धान की खेती करने वाले किसान भाइयों के लिए तना छेदक (Stem Borer) आज भी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। हर साल हजारों किसान इस कीट की वजह से अपनी उपज का बड़ा हिस्सा खो देते हैं। कई बार नुकसान 20 प्रतिशत से शुरू होकर 50 से 60 प्रतिशत तक पहुंच जाता है और यदि समय पर नियंत्रण न किया जाए तो इससे भी अधिक हानि हो सकती है।
सबसे दुखद बात यह है कि नुकसान की वजह हमेशा दवा की कमी नहीं होती, बल्कि सही समय पर सही दवा का चयन न कर पाना होता है। बाजार में हर साल नए-नए नामों से कीटनाशक आते हैं और किसान यह मान लेते हैं कि नई दवा ही सबसे ज्यादा असर करेगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकांश उत्पादों में वही पुराने तकनीकी तत्व (Active Ingredients) अलग-अलग ब्रांड नामों से बेचे जाते हैं। इसलिए किसान को सबसे पहले दवा का नाम नहीं, बल्कि उसके अंदर मौजूद तकनीकी तत्व को पहचानना सीखना चाहिए।
तना छेदक कीट के प्रमुख लक्षण: ‘डेड हार्ट’ और ‘व्हाइट ईयर’
तना छेदक की पहचान करना बेहद आसान है। फसल की शुरुआती अवस्था में बीच वाली पत्ती सूख जाती है जिसे “डेड हार्ट” कहा जाता है। यदि इस सूखी पत्ती को हल्के हाथ से खींचा जाए तो वह आसानी से निकल आती है। बाद की अवस्था में जब बालियां निकलती हैं तो प्रभावित पौधों में सफेद और खाली बालियां दिखाई देती हैं जिन्हें “व्हाइट ईयर” कहा जाता है। यदि खेत में ऐसे लक्षण दिखाई देने लगें तो समझ जाइए कि तना छेदक सक्रिय हो चुका है और अब देरी करना नुकसानदायक हो सकता है।
अक्सर किसान तब तक इंतजार करते रहते हैं जब तक नुकसान स्पष्ट दिखाई न देने लगे। इसके बाद वे बाजार जाकर सबसे महंगी या नई दवा खरीद लेते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि तना छेदक के नियंत्रण में सबसे महत्वपूर्ण चीज दवा का समय है, न कि केवल उसका ब्रांड। यदि सही समय पर दवा डाल दी जाए तो सामान्य दवा भी उत्कृष्ट परिणाम देती है, जबकि देर से डाली गई महंगी दवा भी अपेक्षित लाभ नहीं देती।
तना छेदक नियंत्रण के लिए प्रमुख तकनीकी तत्व (Active Ingredients)
आज बाजार में तना छेदक नियंत्रण के लिए मुख्य रूप से कुछ ही तकनीकी तत्व उपलब्ध हैं। इनमें क्लोरान्ट्रानिलिप्रोल (Chlorantraniliprole), कार्टाप हाइड्रोक्लोराइड (Cartap Hydrochloride), फिप्रोनिल (Fipronil) और इनके विभिन्न कॉम्बिनेशन प्रमुख हैं। कई कंपनियां इन्हीं तकनीकी तत्वों को अलग-अलग नामों से बेचती हैं। इसलिए पैकेट पर Active Ingredient पढ़ना हर किसान की आदत बननी चाहिए।
यदि खेत में शुरुआती प्रकोप दिखाई दे तो Cartap Hydrochloride 4G की 5 से 7 किलोग्राम प्रति एकड़ या Fipronil 0.3G की 4 से 5 किलोग्राम प्रति एकड़ मात्रा का प्रयोग किया जा सकता है। यदि क्लोरान्ट्रानिलिप्रोल आधारित ग्रेन्यूल उपलब्ध हों, तो कंपनी के लेबल पर लिखी गई अनुशंसित मात्रा के अनुसार उपयोग करें। किसी भी स्थिति में निर्धारित मात्रा से अधिक दवा डालने से अतिरिक्त लाभ नहीं मिलता बल्कि लागत बढ़ जाती है।
यदि ग्रेन्यूल दवा उपलब्ध न हो या बाद की अवस्था में स्प्रे करना आवश्यक हो जाए, तो Chlorantraniliprole 18.5% SC की लगभग 60 मिलीलीटर प्रति एकड़ मात्रा को 150 से 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव किया जा सकता है। कई क्षेत्रों में Cartap Hydrochloride 50% SP की 250 ग्राम प्रति एकड़ या Emamectin Benzoate 5 SG की 80 से 100 ग्राम प्रति एकड़ मात्रा भी वैज्ञानिक सलाह के अनुसार उपयोग की जाती है। दवा का चुनाव स्थानीय कृषि विशेषज्ञ या कृषि विभाग की सलाह के अनुसार करना अधिक सुरक्षित रहता है।
