धान की कटाई का मौसम शुरू होते ही उत्तर भारत में पराली प्रबंधन की चुनौती फिर सामने आ गई है। पराली जलाना न केवल दिल्ली-एनसीआर और स्थानीय हवा को जहरीला बनाता है, बल्कि खेत की उपजाऊ मिट्टी के मित्र जीवाणु और जैविक कार्बन को भी राख कर देता है। पिछले कुछ वर्षों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) के प्रयासों से पंजाब में 93% और हरियाणा में 91% तक पराली जलने की घटनाएं घटी हैं। जानिए कैसे आप पूसा डीकम्पोजर, सुपर सीडर और पराली की गांठें (Bales) बनाकर इसे समस्या के बजाय मिट्टी की सेहत और अतिरिक्त आमदनी का साधन बना सकते हैं।
पराली: कृषि-कचरा नहीं, जैविक संपदा
पराली का मौसम फिर सामने है- धान की फसल अब पकने की ओर है और अनेक क्षेत्रों में शीघ्र ही कटाई शुरू हो जाएगी। कटाई के बाद खेत में बचा तना, पत्ती और अन्य अवशेष सामान्यतः धान की पराली या पुआल कहलाते हैं। हर वर्ष इसी समय पराली जलाने की घटनाएं वायु प्रदूषण, मिट्टी की गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ाती हैं।
लेकिन दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है। पराली कृषि-कचरा नहीं, बल्कि जैविक कार्बन, पोषक तत्व और ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्रोत है। सही तकनीक से इसका प्रबंधन किया जाए तो यही अवशेष मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, सिंचाई की आवश्यकता घटाने, जैविक खाद बनाने, पशुपालन एवं मशरूम उत्पादन तथा बायोएनर्जी के लिए उपयोगी हो सकता है।
2025 में पराली जलाने की घटनाओं में बड़ी कमी
पराली प्रबंधन को लेकर देश में लगातार किए जा रहे प्रयासों का सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे रहा है। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (Commission For Air Quality Management—CAQM) के अनुसार 2025 के धान कटाई मौसम में पंजाब में 5,114 और हरियाणा में 662 खेत-आग की घटनाएं दर्ज हुईं। पंजाब में यह संख्या 2024 की तुलना में 53 प्रतिशत और 2021 की तुलना में 93 प्रतिशत कम रही, जबकि हरियाणा में 2024 की तुलना में 53 प्रतिशत तथा 2021 की तुलना में 91 प्रतिशत कमी दर्ज की गई।
केंद्र सरकार के अनुसार 2018-19 से 10 मार्च 2026 तक Crop Residue Management कार्यक्रम के अंतर्गत ₹4,237.47 करोड़ जारी किए जा चुके हैं तथा संबंधित राज्यों में 3.53 लाख से अधिक मशीनें और 43,535 से अधिक Custom Hiring Centres (CHCs) स्थापित किए गए हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि तकनीक और संस्थागत सहयोग से पराली जलाने की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
पराली जलाने से मिट्टी को होने वाला नुकसान
पराली जलाने पर केवल धुआं ही नहीं निकलता, बल्कि खेत से मूल्यवान जैविक पदार्थ और पोषक तत्व भी नष्ट होते हैं। उच्च तापमान से मिट्टी की सतह पर मौजूद अनेक लाभकारी सूक्ष्मजीव प्रभावित होते हैं। बार-बार अवशेष जलाने से मिट्टी में जैविक कार्बन और जैविक गतिविधि घटने की आशंका रहती है। इसके अतिरिक्त धुएं में सूक्ष्म कण तथा विभिन्न गैसीय प्रदूषक शामिल होते हैं, जो स्थानीय वायु गुणवत्ता को खराब कर सकते हैं। इसलिए पराली जलाना खेत की समस्या को खेत से बाहर वातावरण और समाज की समस्या में बदल देता है।
खेत में पराली प्रबंधन और पूसा डीकम्पोजर
1. पराली को खेत में मिलाएं
यदि अगली फसल की बुवाई का समय उपलब्ध हो तो Super Straw Management System, Chopper, Mulcher, Super Seeder, Happy Seeder, Zero-Till Seed Drill जैसी मशीनों से पराली को काटकर खेत में मिलाया जा सकता है। इससे अवशेष धीरे-धीरे मिट्टी में मिलकर जैविक पदार्थ का स्रोत बनते हैं और मिट्टी की संरचना तथा नमी संरक्षण में सहायता मिल सकती है।
कटे हुये पराली के टुकड़ों को जल्दी सड़ाने के लिए खेत मे पानी भरके 8 किग्रा यूरिया / हेक्टर की दर से प्रयोग करने से पराली बहुत जल्दी सड़ गलकर मिट्टी मे मिल जाती है। जहां मशीन खरीदना आर्थिक रूप से संभव न हो, वहां Custom Hiring Centre से मशीन किराये पर लेना अधिक व्यावहारिक विकल्प है।
