खरीफ सीजन अपने चरम पर है। धान, मक्का, गन्ना, बाजरा और अन्य खरीफ फसलों में इस समय उर्वरकों की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। किसान दिन-रात मेहनत कर रहा है, बारिश के बीच खेत में उतर रहा है, रोपाई पूरी करने की जद्दोजहद में लगा हुआ है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि जिस समय सरकार का पूरा ध्यान किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराने पर होना चाहिए, उसी समय देश के कई हिस्सों से ऐसी खबरें सामने आ रही हैं जो पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
यूरिया के साथ जिंक की मजबूरी: खाद बिक्री में ‘टैगिंग’ का खेल
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कई निजी उर्वरक दुकानों पर किसानों को यूरिया तभी दिया जा रहा है जब वह उसके साथ जिंक सल्फेट या अन्य कृषि उत्पाद भी खरीदें। यानी किसान यदि केवल यूरिया खरीदना चाहता है तो उसे मना कर दिया जाता है या फिर अतिरिक्त उत्पाद खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। सवाल यह है कि आखिर यह खेल कब तक चलता रहेगा?
सरकारी दावों और जमीनी हकीकत का अंतर
सरकार बार-बार दावा करती है कि उर्वरकों की कालाबाजारी और टैगिंग पर सख्त कार्रवाई की जा रही है। कृषि विभाग समय-समय पर निर्देश जारी करता है कि किसी भी किसान को किसी उर्वरक के साथ दूसरा उत्पाद खरीदने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। कई जिलों में छापेमारी होती है, लाइसेंस निलंबित किए जाते हैं और प्रेस विज्ञप्तियां जारी होती हैं।
लेकिन जमीनी हकीकत क्या है? यदि कार्रवाई के बाद भी किसान आज भी मजबूर होकर टैगिंग वाला सामान खरीद रहा है, तो यह मानना पड़ेगा कि कार्रवाई का डर या तो खत्म हो चुका है या फिर पर्याप्त नहीं है।
बिना मृदा परीक्षण के जिंक बेचना वैज्ञानिक और आर्थिक रूप से गलत
यह समझना बेहद जरूरी है कि जिंक एक आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व है, लेकिन इसका उपयोग तभी होना चाहिए जब खेत में उसकी कमी हो। हर खेत की मिट्टी अलग होती है, हर किसान की जरूरत अलग होती है और हर फसल की पोषण आवश्यकता भी अलग होती है। बिना मृदा परीक्षण के हर किसान को जिंक खरीदने के लिए मजबूर करना न केवल आर्थिक रूप से गलत है बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी उचित नहीं है।
आज किसान पहले ही बढ़ती लागत से परेशान है। बीज महंगा है, मजदूरी महंगी है, डीजल महंगा है, बिजली की समस्या अलग है और मौसम की अनिश्चितता अलग। ऐसे में यदि एक किसान केवल एक बोरी यूरिया खरीदने जाता है और उसे अतिरिक्त 200, 300 या 500 रुपये का उत्पाद खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह उसके ऊपर अनावश्यक आर्थिक बोझ डालने जैसा है।
सरकारी वितरण व्यवस्था और सहकारी समितियों की खामियां
रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि कई स्थानों पर सहकारी समितियों में स्टॉक होने के बावजूद सर्वर न चलने, कर्मचारियों की कमी या वितरण व्यवस्था की खामियों के कारण किसान घंटों लाइन में खड़े रहने के बाद भी खाली हाथ लौट रहे हैं। मजबूरी में वही किसान निजी दुकानों पर जाता है और वहां टैगिंग का शिकार हो जाता है। यदि सरकारी वितरण व्यवस्था समय पर और पारदर्शी हो, तो शायद निजी दुकानों की मनमानी भी काफी हद तक रुक सकती है।
प्रशासन की जवाबदेही और किसान की मजबूरी
सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है। यदि सरकार स्पष्ट रूप से कहती है कि टैगिंग गैरकानूनी है, तो फिर यह खुलेआम कैसे हो रही है? क्या निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित हैं? क्या शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई होती है? क्या दोषी पाए गए दुकानदारों के लाइसेंस स्थायी रूप से निरस्त किए जाते हैं? यदि नहीं, तो फिर नियमों का डर कैसे पैदा होगा?
