प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन: अल नीनो और सर्दियों के प्रदूषण से खेती पर बढ़ता खतरा

धरती का बढ़ता तापमान और अल नीनो का प्रभाव अब केवल मौसम वैज्ञानिकों की चर्चा का विषय नहीं रहा, बल्कि यह सीधे हमारे भोजन, खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर चोट कर रहा है। पिछले 25 वर्षों में यह चौथी बार है जब देश में मानसूनी बारिश 12 प्रतिशत तक कम दर्ज की गई, जबकि दूसरी ओर बेमौसम मूसलाधार बारिश ने फसलों को बर्बाद कर दिया। विकसित देशों की हठधर्मिता और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसकी कीमत भारत का गरीब किसान क्यों चुकाए? सर्दियों में गहराते प्रदूषण से धूप रुकने और फसलों की पैदावार घटने पर पढ़िए यह विशेष संपादकीय विश्लेषण।

अल नीनो और मौसम चक्र

अल नीनो प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। इससे लगभग पूरी दुनिया का मौसम प्रभावित होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अल नीनो का प्रभाव अगले वर्ष के प्रारंभ तक रह सकता है। चूंकि धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है, इसलिए अल नीनो का असर भी कहीं अधिक होता जा रहा है। इसके असर से कहीं ज्यादा गर्मी पड़ती है, तो कहीं ज्यादा सर्दी। इसी तरह कहीं कम बारिश और सूखा पड़ता है, तो कहीं अधिक वर्षा होती है। जैसी आशंका थी, अल नीनो का असर भारत पर भी पड़ा। देश के कई क्षेत्र सूखा ग्रस्त हैं और कहीं ज्यादा बारिश हो गई।

12% कम बारिश और कृषि

भारत की कृषि मौसम चक्र पर अत्यधिक निर्भर है। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। वैसे तो भारत की जीडीपी में कृषि और इससे संबंधित क्षेत्रों की हिस्सेदारी 15-18 प्रतिशत के बीच है। लेकिन, इस पर देश की लगभग 50 प्रतिशत आबादी निर्भर है। वर्षा कम अथवा ज्यादा होने से जो समस्याएं आती हैं, वे फसलों के नुकसान का कारण बनती हैं। इसका बुरा प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इस बार 12 प्रतिशत कम बरसात हुई है। पिछले 25 वर्षों में यह चौथी बार है, जब इतनी कम बारिश हुई है।

लेकिन, इसी के साथ देश के कुछ हिस्सों में आवश्यकता से अधिक बारिश हुई। बीते दिनों बंगाल की खाड़ी में बने दबाव के चलते उत्तर भारत के कई राज्यों में कम समय में आवश्यकता से अधिक बारिश हुई। इससे कई जगह बाढ़ आ गई और फसलों के नुकसान के साथ अनेक लोगों की जान भी गई। पर्वतीय राज्यों में भी बारिश की अधिकता ने समस्याएं पैदा कीं। इसके पहले तिब्बत में ग्लेशियर फटने से नेपाल में भारी बाढ़ आई थी, जिसमें हजारों लोग मारे गए।

तेजी से बदलते मौसम का चक्र समूचे विश्व के पर्यावरण को प्रभावित कर रहा है। भारत सहित दुनिया के तमाम देशों के आम लोग मौसम में अप्रत्याशित बदलाव के पीछे के कारणों को समझने में असमर्थ हैं। समस्या यह है कि जो लोग इसके कारणों को समझते हैं, वे भी पर्यावरण को दूषित करने के साथ प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर रहे हैं।

प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन

प्राकृतिक संसाधनों का मनमाना दोहन लगभग 40-50 वर्ष पहले शुरू हुआ था, जब उद्योगीकरण अपने पूरे जोर पर था और जब प्रदूषण रोधी तकनीक विकसित नहीं हो पाई थी। पहले मौसम वैज्ञानिकों को प्राकृतिक संसाधनों के मनमाने दोहन को लेकर इसका अनुमान नहीं था कि इसका आगे चलकर पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

