खेत पर ₹3 किलो, बाजार में ₹100! आखिर क्यों मदुरई के आम किसान बाग काटने को हुए मजबूर?

तमिलनाडु के मदुरई जिले से सामने आई तस्वीरें देश के हर किसान और कृषि नीति निर्माताओं के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं। जिस आम को हम बाजार में 50, 80 या 100 रुपय प्रति किलो खरीदते हैं, उसी आम के लिए किसान को खेत पर केवल ₹3 प्रति किलो का भाव मिल रहा है। यह केवल कीमत गिरने की खबर नहीं है, बल्कि भारत की कृषि विपणन व्यवस्था की एक बड़ी विफलता की कहानी है।

मदुरई जिले के मेलूर तालुक में तोतापुरी (किलीमूकू) आम की खेती करने वाले किसान इस समय भारी आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कई किसानों ने आम की तुड़ाई ही बंद कर दी है। पेड़ों पर लगे फल धीरे-धीरे सड़ रहे हैं क्योंकि उन्हें तोड़ने की मजदूरी भी बाजार से मिलने वाली कीमत से अधिक पड़ रही है। कई किसान अपने वर्षों पुराने आम के बाग काटने तक को मजबूर हो गए हैं।

यह स्थिति किसी एक किसान की नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की है। जानकारी के अनुसार मेलूर क्षेत्र में एक हजार एकड़ से अधिक क्षेत्र में इसका प्रभाव देखा जा रहा है। लगातार दो वर्षों से खराब दाम मिलने के कारण किसानों का खेती से भरोसा टूटने लगा है। एक एकड़ आम के बाग की देखभाल कोई आसान काम नहीं है। पूरे साल सिंचाई, खाद, उर्वरक, सूक्ष्म पोषक तत्व, कीट एवं रोग प्रबंधन, छंटाई, मजदूरी और रखरखाव पर लगभग एक लाख रुपय तक खर्च हो जाते हैं।

इसके बाद जब फसल तैयार होती है तो किसान उम्मीद करता है कि उसे उसकी मेहनत और निवेश का उचित मूल्य मिलेगा। लेकिन जब खेत पर केवल ₹3 प्रति किलो का भाव मिले, तब लागत निकालना भी असंभव हो जाता है। सबसे दुखद पहलू यह है कि यही तोतापुरी आम आगे चलकर जूस, पल्प, स्क्वैश और अन्य प्रसंस्कृत उत्पादों के रूप में कई गुना अधिक कीमत पर बिकता है।

यानी मूल्य श्रृंखला में सबसे कम कमाई उस व्यक्ति की हो रही है जिसने पूरे साल फसल तैयार की। किसान उत्पादन का पूरा जोखिम उठाता है, लेकिन सबसे कम हिस्सा उसी के पास पहुंचता है। जब कीमत इतनी कम हो जाती है कि तुड़ाई की मजदूरी भी नहीं निकलती, तब किसान मजबूरी में फसल को पेड़ पर ही छोड़ देता है। यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं बल्कि भोजन, पानी, श्रम और प्राकृतिक संसाधनों की भी बर्बादी है। जिस फसल को तैयार करने में पूरे साल मेहनत लगी, वही खेत में सड़ जाती है।

यह संकट केवल मदुरई तक सीमित नहीं है। कृष्णागिरी, सलेम, धर्मपुरी और डिंडीगुल जैसे तमिलनाडु के प्रमुख आम उत्पादक जिलों से भी ऐसी ही समस्याएं सामने आ रही हैं। यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया तो आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में किसान आम की खेती छोड़ सकते हैं।

किसानों की मांग भी पूरी तरह अव्यावहारिक नहीं है। उनका कहना है कि कम से कम ₹20 प्रति किलो का न्यूनतम समर्थन मूल्य या न्यूनतम खरीद मूल्य सुनिश्चित किया जाए, ताकि उत्पादन लागत निकल सके। साथ ही जूस और पल्प उद्योगों को किसानों से सीधे खरीद के लिए प्रोत्साहित किया जाए, जिससे बिचौलियों की भूमिका कम हो और किसानों को बेहतर दाम मिल सके।

