भारत का सजावटी मत्स्य पालन क्षेत्र अब केवल शौक तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और निर्यात के लिए एक मजबूत स्तंभ बनकर उभर रहा है। मत्स्य पालन मंत्रालय के अनुसार, वर्तमान में इस क्षेत्र से होने वाला निर्यात 41 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।
भारत की सबसे बड़ी ताकत इसकी समृद्ध और अनूठी जैव विविधता है। हमारे पास सजावटी मत्स्य पालन के लिए लगभग 700 स्वदेशी मीठे पानी की प्रजातियां और 300 से अधिक समुद्री प्रजातियां उपलब्ध हैं। रंग-बिरंगी मछलियों का यह विशाल खजाना अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की स्थिति को बहुत मजबूत बनाता है।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत इस क्षेत्र को उच्च विकास क्षमता वाले क्षेत्र के रूप में विशेष पहचान दी गई है। घरेलू मांग में निरंतर वृद्धि और निर्यात के नए अवसरों के कारण इस व्यवसाय को अभूतपूर्व गति मिल रही है। सरकार अब इसे केवल मछली पकड़ना नहीं, बल्कि एक आधुनिक कृषि उद्यम के रूप में देख रही है।
इस क्षेत्र को मजबूती देने के लिए देशभर में बुनियादी ढांचे का जाल बिछाया गया है। वर्तमान में 1,986 बैकयार्ड सजावटी इकाइयां और 6,018 फिश कियोस्क व एक्वेरियम सफलतापूर्वक काम कर रहे हैं। साथ ही, सजावटी मछलियों के व्यापार को समर्पित 117 खुदरा बाजार भी स्थापित किए जा चुके हैं जो सीधे उपभोक्ताओं और विक्रेताओं को जोड़ते हैं।
उत्पादन और प्रजनन को बढ़ाने के लिए सरकार ने पांच विशेष ब्रूड बैंक और 199 एकीकृत सजावटी मछली इकाइयां शुरू की हैं। इसके अतिरिक्त, देशभर में 34 मत्स्य उत्पादन और प्रसंस्करण क्लस्टर अधिसूचित किए गए हैं। इनमें मदुरै का विशेष सजावटी मत्स्य पालन क्लस्टर वैश्विक निर्यात के लिहाज से एक मॉडल बनकर उभरा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सजावटी मत्स्य पालन ग्रामीण युवाओं और छोटे उद्यमियों के लिए सबसे टिकाऊ आय का विकल्प है। इसकी खूबी यह है कि इसमें निवेश बहुत कम लगता है जबकि उत्पाद का मूल्य बहुत अधिक होता है। वैश्विक मांग को देखते हुए यह क्षेत्र आने वाले समय में रोजगार सृजन और उद्यमिता के मामले में बड़े रिकॉर्ड बना सकता है।
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