इसके चलते विकसित देशों ने प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जारी रखा और आज जब वे इसके दुष्परिणामों से परिचित हो चुके हैं, तब भी ऐसा करने में लगे हुए हैं। यह तब है, जब उन्हीं के मौसम वैज्ञानिकों ने काफी पहले आगाह करना शुरू कर दिया था कि संभल जाएं, नहीं तो गंभीर संकट आने वाला है। वे यह भी बता रहे थे कि प्राकृतिक संसाधनों का मनमाना दोहन धरती का तापमान बढ़ा रहा है।

वैश्विक सम्मेलनों की नाकामी

पिछले कुछ वर्षों से धरती के बढ़ते तापमान को रोकने के लिए जलवायु सम्मेलन हो रहे हैं और उनमें पर्यावरण को बचाने के उपायों पर सहमति भी बन रही है। लेकिन, उन पर अमल नहीं हो पा रहा है। यदि हो भी रहा है, तो आधे-अधूरे ढंग से।

अमेरिका खासतौर पर अपनी जिम्मेदारी निभाने को तैयार नहीं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जलवायु परिवर्तन को नकारते हैं। उनके कारण अमेरिका ने फरवरी 2027 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन से पूरी तरह बाहर होने की घोषणा की है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने अपने को विकसित करने के क्रम में प्राकृतिक संसाधनों का मनमाने तरीके से दोहन किया है, अभी भी करने में लगा हुआ है।

विकसित देश यह चाह रहे हैं कि विकासशील देश अपने विकास की अनदेखी कर जलवायु परिवर्तन रोकने के उपाय करें, पर वे इन देशों को वह तकनीक देने को तैयार नहीं, जिससे धरती के तापमान को बढ़ाने वाले कारणों का निवारण किया जा सके। इस सबके नतीजे में ही मौसम में अप्रत्याशित बदलाव देखने को मिल रहे हैं।

भारत विश्व की सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया है। भारत के विकासशील देश होने के नाते यहां मौसम के तेजी से बदलते चक्र का कहीं अधिक प्रभाव देखने को मिल रहा है। इसका असर किसानों और गरीब जनता पर सबसे अधिक होता है। लोग भले ही रोजमर्रा के जीवन में मौसम के तेजी से बदलते चक्र को महसूस न कर पाएं, लेकिन अब समय आ गया है कि सरकार लोगों को प्रकृति के संरक्षण को लेकर जागरूक करे। उन्हें लोगों को यह भी समझाना होगा कि प्राकृतिक संसाधनों का मनमाना दोहन और उपभोग प्रदूषण बढ़ाने का काम कर रहा है।

जहां केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों को ऐसी ठोस योजनाएं बनानी होंगी, जिससे प्रदूषण की रोकथाम हो, वहीं लोगों को भी अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी होगी। बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए भारत को अब ठोस उपाय करने ही होंगे। क्योंकि, उनके अमल में देर हो चुकी है।

सर्दियों का प्रदूषण और फसलें

ध्यान रहे कि कुछ अध्ययन यह कह रहे हैं कि यदि सर्दियों में होने वाला प्रदूषण कम नहीं होता, तो फसलों की पैदावार कम होने की आशंका है। इसका कारण यह है कि अधिक प्रदूषण से उत्तर भारत में सूरज की रोशनी धरती पर कम पहुंच पाती है और यह पैदावार पर असर डालती है।

पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक चेतना

जो प्रदूषण बरसात के बाद आता है, उसे नियंत्रित करने की अब तमाम तकनीक उपलब्ध हैं, फिर भी जाने-अनजाने उसका समुचित उपयोग नहीं हो रहा है। इसका कारण औसत देशवासियों का पर्यावरण रक्षा के प्रति सतर्क न होना भी है। इसी वजह से कहीं फसलों के अवशेष जलते हैं, तो कहीं कूड़ा-करकट।

