पश्चिमी उत्तर प्रदेश के “चीनी के कटोरे” में इस बार मिठास कम और कड़वाहट ज्यादा नजर आ रही है। बीमारी, कीटों के हमले और मौसम की बेरुखी ने मिलकर गन्ना किसानों की कमर तोड़ दी है। सबसे बड़ा संकट राज्य की सबसे लोकप्रिय गन्ना किस्म Co-0238 पर आया है, जो ‘रेड रॉट’ यानी लाल सड़न बीमारी की चपेट में पूरी तरह आ चुकी है।
इस बीमारी के चलते गन्ने की उपलब्धता में 15-20 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है। केवल बीमारी ही नहीं, बल्कि रेड स्पाइडर माइट्स और व्हाइटफ्लाई जैसे कीटों ने भी पत्तियों पर हमला कर प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को बाधित कर दिया है। इसके कारण फसल अंदर से कमजोर हो गई और किसानों की साल भर की मेहनत खेतों में ही दम तोड़ती दिख रही है।
नुकसान का भौगोलिक दायरा मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और बिजनौर जैसे प्रमुख गन्ना बेल्ट तक फैला हुआ है। आर्थिक रूप से यह झटका बहुत बड़ा है, क्योंकि कुल नुकसान का अनुमान करीब 2,000 करोड़ रुपये लगाया जा रहा है। अकेले मुजफ्फरनगर जिले को 800 करोड़ रुपये की भारी क्षति उठानी पड़ी है, जबकि सहारनपुर में 450 करोड़ रुपये का नुकसान दर्ज किया गया है।
चीनी मिलों के पहिये भी इस संकट के कारण सुस्त पड़ गए हैं। शामली, बागपत, बुलंदशहर और हापुड़ जैसे जिलों में चीनी उत्पादन में 10 से 20 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई है। हापुड़ में 380 करोड़ और बिजनौर व शामली में 200-200 करोड़ रुपये के नुकसान ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है। बागपत में 80 करोड़ और बुलंदशहर में भी 56 करोड़ रुपये की < क्षति हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगस्त-सितंबर के दौरान हुई बेतहाशा बारिश और तापमान में उतार-चढ़ाव ने आग में घी का काम किया। इस मौसम ने विशेष रूप से ‘रैटून’ (दूसरी कटाई वाली फसल) के विकास को बुरी तरह प्रभावित किया। इसके कारण न केवल पैदावार घटी, बल्कि गन्ने से चीनी निकलने की ‘रिकवरी रेट’ पर भी बहुत बुरा असर पड़ा है।
कुल मिलाकर, बीमारी और कीटों के इस दोहरे हमले ने गन्ने की प्रतिरोधक क्षमता को खत्म कर दिया है। यह स्थिति न केवल किसानों की तत्काल आय पर भारी पड़ रही है, बल्कि पूरे क्षेत्र के चीनी उद्योग के लिए भी एक गंभीर अस्तित्वगत चुनौती बन गई है।
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