खरीफ सीजन 2026: कमजोर मानसून और बढ़ती लागत के बीच किसान बदल रहे हैं खेती की रणनीति

खरीफ सीजन 2026 की शुरुआत से पहले ही देश के किसानों के सामने कई नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। एक तरफ मौसम विभाग और विशेषज्ञ कमजोर मानसून की आशंका जता रहे हैं, तो दूसरी तरफ खाद, बीज, कीटनाशक, डीजल और मजदूरी की बढ़ती कीमतों ने खेती की लागत को काफी बढ़ा दिया है।

ऐसे समय में किसान सिर्फ फसल की पैदावार की चिंता नहीं कर रहा, बल्कि यह भी सोच रहा है कि आखिर खेती में लगाया गया पैसा वापस आएगा भी या नहीं। पिछले कुछ वर्षों में किसानों ने मौसम का बदलता मिजाज बहुत करीब से देखा है। कभी समय पर बारिश नहीं होती, कभी अत्यधिक वर्षा से फसलें बर्बाद हो जाती हैं, तो कभी लंबे सूखे के कारण खेतों में दरारें पड़ जाती हैं।

इस बार भी El Niño के प्रभाव के कारण सामान्य से कम बारिश की आशंका जताई जा रही है। यदि मानसून कमजोर रहता है, तो धान, कपास, मक्का और अन्य खरीफ फसलों की खेती पर सीधा असर पड़ सकता है। किसानों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि खेती का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है, जबकि फसलों के दाम उसी अनुपात में नहीं बढ़ रहे।

पहले किसान कम लागत में खेती कर लेते थे, लेकिन अब बीज से लेकर कटाई तक हर चरण में खर्च बढ़ गया है। डीएपी, एनपीके, पोटाश और अन्य उर्वरकों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। कई जगहों पर खाद की उपलब्धता भी चिंता का विषय बनी हुई है। हाल ही में कई राज्यों में एनपीके और पोटाश उर्वरकों की कीमतों में बड़ी वृद्धि हुई है।

इससे किसानों का बजट पूरी तरह प्रभावित हो गया है। किसान पहले ही महंगे बीज खरीद रहे हैं, ऊपर से खाद और कीटनाशकों की बढ़ती कीमतों ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। छोटे और सीमांत किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं, क्योंकि उनके पास अतिरिक्त पूंजी उपलब्ध नहीं होती। ऐसे हालात में देश के कई हिस्सों में किसान अपनी खेती की रणनीति बदलने लगे हैं।

पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य भारत के कई क्षेत्रों में किसान अब कम पानी वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। बाजरा, मूंग, उड़द, तिल और अन्य मोटे अनाज किसानों की पसंद बनते जा रहे हैं। बाजरा जैसी फसलें किसानों को कई तरह से लाभ देती हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इन्हें धान या कपास की तुलना में बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है।

जहां धान की फसल को बार-बार सिंचाई की जरूरत होती है, वहीं बाजरा सीमित पानी में भी अच्छी पैदावार दे सकता है। इसके अलावा बाजरा कम अवधि में तैयार हो जाता है और इसकी खेती की लागत भी अपेक्षाकृत कम रहती है। मूंग और अन्य दलहनी फसलें भी किसानों के लिए आकर्षक विकल्प बन रही हैं।

इन फसलों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्षमता होती है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। साथ ही किसानों को अतिरिक्त आय का अवसर भी मिलता है। कई क्षेत्रों में किसान धान की जगह मूंग और बाजरा जैसी फसलों को प्राथमिकता देने लगे हैं। कपास उत्पादक किसान भी इस समय चिंतित हैं। पिछले कुछ वर्षों में गुलाबी सुंडी जैसी समस्याओं ने कपास की खेती को काफी नुकसान पहुंचाया है। इसके अलावा कीटनाशकों पर बढ़ता खर्च और अनिश्चित मौसम ने कपास उत्पादन को जोखिम भरा बना दिया है।