2. जैव-अपघटन को बढ़ावा दें
पराली को खेत में मिलाने के बाद उचित नमी बनाए रखना महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिक रूप से उपलब्ध माइक्रोबियल बायो-डिकम्पोजर, जैसे ICAR-IARI द्वारा विकसित Pusa Decomposer, जैविक अवशेषों के अपघटन को तेज करने में उपयोगी हो सकते हैं।
ICAR के अनुसार Pusa Decomposer सात फफूंद प्रजातियों का माइक्रोबियल कंसोर्टियम है और विभिन्न कृषि अवशेषों सहित धान की पराली के अपघटन में उपयोग किया जाता है। हालांकि किसान को उत्पाद की अनुशंसित मात्रा, पानी की उपलब्धता, खेत की नमी और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही इसका प्रयोग करना चाहिए।
3. पराली से अतिरिक्त आय
हर पराली को खेत में मिलाना ही एकमात्र विकल्प नहीं है। जहां पर्याप्त मात्रा में पराली उपलब्ध हो और आसपास मांग हो, वहां इसे बेलर और रेक से एकत्र कर गांठों में बदला जा सकता है। इनका उपयोग पशु-आहार के लिए उपयुक्त परिस्थितियों में, मशरूम उत्पादन, कम्पोस्ट, पैकेजिंग सामग्री तथा बायोमास आधारित उद्योगों में किया जा सकता है।
सरकार ने पुआल आधारित आपूर्ति-श्रृंखला, बायोमास और जैव-ईंधन क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय सहायता का प्रावधान किया है। Crop Residue Management व्यवस्था में किसानों को मशीन खरीद पर 50 प्रतिशत तक तथा पात्र संस्थाओं/समूहों को Custom Hiring Centres के लिए 80 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता का प्रावधान है; पुआल आपूर्ति-श्रृंखला परियोजनाओं के लिए भी सहायता उपलब्ध है।
2026-27 में संसाधन के रूप में पराली पर जोर
जून 2026 में केंद्र सरकार ने पराली प्रबंधन को दीर्घकालिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए 2026-27 में ₹544.15 करोड़ के प्रावधान, 46,000 से अधिक मशीनों के वितरण और 141 पुआल आपूर्ति-श्रृंखला परियोजनाओं के विकास का लक्ष्य बताया। इससे स्पष्ट है कि भविष्य की रणनीति केवल “पराली न जलाएं” तक सीमित नहीं रह सकती। इसके साथ “पराली का आर्थिक उपयोग करें” को भी समान महत्व देना होगा।
किसान क्या करें- क्या न करें?
क्या करें- कटाई के तुरंत बाद उपलब्ध मशीनों से पराली का प्रबंधन करें। छोटे किसानों के लिए CHC/FPO/सहकारी समिति की मशीनों का उपयोग करें। खेत में मिलाने पर पर्याप्त नमी बनाए रखें। जैव-अपघटक का उपयोग वैज्ञानिक सलाह के अनुसार करें।अतिरिक्त पराली को बेल बनाकर स्थानीय बाजार/उद्योग से जोड़ें। ग्राम स्तर पर “पराली बैंक” या सामुदायिक संग्रह व्यवस्था विकसित करें।
क्या न करें- खेत में खुली आग न लगाएं।अधजली पराली को खेत में न छोड़ें। बिना वैज्ञानिक सलाह के अत्यधिक रसायन या यूरिया का प्रयोग करके अपघटन तेज करने का प्रयास न करें। पराली को सड़क, नहर या जलस्रोत के किनारे न फेंकें।
कानून के डर से नहीं, भविष्य की समझ से रोकें आग
पराली जलाने की रोकथाम के लिए निगरानी और नियामकीय कार्रवाई लगातार मजबूत की जा रही है। CAQM ने 2026 के लिए पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में धान की पराली जलाने की घटनाओं को समाप्त करने के लक्ष्य के साथ राज्य-विशिष्ट Action Plans लागू किए हैं। लेकिन स्थायी समाधान केवल निगरानी या दंड से संभव नहीं होगा। किसान को सस्ती मशीन, समय पर उपलब्धता, स्थानीय संग्रह व्यवस्था, बाजार और पराली के लिए उचित आर्थिक मूल्य—इन पांचों की जरूरत है।
अंत में
धान की पराली को जलाना वास्तव में खेत में उपलब्ध एक मूल्यवान संसाधन को आग के हवाले करना है। वही पराली यदि खेत में मिलाई जाए तो जैविक पदार्थ का स्रोत बन सकती है; यदि एकत्र की जाए तो पशुपालन, मशरूम, कम्पोस्ट और बायोएनर्जी उद्योग की कच्ची सामग्री बन सकती है। इसलिए इस धान कटाई मौसम में संदेश स्पष्ट होना चाहिए- “पराली जलाएँ नहीं- मिट्टी में मिलाएँ, उपयोग में लाएँ और आय बढ़ाएँ।”
