राजस्थान के किसान सुरेश घोला ने पारंपरिक खेती से हटकर जैविक पपीता खेती अपनाकर आय बढ़ाने का सफल उदाहरण पेश किया है। यह मॉडल अब क्षेत्र में लाभकारी बागवानी विकल्प के रूप में उभर रहा है। एक मित्र के अनार बाग से प्रेरित होकर उन्होंने शुरुआती प्रयोग किए और बाद में रेड लेडी 786 पपीता किस्म को आठ बीघा भूमि में अपनाया।
शुरुआती नुकसान के बावजूद उन्होंने तकनीकों में सुधार किया और करीब 2,500 पौधे लगाए। यह फसल मात्र सात महीने में उत्पादन देने लगी, जहां प्रत्येक पौधे से 70 से 100 किलोग्राम तक उपज मिल रही है। वर्तमान में प्रतिदिन 200 से 500 किलोग्राम उत्पादन हो रहा है।
जैविक उत्पादों की मजबूत मांग के चलते उन्हें खेत से ही 50 रुपय प्रति किलोग्राम के भाव पर सीधे बिक्री का लाभ मिल रहा है, जिससे मुनाफा बढ़ा है। घोला ने खेती में विविधता लाते हुए आंवला, अमरूद और सेब की खेती भी शुरू की है। इसके लिए उन्होंने ड्रिप सिंचाई और वर्षा जल संचयन जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाया, जिससे लागत में कमी और उत्पादन में सुधार हुआ है।
इस सीजन में उनकी अनुमानित आय करीब 35 लाख रुपय तक पहुंचने की संभावना है। उनकी सफलता से आसपास के किसान भी बागवानी और जैविक खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जबकि उनकी नई नर्सरी पहल इस मॉडल को व्यापक स्तर पर अपनाने में मदद कर रही है।
सुरेश घोला का मॉडल यह सिखाता है कि खेती अब केवल जीवन निर्वाह का साधन नहीं, बल्कि सही तकनीक और आधुनिक प्रबंधन से लाखों के टर्नओवर वाला स्टार्टअप बन सकती है।
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