कीटनाशक का प्रयोग करते समय ध्यान रखने योग्य जरूरी सावधानियां
दवा डालने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना दवा का चुनाव। ग्रेन्यूल दवा हमेशा ऐसे समय डालें जब खेत में लगभग 2 से 3 सेंटीमीटर पानी मौजूद हो। दवा डालने के बाद कम से कम 48 घंटे तक पानी खेत में बना रहना चाहिए, ताकि दवा अच्छी तरह कार्य कर सके। सूखे खेत में ग्रेन्यूल डालने से उसका पूरा लाभ नहीं मिलता। यदि खेत में अधिक पानी भरा हो तो पहले अतिरिक्त पानी निकाल दें और फिर दवा डालें।
दवाओं में रेजिस्टेंस (Resistance) और यूरिया के असंतुलन से बचें
कई किसान यह गलती करते हैं कि वे हर साल एक ही दवा का उपयोग करते रहते हैं। लगातार एक ही तकनीकी तत्व का प्रयोग करने से कीटों में प्रतिरोधक क्षमता (Resistance) विकसित होने लगती है। इसलिए यदि पिछले वर्ष आपने क्लोरान्ट्रानिलिप्रोल आधारित दवा का प्रयोग किया था, तो इस बार आवश्यकता अनुसार किसी अन्य तकनीकी तत्व या उपयुक्त कॉम्बिनेशन का चयन करें। इससे दवा की प्रभावशीलता लंबे समय तक बनी रहती है।
धान में तना छेदक का प्रकोप अधिक होने का एक बड़ा कारण असंतुलित उर्वरक प्रबंधन भी है। कई किसान आवश्यकता से अधिक यूरिया डाल देते हैं। अधिक नाइट्रोजन मिलने से पौधे कोमल हो जाते हैं और तना छेदक सहित कई कीट तेजी से बढ़ते हैं। सामान्यतः धान में नाइट्रोजन की अनुशंसित मात्रा को तीन बराबर भागों में देना चाहिए-पहली खुराक रोपाई के समय, दूसरी टिलरिंग अवस्था पर और तीसरी बालियां निकलने से पहले। एक साथ अत्यधिक यूरिया डालने से बचें।
समेकित कीट प्रबंधन (IPM): फेरोमोन ट्रैप और ‘T’ शेप बर्ड परच से प्राकृतिक नियंत्रण
यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से कीट प्रबंधन अपनाना चाहते हैं, तो केवल रासायनिक दवाओं पर निर्भर रहना उचित नहीं होगा। खेत में प्रति एकड़ 2 से 4 फेरोमोन ट्रैप लगाने से तना छेदक की तितलियों की निगरानी की जा सकती है। जैसे ही ट्रैप में तितलियां दिखाई देने लगें, किसान समय रहते दवा डाल सकते हैं। इससे अनावश्यक छिड़काव भी कम होता है और खर्च भी बचता है।
इसके अलावा धान के खेत में 15 से 20 टी-आकार के बर्ड परच प्रति एकड़ लगाने से मैना, बगुला और अन्य कीटभक्षी पक्षी खेत में आने लगते हैं और तना छेदक व अन्य कीटों के लार्वा को खाकर उनकी संख्या कम कर देते हैं। यह कम लागत वाली और पर्यावरण के अनुकूल तकनीक है, जिसे कई कृषि विश्वविद्यालय भी बढ़ावा देते हैं।
यदि खेत में कीट का प्रकोप आर्थिक क्षति स्तर से कम है, तो तुरंत रासायनिक दवा का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं होती। पहले निगरानी करें, प्रभावित पौधों की संख्या देखें और फिर निर्णय लें। कई बार केवल प्राकृतिक शत्रुओं और संतुलित खेती के माध्यम से भी कीटों को नियंत्रित किया जा सकता है।
किसानों के लिए यह भी जरूरी है कि वे केवल दुकानदार की सलाह पर दवा न खरीदें। दवा खरीदते समय हमेशा पैकेट पर तकनीकी तत्व, मात्रा, बैच नंबर और उपयोग की विधि अवश्य पढ़ें। यदि किसी दवा का केवल नाम बदला गया है लेकिन तकनीकी तत्व वही है, तो केवल ब्रांड बदलने से चमत्कारिक परिणाम मिलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