किसान के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसके पास विकल्प बहुत कम होते हैं। फसल को समय पर नाइट्रोजन चाहिए। यदि आज यूरिया नहीं मिला तो फसल की बढ़वार प्रभावित हो सकती है। इसलिए किसान विरोध करने के बजाय अतिरिक्त सामान खरीदकर घर लौट जाता है। दुकानदार भी इसी मजबूरी का फायदा उठाते हैं। यह केवल व्यापार नहीं, बल्कि किसान की आवश्यकता का लाभ उठाकर मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति है।
सरकारी सब्सिडी का वास्तविक लाभ न मिल पाना
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि सरकार उर्वरकों पर हर साल लाखों करोड़ रुपये की सब्सिडी देती है ताकि किसान को खाद सस्ती दर पर उपलब्ध हो सके। यदि उसी खाद को पाने के लिए किसान को अनावश्यक उत्पाद खरीदना पड़े, तो सब्सिडी का वास्तविक लाभ किसान तक पूरी तरह पहुंच ही नहीं पाता। ऐसी स्थिति में सरकारी नीति का उद्देश्य भी कमजोर पड़ जाता है।
समाधान: सख्त कार्रवाई, पारदर्शी व्यवस्था और किसान जागरूकता
प्रशासन को केवल छापेमारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हर जिले में एक प्रभावी शिकायत प्रणाली होनी चाहिए, जहां किसान तत्काल शिकायत दर्ज करा सके। शिकायत पर 24 घंटे के भीतर जांच हो और दोषी पाए जाने पर कठोर कार्रवाई की जाए। बार-बार नियम तोड़ने वाले विक्रेताओं के लाइसेंस निरस्त किए जाएं और उनके नाम सार्वजनिक किए जाएं, ताकि दूसरों के लिए भी यह एक सख्त संदेश बने।
कृषि विभाग को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि सहकारी समितियों पर पर्याप्त स्टॉक, पर्याप्त कर्मचारी और निर्बाध डिजिटल व्यवस्था उपलब्ध रहे। यदि किसान को सरकारी केंद्र पर आसानी से खाद मिल जाएगी, तो निजी दुकानों की मनमानी अपने आप कम हो जाएगी।
किसानों को भी जागरूक होना होगा। यदि किसी दुकान पर यूरिया के साथ जिंक या अन्य उत्पाद खरीदना अनिवार्य किया जाता है, तो उसकी रसीद लें, दुकान का नाम नोट करें और संबंधित कृषि अधिकारी या जिला प्रशासन को लिखित शिकायत दें। जितनी अधिक शिकायतें दर्ज होंगी, उतना ही प्रशासन पर कार्रवाई का दबाव बढ़ेगा।
निष्कर्ष: आखिर में सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि किसान ग्राहक नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा का आधार है। उसकी मजबूरी को कमाई का जरिया बनाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।
यदि सरकार वास्तव में किसानों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है, तो उर्वरकों की टैगिंग, कालाबाजारी और जबरन बिक्री पर केवल बयान नहीं, बल्कि ऐसी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए जिससे भविष्य में कोई भी विक्रेता किसान को मजबूर करने का साहस न कर सके।
किसान समय पर खाद चाहता है, उचित मूल्य पर खाद चाहता है और अपनी आवश्यकता के अनुसार खाद खरीदने की स्वतंत्रता चाहता है। यही उसका अधिकार है, और इसी अधिकार की रक्षा करना सरकार, प्रशासन और पूरी वितरण व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
Frequently Asked Questions (FAQ)
Q. यूरिया खाद के साथ दूसरा उत्पाद (जैसे जिंक) जबरन बेचना क्या कानूनी है?
उत्तर: बिल्कुल नहीं। उर्वरक नियंत्रण आदेश (Fertilizer Control Order) के तहत यूरिया या किसी भी मुख्य खाद के साथ जबरन दूसरा उत्पाद (टैगिंग) बेचना पूरी तरह से गैर-कानूनी और दंडात्मक अपराध है।
Q. यदि कोई दुकानदार यूरिया के साथ जबरन जिंक दे, तो किसान क्या करें?
उत्तर: किसान तुरंत विक्रेता से पक्की रसीद (Bill) मांगें और संबंधित जिला कृषि अधिकारी (DAO), प्रखंड कृषि अधिकारी या राज्य सरकार के किसान हेल्पलाइन नंबर पर लिखित शिकायत दर्ज कराएं।
Q. क्या हर खेत में यूरिया के साथ जिंक डालना आवश्यक होता है?
उत्तर: नहीं। जिंक एक सूक्ष्म पोषक तत्व है और इसका प्रयोग केवल तभी करना चाहिए जब मृदा परीक्षण (Soil Testing) में इसकी कमी पाई जाए। बिना जांच के हर खेत में जिंक डालना आर्थिक और वैज्ञानिक रूप से गलत है।
Q. सरकारी समितियों में खाद होने के बाद भी किसानों को निजी दुकानों पर क्यों जाना पड़ता है?
उत्तर: सहकारी समितियों (PACS) पर सर्वर न चलने, कर्मचारियों की कमी और पारदर्शी वितरण व्यवस्था न होने के कारण किसानों को परेशानी होती है और मजबूरी में निजी दुकानों पर जाकर टैगिंग का शिकार होना पड़ता है।
Q. यूरिया पर मिलने वाली सरकारी सब्सिडी का पूरा लाभ किसानों को क्यों नहीं मिल पाता?
उत्तर: सरकार यूरिया पर भारी सब्सिडी देती है, लेकिन दुकानदार उसके साथ 200 से 500 रुपये का अवांछित उत्पाद (जैसे जिंक) टैग कर देते हैं। इससे किसान की लागत बढ़ जाती है और सब्सिडी का वास्तविक उद्देश्य प्रभावित होता है।
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मेरा नाम Anil Kumar Prasad है। मैं एक प्रगतिशील किसान हूं और पिछले 5 वर्षों से खेती की बारीकियों को धरातल पर सीख और समझ रहा हूं। ‘कृषि जागृति – चलो गांव की ओर’ के माध्यम से मैं अपने निजी अनुभव और खेती की सटीक जानकारी साझा करता हूं। मेरा उद्देश्य सरकारी योजनाओं, आधुनिक तकनीक और जैविक खेती के जरिए साथी किसानों को सशक्त बनाना है।
