अभी तक पेपर लीक का सुना था, अब किसानों का ई-टोकन भी लीक होने लगा! यह तस्वीर मध्यप्रदेश के ई-विकास पोर्टल की है, जिसमें खाद का ई-टोकन रात 12:12 बजे बुक दिखाया गया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पोर्टल पर टोकन बुकिंग का समय सुबह 7 बजे से रात 8 बजे तक तय है, तो फिर आधी रात को टोकन कैसे जारी हो गया?
दिनभर किसान साइट खुलने का इंतजार करते रहते हैं। घंटों मोबाइल हाथ में लेकर बैठे रहते हैं। कभी सर्वर डाउन, कभी OTP नहीं, कभी साइट नहीं खुलती। लेकिन जैसे ही किसान थक हारकर सो जाते हैं, रात में अचानक टोकन बुक हो जाते हैं। आखिर यह खेल कौन खेल रहा है? क्या सिस्टम में बैठे कुछ लोग खाद माफियाओं के साथ मिलकर काम कर रहे हैं?
क्या आम किसान को लाइन में खड़ा रखने और दलालों को फायदा पहुंचाने के लिए जानबूझकर पोर्टल बंद रखा जाता है? अगर समय सीमा रात 8 बजे तक है, तो 12 बजे के बाद बुक हुआ टोकन अपने आप में बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है। सबसे दुखद बात यह है कि किसान दिनभर मेहनत करने के बाद भी खाद के लिए परेशान है।
दूसरी तरफ कुछ लोग सिस्टम का फायदा उठाकर रातों-रात टोकन बुक करवा लेते हैं। यही कारण है कि असली किसान खाली हाथ लौटता है और बाजार में वही खाद ब्लैक में महंगे दाम पर बिकती दिखाई देती है। सरकार को तुरंत इस मामले की जांच करानी चाहिए। ई-टोकन सिस्टम का पूरा डेटा सार्वजनिक होना चाहिए।
किस समय किस आईडी से लॉगिन हुआ, किस समय सर्वर एक्टिव था और किसके लिए टोकन जारी हुए- यह सब किसानों के सामने आना चाहिए। अगर डिजिटल व्यवस्था में भी पारदर्शिता नहीं होगी, तो किसान आखिर किस पर भरोसा करे?
किसानों की मांग:
ई-टोकन बुकिंग की लाइव मॉनिटरिंग हो?
रात में जारी हुए सभी टोकनों की जांच हो?
खाद वितरण में दलालों और माफियाओं पर कार्रवाई हो?
हर जिले में टोकन की सूची सार्वजनिक की जाए?
किसानों को ऑफलाइन विकल्प भी दिया जाए?
किसान अब जाग चुका है। अब सवाल पूछे जाएंगे। क्योंकि अन्नदाता सिर्फ वोट बैंक नहीं, देश की रीढ़ है। इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि किसानों के लिए बनाई गई डिजिटल व्यवस्था पारदर्शिता और सुरक्षा के मोर्चे पर पूरी तरह विफल साबित हो रही है।
तय समय सीमा के बाद आधी रात को खाद के ई-टोकन बुक होना न केवल सिस्टम की तकनीकी खामियों या संभावित हेराफेरी (मैनिपुलेशन) की ओर इशारा करता है, बल्कि यह आम किसानों के हक पर डाका डालने जैसा है।
जब दिनभर सर्वर डाउन होने से परेशान किसान खाली हाथ रह जाता है और रात के अंधेरे में दलालों या माफियाओं को टोकन मिल जाते हैं, तो पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता खत्म हो जाती है।
निष्कर्ष: यदि सरकार ने इस पूरे ई-टोकन डेटा की निष्पक्ष जांच नहीं की, लाइव मॉनिटरिंग और ऑफलाइन जैसे पारदर्शी विकल्प नहीं दिए, तो डिजिटल इंडिया का यह सपना किसानों के लिए एक बड़ी मुसीबत और कालाबाज़ारी का नया जरिया बनकर रह जाएगा।
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