निष्कर्ष: आज खेती में सफलता का आधार केवल महंगी दवाइयां नहीं, बल्कि सही जानकारी है। जो किसान समय पर निगरानी करते हैं, संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाते हैं, फेरोमोन ट्रैप और बर्ड परच जैसी तकनीकों का उपयोग करते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर ही सही मात्रा में दवा डालते हैं, उनकी लागत कम होती है और उत्पादन अधिक मिलता है। यही एकीकृत कीट प्रबंधन (Integrated Pest Management) का मूल सिद्धांत है।
धान की खेती पहले से ही बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता और बाजार की चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे में अनावश्यक और बार-बार कीटनाशकों का प्रयोग केवल खर्च बढ़ाता है। इसलिए हर किसान को चाहिए कि वह वैज्ञानिक सलाह के अनुसार ही दवा का चयन करे, निर्धारित मात्रा का पालन करे और सही समय पर उसका उपयोग करे। इससे न केवल फसल सुरक्षित रहेगी बल्कि उत्पादन, गुणवत्ता और किसान की आय-तीनों में सुधार होगा।
Frequently Asked Questions (FAQ)
Q. धान में तना छेदक (Stem Borer) के शुरुआती लक्षण क्या हैं और इसकी पहचान कैसे करें?
उत्तर: धान में तना छेदक का पहला लक्षण ‘डेड हार्ट’ (Dead Heart) है, जिसमें पौधे की बीच वाली पत्ती या गोभ सूख जाती है। सूखी पत्ती को हाथ से खींचने पर वह आसानी से बाहर निकल आती है। बाद की अवस्था (बाली निकलते समय) में सफेद और खाली बालियां दिखाई देती हैं, जिन्हें ‘व्हाइट ईयर’ (White Ear) कहा जाता है।
Q. तना छेदक नियंत्रण के लिए दानेदार (Granule) दवाएं डालते समय क्या सावधानी रखनी चाहिए?
उत्तर: कार्टाप हाइड्रोक्लोराइड (Cartap Hydrochloride 4G) या फिप्रोनिल (Fipronil 0.3G) जैसी दानेदार दवाएं डालते समय खेत में लगभग 2 से 3 सेंटीमीटर पानी होना चाहिए। दवा डालने के बाद कम से कम 48 घंटे तक खेत में पानी बनाए रखना आवश्यक है, ताकि दवा पूरे पौधे तक पहुँच सके।
Q. क्या खेत में अधिक यूरिया (नाइट्रोजन) डालने से तना छेदक का प्रकोप बढ़ता है?
उत्तर: हाँ, आवश्यकता से अधिक यूरिया डालने से धान के पौधे अत्यधिक कोमल और रसीले हो जाते हैं, जिससे तना छेदक कीट तेजी से आकर्षित होते हैं। यूरिया की अनुशंसित मात्रा को हमेशा तीन बराबर भागों में बाँटकर (रोपाई, टिलरिंग और बालियां निकलने से पहले) देना चाहिए।
Q. फेरोमोन ट्रैप और ‘T’ शेप बर्ड परच से तना छेदक का नियंत्रण कैसे होता है?
उत्तर: प्रति एकड़ 2 से 4 फेरोमोन ट्रैप (Pheromone Traps) लगाने से नर तितलियां पकड़ी जाती हैं, जिससे कीटों का प्रजनन रुकता है। वहीं, खेत में 15-20 ‘T’ आकार की खूंटियां (Bird Perches) लगाने से पक्षी उन पर बैठकर तना छेदक के लार्वा और सुंडियों को खाकर स्वाभाविक रूप से नष्ट कर देते हैं।
Q. हर साल एक ही कीटनाशक का प्रयोग करने से क्या नुकसान होता है?
उत्तर: लगातार एक ही तकनीकी तत्व (Active Ingredient) वाली दवा का इस्तेमाल करने से कीटों में उस दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता (Resistance) विकसित हो जाती है। इसलिए हर साल या हर स्प्रे में दवा का तकनीकी सॉल्ट (जैसे क्लोरान्ट्रानिलिप्रोल की जगह कार्टाप या फिप्रोनिल) बदल-बदल कर इस्तेमाल करना चाहिए।
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