IIT बॉम्बे के सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी अल्टरनेटिव्स फॉर रूरल एरियाज़ ने रेशम उत्पादन के क्षेत्र में एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो पारंपरिक पद्धति से अलग रेशमकीट के प्राकृतिक जीवनचक्र को सुरक्षित रखती है। इस पहल को कोल इंडिया लिमिटेड यानी सीआईएल ने अपनी कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व योजना के तहत वित्तीय समर्थन दिया है।
‘जीवोदय’ पायलट परियोजना के अंतर्गत शहतूत आधारित रेशमकीट पालन में एक नई पद्धति अपनाई गई है। सामान्यतः रेशम उत्पादन के लिए कोकून को उबालकर धागा निकाला जाता है, जिससे कीट की मृत्यु हो जाती है। लेकिन नई तकनीक में रेशम कीट को ऐसी समतल संरचनाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, जिन पर वे कोकून बनाने के बजाय सीधे रेशम धागा बुनते हैं। इससे कीट जीवित रहते हुए स्वाभाविक रूप से पतंगे में परिवर्तित हो सकते हैं।
कोल इंडिया ने इसे अनुसंधान एवं विकास के सतत प्रयासों का परिणाम बताते हुए सामाजिक रूप से उत्तरदायी नवाचार की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि करार दिया है। कंपनी के अनुसार, यह पहल भारतीय दर्शन ‘मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत’ अर्थात ‘किसी भी जीव को कष्ट न हो’ की भावना से प्रेरित है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘जीवोदय सिल्क’ मॉडल नैतिक रेशम उत्पादन की अवधारणा को मजबूत करेगा। इससे न केवल पर्यावरण-संवेदनशील उपभोक्ताओं की मांग को पूरा किया जा सकेगा, बल्कि रेशम उत्पादकों के लिए टिकाऊ और दीर्घकालिक आय के अवसर भी सृजित होंगे। ग्रामीण आजीविका सशक्तिकरण की दिशा में यह पहल एक नए अध्याय की शुरुआत मानी जा रही है।
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