भारत विश्व के सबसे बड़े आम उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन आज भी अधिकांश फल उत्पादकों को मूल्य अस्थिरता का सामना करना पड़ता है। अनाज की तरह फल और सब्जियों के लिए प्रभावी मूल्य सुरक्षा व्यवस्था नहीं होने के कारण किसान हर साल बाजार की अनिश्चितता के भरोसे रहता है। एक साल अच्छे दाम मिलते हैं तो अगले साल वही फसल कौड़ियों के भाव बिकती है।

समाधान केवल समर्थन मूल्य तक सीमित नहीं है। प्रसंस्करण उद्योगों का विस्तार, किसान उत्पादक संगठन (FPO), कोल्ड स्टोरेज, ग्रेडिंग एवं पैकिंग सेंटर, निर्यात को बढ़ावा, मूल्य स्थिरीकरण कोष और किसान-उद्योग के बीच सीधे अनुबंध जैसी व्यवस्थाएं भी आवश्यक हैं। यदि उत्पादन और बाजार के बीच मजबूत व्यवस्था बनाई जाए तो ऐसी स्थिति से काफी हद तक बचा जा सकता है।

आज जरूरत इस बात की है कि फल उत्पादक किसानों के लिए भी ऐसी नीतियां बनाई जाएं जिससे उन्हें लागत से नीचे अपनी उपज बेचने की मजबूरी न हो। यदि किसान को उचित मूल्य नहीं मिलेगा तो वह बाग काट देगा, और इसका नुकसान केवल किसान का नहीं बल्कि पूरे देश की बागवानी अर्थव्यवस्था का होगा।

सरकार, कृषि विभाग, प्रसंस्करण उद्योग और नीति निर्माताओं को इस संकट को गंभीरता से लेना चाहिए। क्योंकि जब किसान अपने ही हाथों से वर्षों पुराने आम के पेड़ काटने लगे, तो यह केवल एक फसल का नुकसान नहीं बल्कि कृषि व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। आपकी राय में क्या आम जैसे बागवानी उत्पादों के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य या मूल्य सुरक्षा प्रणाली लागू होनी चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए।

निष्कर्ष: मदुरई और तमिलनाडु के अन्य जिलों में आम उत्पादकों का यह संकट भारत की कृषि और बागवानी नीति के लिए एक बड़ा ‘वेक-अप कॉल’ है। जब एक किसान को सालभर की मेहनत और भारी लागत के बाद अपनी उपज का मूल्य मात्र ₹3 प्रति किलो मिले, तो यह न केवल कृषि विपणन व्यवस्था की विफलता है बल्कि एक गंभीर मानवीय और आर्थिक संकट भी है।

बिचौलियों के चंगुल को तोड़ने और बाजार की अनिश्चितता से किसानों को बचाने के लिए अनाज की तर्ज पर बागवानी फसलों के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) या एक प्रभावी मूल्य सुरक्षा प्रणाली लागू करना समय की मांग है। इसके साथ ही, कोल्ड स्टोरेज, प्रसंस्करण उद्योगों (Processing Industries) के विस्तार और किसान उत्पादक संगठनों (FPO) को मजबूत करके ही हम किसानों को बाग उजाड़ने की मजबूरी से बचा सकते हैं और देश की बागवानी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रख सकते हैं।

यह भी पढ़े: ₹266 की यूरिया बोरी का ₹4000 वाला गणित: जानिए इसके पीछे की पूरी सच्चाई

जागरूक रहिए व नुकसान से बचिए और अन्य लोगों के जागरूकता के लिए साझा करें। कृषि लेख, सरकारी योजनाएं, कृषि तकनीक, व्यवसायिक एवं जैविक खेती से संबंधित सटीक जानकारियां प्राप्त करने के लिए जुड़े कृषि जागृति चलो गांव की ओर से या कृषि संबंधित किसी भी समस्या के जैविक समाधान के लिए WhatsApp करें।