यही कारण है कि कई किसान अब कपास क्षेत्र में कटौती कर वैकल्पिक फसलों की ओर बढ़ रहे हैं। धान की खेती करने वाले किसानों के सामने भी कम चुनौतियां नहीं हैं। धान को पर्याप्त पानी, उर्वरक और श्रम की आवश्यकता होती है। यदि मानसून कमजोर रहता है, तो सिंचाई लागत बढ़ जाएगी। कई क्षेत्रों में पहले से ही भूजल स्तर नीचे जा रहा है। ऐसे में धान की खेती करना पहले की तुलना में अधिक महंगा और जोखिम भरा होता जा रहा है।

एक और महत्वपूर्ण मुद्दा खाद संकट का है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उर्वरकों की आपूर्ति कई कारणों से प्रभावित हुई है। पश्चिम एशिया में तनाव और गैस आपूर्ति से जुड़ी समस्याओं का असर उर्वरक उद्योग पर भी पड़ा है। भारत बड़ी मात्रा में डीएपी और अन्य उर्वरकों का आयात करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में होने वाले बदलावों का सीधा असर भारतीय किसानों पर पड़ता है।

हालांकि सरकार द्वारा किसानों को पर्याप्त खाद उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन कई क्षेत्रों से अभी भी खाद की कमी, ई-टोकन व्यवस्था की जटिलताओं और वितरण संबंधी समस्याओं की खबरें सामने आ रही हैं। किसान चाहते हैं कि उन्हें समय पर और आसानी से खाद उपलब्ध हो, ताकि बुवाई और फसल प्रबंधन में कोई बाधा न आए।

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में किसानों को संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाने की आवश्यकता है। केवल डीएपी या यूरिया पर निर्भर रहने की बजाय मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए। जैविक खाद, गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट और जैव उर्वरकों का उपयोग बढ़ाकर रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कुछ हद तक कम की जा सकती है।

जल संरक्षण भी समय की मांग बन चुका है। खेतों में मेढ़बंदी, वर्षा जल संचयन, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी तकनीकों को अपनाकर किसान पानी की बचत कर सकते हैं। आने वाले वर्षों में वही किसान सफल होंगे जो कम संसाधनों में अधिक उत्पादन लेने की तकनीकों को अपनाएंगे। खेती अब केवल परंपरागत तरीके से करने का विषय नहीं रह गया है।

बदलते मौसम, बढ़ती लागत और बाजार की अनिश्चितताओं के बीच किसानों को वैज्ञानिक खेती की ओर बढ़ना होगा। सही फसल चयन, उन्नत किस्मों का उपयोग, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और आधुनिक कृषि तकनीकों का समावेश ही भविष्य की खेती को टिकाऊ बना सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि किसान मौसम और बाजार दोनों को ध्यान में रखते हुए फसल योजना तैयार करें। जहां पानी की उपलब्धता सीमित है, वहां कम पानी वाली फसलों को प्राथमिकता दें।

साथ ही सरकारी योजनाओं, फसल बीमा और कृषि विशेषज्ञों की सलाह का लाभ उठाएं। खेती चुनौतियों से भरी जरूर है, लेकिन सही योजना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ किसान इन परिस्थितियों का सफलतापूर्वक सामना कर सकते हैं। बदलते समय के साथ खेती की रणनीति बदलना ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

निष्कर्ष: बदलते मौसम, कमजोर मानसून की आशंका और खेती की लगातार बढ़ती लागत ने पारंपरिक कृषि को जोखिम भरा बना दिया है, जिससे किसानों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। ऐसी विषम परिस्थितियों में खेती को टिकाऊ और मुनाफे का सौदा बनाए रखने के लिए अब परंपरागत तौर-तरीकों को छोड़ना ही एकमात्र रास्ता है।

किसानों द्वारा कम पानी और कम लागत वाली फसलों (जैसे बाजरा और मूंग) को चुनना, जल संरक्षण की आधुनिक तकनीकों को अपनाना और मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित पोषण प्रबंधन करना एक बेहद सकारात्मक और जरूरी कदम है।

भविष्य की खेती अब पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगी कि किसान कितनी जल्दी वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सरकारी योजनाओं और मौसम के अनुकूल कृषि रणनीतियों को अपनाकर खुद को इस बदलाव के लिए तैयार करते हैं।

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