भारत के मक्का निर्यात में सुस्ती के बाद अब धीरे-धीरे सुधार के संकेत दिखाई देने लगे हैं। वर्ष 2024-25 में मक्का का निर्यात पाँच सालों के निचले स्तर पर आ गया था, लेकिन घरेलू उत्पादन में बढ़ोतरी और कीमतों के अधिक प्रतिस्पर्धी होने से अंतरराष्ट्रीय खरीदारों की रुचि दोबारा लौटती दिख रही है।
चालू वित्त वर्ष के दौरान अप्रैल से अक्टूबर की अवधि में मक्का निर्यात मात्रा के लिहाज से करीब 20 प्रतिशत बढ़कर 2.84 लाख टन से अधिक पहुँच गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 2.36 लाख टन था। मूल्य के मोर्चे पर भी उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है। इस अवधि में निर्यात मूल्य 28 प्रतिशत बढ़कर 87.63 मिलियन डॉलर से 112.49 मिलियन डॉलर हो गया।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, इस वर्ष कीमतें व्यावहारिक स्तर पर रहने से शिपमेंट को समर्थन मिला है। आईग्रेन इंडिया के राहुल चौहान ने कहा कि निर्यात में यह बढ़त मुख्य रूप से बेहतर मूल्य प्रतिस्पर्धा का नतीजा है। हालांकि, उन्होंने यह भी संकेत दिया कि प्रमुख आयातक बाजारों में से एक बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति को देखते हुए व्यापारिक गतिविधियाँ अभी भी सतर्कता के साथ की जा रही हैं।
पिछले वर्ष घरेलू कीमतें ऊँची रहने के कारण निर्यात पर दबाव बना रहा था। नतीजतन, वर्ष 2024-25 में भारत का मक्का निर्यात घटकर 5.56 लाख टन रह गया था, जिसकी कुल कीमत 201.17 मिलियन डॉलर आंकी गई। यह आंकड़ा 2023-24 के 14.42 लाख टन जो 443 मिलियन डॉलर के निर्यात के मुकाबले काफी कम था।
विशेषज्ञों का कहना है कि निर्यात में आई इस गिरावट के पीछे पोल्ट्री, एथेनॉल और स्टार्च उद्योगों से मजबूत घरेलू मांग के साथ-साथ सीमित निर्यात प्रोत्साहन भी प्रमुख कारण रहे। आने वाले महीनों में यदि घरेलू आपूर्ति संतुलित रहती है और अंतरराष्ट्रीय कीमतें अनुकूल बनी रहती हैं, तो मक्का निर्यात में और सुधार की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
कुल मिलाकर, मक्का बाजार में आई यह हलचल शुभ संकेत है। गिरती कीमतों ने मांग को पुनर्जीवित किया है और निर्यात के नए रास्ते खोले हैं। अगर वैश्विक हालात स्थिर रहते हैं, तो आने वाले महीनों में मक्का सेक्टर में और भी मजबूती देखी जा सकती है।
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