक्त पदार्थ पाए जा सकते हैं। इसलिए संक्रमित दानों और स्मट बॉल को खाद्य या पशु आहार में मिलाने से बचना चाहिए तथा उपज की गुणवत्ता और सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए।
अंत में: रोकथाम ही सबसे प्रभावी रणनीति
धान में फॉल्स स्मट को केवल दवा छिड़ककर नियंत्रित करने की समस्या नहीं समझना चाहिए। प्रमाणित बीज, कम संवेदनशील किस्मों का चयन, संतुलित पोषण, मौसम के अनुरूप निगरानी और सही समय पर अनुमोदित फफूंदनाशी का विवेकपूर्ण प्रयोग इसके एकीकृत प्रबंधन के प्रमुख आधार हैं।
किसान अपने क्षेत्र के कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विभाग से सलाह लेकर ही अंतिम उपचार तय करें। संदेश स्पष्ट है- फूल आने से पहले सतर्कता, सही समय पर वैज्ञानिक प्रबंधन और रोग की समय पर पहचान से धान की उपज, गुणवत्ता तथा किसान की आय की बेहतर सुरक्षा की जा सकती है।
धान में फॉल्स स्मट से बचाव की 3 सबसे जरूरी बातें
गाभा (बूटिंग) अवस्था ही स्प्रे का एकमात्र सही समय: जब धान का पौधा पेट में हो (गोभ अवस्था), तभी सुरक्षात्मक फफूंदनाशी का छिड़काव करें; एक बार बाली बाहर निकलकर दाना पीला-काला हो गया तो कोई भी दवा उसे ठीक नहीं कर सकती।
देर से यूरिया का छिड़काव तुरंत बंद करें: पुष्पन के आसपास यूरिया की भारी मात्रा डालने से पौधे में रोग से लड़ने की क्षमता घट जाती है और कवक का हमला कई गुना तेज हो जाता है।
संक्रमित दानों को पशु आहार में कभी न मिलाएं: परिपक्व स्मट बॉल में Ustiloxins नामक विषैला तत्व होता है, जो पशुओं के पेट और दूध दोनों की गुणवत्ता के लिए अत्यंत हानिकारक है।
निष्कर्ष: धान का फॉल्स स्मट रोग केवल रासायनिक दवाइयों से नहीं, बल्कि फूल आने से पहले की सतर्कता, संतुलित नाइट्रोजन और प्रमाणित बीजों के एकीकृत समन्वय से ही रुक सकता है। गोभ अवस्था में अनुशंसित फफूंदनाशी का सही समय पर प्रयोग करके किसान अपनी उपज, अनाज की चमक और बाजार भाव को सुरक्षित रख सकते हैं।
अस्वीकरण: यह लेख वैज्ञानिक जानकारी एवं सामान्य कृषि मार्गदर्शन के उद्देश्य से मेरे Dr. SK. Singh द्वारा व्यक्तिगत हैसियत से तैयार किया गया है। रसायनों के पंजीकरण, लेबल निर्देशों और स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय की नवीनतम अनुशंसाओं में बदलाव संभव है। किसी भी उपचार से पहले वर्तमान आधिकारिक सलाह की पुष्टि करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. धान में फॉल्स स्मट (झूठा कंडुआ) रोग किस कवक के कारण होता है?
उत्तर: यह रोग Ustilaginoidea virens (आधुनिक नाम Villosiclava virens) नामक कवक के संक्रमण से होता है, जो बाली निकलने के समय पुष्पीय अंगों को संक्रमित करता है।
Q2. क्या बाली में पीली-काली गांठें दिखने के बाद फफूंदनाशी का स्प्रे करना चाहिए?
उत्तर: बिल्कुल नहीं; जब स्मट बॉल दिखने लगती है तब तक संक्रमण पूर्ण हो चुका होता है। उस समय किसी भी केमिकल का छिड़काव करने से संक्रमित दाने ठीक नहीं होते और पैसे की बर्बादी होती है।
Q3. फॉल्स स्मट से बचाव के लिए सबसे उपयुक्त समय कौन-सा है?
उत्तर: सबसे प्रभावी रोकथाम बूटिंग अवस्था (बाली निकलने से ठीक पहले यानी गोभ अवस्था) में निवारक फफूंदनाशी के छिड़काव से ही संभव है।
Q4. ICAR के अनुसार कौन-से फफूंदनाशी इस रोग में प्रभावी पाए गए हैं?
उत्तर: अनुसंधान के अनुसार बूटिंग अवस्था में कॉपर हाइड्रॉक्साइड 77% डब्ल्यूपी या टेबुकोनाजोल 25% ईसी जैसे फफूंदनाशी प्रभावी पाए गए हैं, बशर्ते इनका प्रयोग लेबल दावों और अनुशंसित मात्रा के अनुसार किया जाए।
Q5. फॉल्स स्मट से प्रभावित धान को पशुओं को खिलाना सुरक्षित है या नहीं?
उत्तर: नहीं; स्मट बॉल में Ustiloxins नामक विषैले माइकोटॉक्सिन हो सकते हैं, इसलिए गंभीर रूप से संक्रमित धान या अवशेषों को पशु आहार और मानव भोजन में मिलाने से बचना चाहिए।
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प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह- विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी, पूर्व प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना एवं पूर्व सह निदेशक अनुसंधान, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर ( बिहार )
