नर्मदापुरम: FCI ने 8800 मीट्रिक टन गेहूं रिजेक्ट किया, ₹597 करोड़ का भुगतान अटका

किसानों से सवाल पूछना सबसे आसान है, लेकिन इस पूरे सिस्टम से सवाल पूछने की हिम्मत कौन करेगा? नर्मदापुरम में एफसीआई द्वारा 8800 मीट्रिक टन गेहूं रिजेक्ट कर दिया गया और करीब 597 करोड़ रुपये का किसानों का भुगतान अटक गया। वजह बताई जा रही है- गेहूं में मिट्टी, कचरा और खराब क्वालिटी।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब खरीद केंद्रों पर समितियां और अधिकारी खुद FAQ मापदंड के तहत गेहूं खरीद रहे थे, तब यह “खराब गेहूं” पास कैसे हो गया? अगर गेहूं में मिट्टी और कचरा था तो खरीद के समय जांच कहां थी?, क्या तौल के समय कोई गुणवत्ता परीक्षण नहीं हुआ? क्या सिर्फ टोकन काटना और ट्रॉली खाली करवाना ही पूरी व्यवस्था बन गई है?

किसानों को पहले स्लॉट बुकिंग के लिए लाइन में लगवाओ, फिर कई-कई दिन केंद्रों पर ट्रॉली खड़ी रखवाओ, फिर खरीद करो, फिर भुगतान महीनों तक रोको और अंत में बोल दो कि गेहूं खराब है! आखिर हर गलती का ठीकरा किसान के सिर पर ही क्यों फोड़ा जाता है? रिपोर्ट के मुताबिक एक ही दिन में 22 ट्रक रिजेक्ट कर दिए गए।

सवाल यह भी है कि अगर माल इतना खराब था तो उसे गोदाम तक पहुंचने ही क्यों दिया गया? और अगर केंद्रों पर सही जांच हुई थी तो जिम्मेदार कौन है- समितियां?, खरीद केंद्र के अधिकारी?, एफसीआई? या फिर वही किसान जिसे हर बार सिस्टम का सबसे कमजोर हिस्सा मान लिया जाता है?

किसान खेत में खून-पसीना बहाकर फसल तैयार करता है। मौसम की मार झेलता है, महंगी खाद-बीज खरीदता है, डीजल और मजदूरी का खर्च उठाता है। लेकिन जब फसल बेचने की बारी आती है, तो पूरा सिस्टम उसी किसान को शक की नजर से देखने लगता है।

अगर खरीद प्रक्रिया पारदर्शी होती, मौके पर सही गुणवत्ता जांच होती और अधिकारियों की जवाबदेही तय होती, तो शायद आज किसानों के करोड़ों रुपये अटके नहीं होते। अब किसान पूछ रहा है- FAQ मापदंड सिर्फ किसानों के लिए हैं या अधिकारियों के लिए भी कोई जवाबदेही तय होगी?

निष्कर्ष: भारतीय कृषि खरीद प्रणाली (Procurement System) में जवाबदेही की भारी कमी है, जिसका सीधा खामियाजा हमेशा किसान को भुगतना पड़ता है।

जब खरीद केंद्रों पर नियुक्त समितियों और अधिकारियों की देखरेख में फेयर एवरेज क्वालिटी (FAQ) मापदंडों के तहत गेहूं पास किया गया, तो बाद में एफसीआई (FCI) द्वारा उसे रिजेक्ट करना सीधे तौर पर जमीनी स्तर की जांच प्रक्रिया और सरकारी तंत्र की लापरवाही पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है।

अगर माल वाकई खराब था, तो उसे गोदामों तक पहुंचने देकर व्यवस्था ने अपनी नाकामी साबित की, और अगर माल सही था, तो बाद में उसे रिजेक्ट करना किसानों के साथ सरासर अन्याय है।

अंततः अपनी मेहनत की फसल बेचने के लिए दिनों-दिन कतारों में खड़े रहने और महीनों भुगतान का इंतजार करने वाले अन्नदाता को बलि का बकरा बनाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है; जब तक गड़बड़ी करने वाले अधिकारियों और खरीद समितियों पर सख्त जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक पारदर्शी व्यवस्था का दावा महज कागजी रहेगा।

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