संसदीय स्थायी समिति ने केंद्र सरकार की उस नीति पर सवाल उठाए हैं, जिसमें जैविक फसलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी के दायरे से बाहर रखा गया है। समिति का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था टिकाऊ खेती अपनाने वाले किसानों को पर्याप्त समर्थन नहीं दे पा रही है। अपनी रिपोर्ट में समिति ने सिफारिश की है कि पारंपरिक फसलों की तरह जैविक उत्पादों के लिए भी एमएसपी तय किया जाए, ताकि किसानों को मूल्य अस्थिरता से सुरक्षा मिल सके।
कृषि मंत्रालय ने राज्यसभा में बताया कि फिलहाल 22 फसलों के लिए एमएसपी और गन्ने के लिए एफआरपी लागू है, जो कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की सिफारिशों पर आधारित है। हालांकि समिति ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि मौजूदा एमएसपी प्रणाली में जैविक खेती की वास्तविक लागत शामिल नहीं है। समिति ने यह भी रेखांकित किया कि जैविक खेती में श्रम लागत अधिक, साथ ही प्रमाणन और अलग भंडारण जैसी अतिरिक्त लागतें भी जुड़ती हैं।
इसके अलावा संक्रमण काल में उत्पादन और मुनाफा दोनों प्रभावित होते हैं, जिससे किसानों के लिए यह बदलाव चुनौतीपूर्ण बन जाता है।समिति के अनुसार, यदि जैविक फसलों को एमएसपी के दायरे में लाया जाता है, तो इससे किसानों को मूल्य सुरक्षा, अतिरिक्त लागत की भरपाई और टिकाऊ खेती को बढ़ावा मिलेगा। इससे प्राकृतिक खेती और परंपरागत कृषि विकास योजना जैसी पहलें भी मजबूत होंगी।
संसदीय समिति की यह सिफारिश खेती के ‘केमिकल मॉडल’ से ‘नेचुरल मॉडल’ की ओर जाने के लिए एक “इकोनॉमिक ब्रिज” (आर्थिक सेतु) की मांग करती है। समिति का तर्क है कि यदि सरकार चाहती है कि भारत जैविक खेती का हब बने, तो उसे “न्यूनतम समर्थन मूल्य” को “न्यूनतम प्रोत्साहन मूल्य” के रूप में जैविक फसलों पर भी लागू करना ही होगा।
यह भी पढ़े: पपीता की जैविक खेती से किसान की आय में आया बड़ा उछाल
जागरूक रहिए व नुकसान से बचिए और अन्य लोगों के जागरूकता के लिए साझा करें एवं कृषि जागृति, स्वास्थ्य सामग्री, सरकारी योजनाएं, कृषि तकनीक, व्यवसायिक एवं जैविक खेती से संबंधित जानकारियां प्राप्त करने के लिए जुड़े कृषि जागृति चलो गांव की ओर से या कृषि संबंधित किसी भी समस्या के जैविक समाधान के लिए WhatsApp करें।