इसी तरह पुरानी गाड़ियों को चलाया जाता रहता है, भले ही वे कितना भी प्रदूषण छोड़ रही हों। न जाने कितने औद्योगिक समूह ऐसे हैं, जो जानबूझकर हवा, पानी और मिट्टी प्रदूषित कर रहे हैं। वे प्रदूषण रोधी तकनीक अपनाना ही नहीं चाह रहे, जबकि वह पहले के मुकाबले सस्ती हो गई है। यदि सरकारों के साथ समाज पर्यावरण की रक्षा को लेकर चेतता नहीं, तो जलवायु परिवर्तन को रोकना और उसके दुष्प्रभावों से बचना कठिन ही होगा।

पर्यावरण दोहन के 3 बड़े खतरे

सर्दियों का स्मॉग और धूप की कमी: सर्दियों में हवा में तैरने वाले धूल और धुएं के कण (Aerosols) सूरज की रोशनी को धरती तक पूरी तरह नहीं पहुँचने देते। इससे गेहूं, सरसों और आलू जैसी फसलों में प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की गति धीमी हो जाती है और पैदावार घटती है।

मौसम की अप्रत्याशित मार: एक तरफ सूखा और दूसरी तरफ कुछ ही घंटों में बादल फटने जैसी बारिश से खेतों में जलभराव हो जाता है, जिससे मिट्टी की उपजाऊ परत बह जाती है।

संसाधनों की अंधी दौड़: भूजल का अंधाधुंध दोहन, जंगलों की कटाई और प्रदूषण रोधी तकनीक उपलब्ध होने के बावजूद उद्योगों द्वारा लापरवाही समूचे पारिस्थितिकी तंत्र को तबाह कर रही है।

निष्कर्ष: मौसम का बिगड़ता मिजाज और प्राकृतिक आपदाएं प्रकृति द्वारा दी जा रही अंतिम चेतावनियां हैं। जब तक समाज और सरकारें पर्यावरण संरक्षण को केवल सम्मेलनों और भाषणों तक सीमित रखेंगी, तब तक जलवायु संकट का समाधान संभव नहीं है।

यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियों को उपजाऊ जमीन, शुद्ध हवा और सुरक्षित भविष्य मिले, तो प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन पर तत्काल अंकुश लगाना होगा। आधुनिक प्रदूषण-रोधी तकनीकों को अपनाना, पराली व कचरा जलाने से बचना और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलना ही जीवन और खेती दोनों को बचाने का एकमात्र रास्ता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. अल नीनो क्या है और इसका भारतीय कृषि पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: अल नीनो प्रशांत महासागर में सतह के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने की मौसमीय घटना है, जिसके कारण भारत में अक्सर मानसून कमजोर पड़ता है, जिससे सूखा या अनियमित बारिश की स्थिति बनती है।

Q2. पिछले 25 वर्षों में बारिश की क्या स्थिति रही है?

उत्तर: हालिया मानसून में 12 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है, और पिछले 25 वर्षों में यह केवल चौथी बार है जब मानसूनी बारिश में इतनी बड़ी गिरावट देखी गई है।

Q3. सर्दियों का वायु प्रदूषण फसलों की पैदावार को कैसे घटाता है?

उत्तर: सर्दियों में घना धुआं और स्मॉग सूरज की धूप को धरती तक पहुँचने से रोकता है। पर्याप्त धूप न मिलने से पौधों में भोजन बनाने (प्रकाश संश्लेषण) की प्रक्रिया धीमी हो जाती है, जिससे दानों का भराव कमजोर होता है।

Q4. वैश्विक जलवायु सम्मेलनों के बावजूद तापमान क्यों बढ़ रहा है?

उत्तर: विकसित देशों द्वारा अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारियों से पीछे हटने, स्वच्छ तकनीक साझा न करने और कार्बन उत्सर्जन पर आधे-अधूरे अमल के कारण वैश्विक तापमान लगातार बढ़ रहा है।

Q5. प्रदूषण नियंत्रण तकनीक सस्ती होने के बाद भी उसका उपयोग क्यों नहीं हो रहा?

उत्तर: समाज में पर्यावरण के प्रति सतर्कता का अभाव, नियमों का कड़ाई से पालन न होना और औद्योगिक इकाइयों द्वारा मुनाफे के लालच में नियमों की अनदेखी इसका मुख्य कारण है।

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