पराली प्रबंधन केवल वायु प्रदूषण रोकने का अभियान नहीं है; यह मृदा स्वास्थ्य, टिकाऊ खेती, किसान की अतिरिक्त आय और आने वाली पीढ़ियों के स्वच्छ पर्यावरण से जुड़ा विषय है। किसान, कृषि विश्वविद्यालय, KVK, FPO, पंचायत, उद्योग और सरकार मिलकर काम करें तो पराली की आग को हरित अर्थव्यवस्था की ऊर्जा में बदला जा सकता है।
अस्वीकरण: यह लेख सामान्य वैज्ञानिक एवं कृषि-परामर्श की जानकारी के उद्देश्य से Dr. SK Singh द्वारा व्यक्तिगत हैसियत से तैयार किया गया है। इसका मेरे संस्थान ज हाँ मैं वर्तमान मे कार्यरत हूँ से कोई संबंध नहीं है । पराली प्रबंधन की उपयुक्त विधि फसल की अवस्था, मिट्टी, मौसम, अगली फसल, उपलब्ध मशीनरी तथा स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
किसी भी जैव-अपघटक, रसायन या मशीन के उपयोग से पहले संबंधित कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र अथवा कृषि विभाग की स्थानीय एवं अद्यतन अनुशंसा का पालन करें। सरकारी योजनाओं, सब्सिडी और पात्रता की शर्तें समय-समय पर बदल सकती हैं; लाभ लेने से पहले संबंधित विभाग की वर्तमान अधिसूचना की पुष्टि करें।
निष्कर्ष: धान की पराली को खेत का कूड़ा समझकर माचिस की तीली दिखाना अपनी ही मिट्टी की सेहत और आने वाली पीढ़ियों के फेफड़ों पर कुल्हाड़ी चलाने जैसा है। जब पूसा डीकम्पोजर, सुपर सीडर, कस्टम हायरिंग सेंटर और 80% तक की सरकारी सब्सिडी के साथ-साथ बायो-एनर्जी उद्योगों में पराली की गांठें बेचकर कमाई के ठोस विकल्प मौजूद हैं, तो पराली को समस्या नहीं बल्कि किसान की अतिरिक्त आय का साधन बनाया जाना चाहिए।
किसान भाइयों को कानून के डर से नहीं, बल्कि भविष्य की समझ से खेत में आग लगाना बंद करना होगा, ताकि हमारी मिट्टी भी उपजाऊ रहे और हवा भी शुद्ध बनी रहे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. पूसा डीकम्पोजर (Pusa Decomposer) क्या है और यह पराली कैसे गलाता है?
उत्तर: आईसीएआर-आईएआरआई द्वारा विकसित पूसा डीकम्पोजर सात लाभकारी फफूंद प्रजातियों का एक सूक्ष्मजीवी कंसोर्टियम है, जो खेत में नमी रहने पर पराली के कड़े रेशों को तेजी से गलाकर जैविक खाद में बदल देता है।
Q2. पराली प्रबंधन की मशीनों पर सरकार कितनी सब्सिडी देती है?
उत्तर: क्रॉप रेसिड्यू मैनेजमेंट योजना के तहत व्यक्तिगत किसानों को मशीनों की खरीद पर 50% तक और किसान समूहों या कस्टम हायरिंग सेंटर्स (CHC) को 80% तक वित्तीय सहायता दी जाती है।
Q3. डीडवाना-कुचामन जिले में सप्लाई और बुवाई को लेकर क्या विसंगति सामने आई?
उत्तर: रिकॉर्ड के अनुसार जिले में 263 क्विंटल कैंचा बीज 30 जुलाई 2025 को पहुंचा, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में 15 से 21 जुलाई के बीच ही किसानों को वितरण और बुवाई का विवरण दर्ज कर दिया गया था।
Q4. मामले पर राजस्थान बीज निगम के अधिकारियों का क्या कहना है?
उत्तर: निगम के एमडी गौरव चतुर्वेदी ने नए कार्यभार का हवाला देकर तथ्य जांचने की बात कही, जबकि तत्कालीन विपणन प्रबंधक मुकेश शर्मा के अनुसार यह निर्णय बजट घोषणा के तहत कमेटी स्तर पर नियमानुसार लिया गया था।
Q5. क्या इस मामले में लगाए गए आरोप सिद्ध हो चुके हैं?
उत्तर: नहीं, सामने आई जानकारी मीडिया जांच रिपोर्ट और संबंधित अधिकारियों के बयानों पर आधारित है; इस पर अंतिम स्थिति आधिकारिक जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
यह भी पढ़े: हरियाणा में बागवानी पर ₹1.40 लाख तक अनुदान: फल, सब्जी, मसाले और फूलों की खेती पर सब्सिडी
जागरूक रहिए व नुकसान से बचिए और अन्य लोगों के जागरूकता के लिए साझा करें। कृषि लेख, सरकारी योजनाएं, कृषि तकनीक, व्यवसायिक एवं जैविक खेती से संबंधित सटीक जानकारियां प्राप्त करने के लिए जुड़े कृषि जागृति चलो गांव की ओर से या कृषि संबंधित किसी भी समस्या के जैविक समाधान के लिए WhatsApp करें।

प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह- विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी, पूर्व प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना एवं पूर्व सह निदेशक अनुसंधान, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर ( बिहार )
