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भारत में चावल की कीमतें स्थिर, पर वियतनाम-थाईलैंड में भारी उछाल..!

09/04/2026 by krishijagriti5

भारत में चावल की कीमतें स्थिर, पर वियतनाम-थाईलैंड में भारी उछाल..!

वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई हालिया तेजी ने अब चावल के अंतरराष्ट्रीय व्यापार का गणित बिगाड़ना शुरू कर दिया है। ईंधन की बढ़ती लागत ने माल ढुलाई को इतना महंगा कर दिया है कि प्रमुख निर्यातक देशों के बीच कीमतों में एक बड़ा अंतर साफ दिखाई देने लगा है। यह स्थिति न केवल शिपिंग कंपनियों के लिए सिरदर्द बनी है, बल्कि वैश्विक अनाज बाजार में अनिश्चितता के बादल भी गहरे कर रही है।

भारत में चावल की कीमतें फिलहाल एक स्थिर दायरे में टिकी हुई हैं। बाजार में 5% टूटे दाने वाला परबॉयल्ड चावल 341 से 348 डॉलर प्रति टन और सफेद चावल 336 से 341 डॉलर प्रति टन के बीच कारोबार कर रहा है। हालांकि, यह स्थिरता बाजार में किसी नई मांग के कारण नहीं, बल्कि देश में मौजूद अनाज के प्रचुर और मजबूत घरेलू भंडार की वजह से बनी हुई है।

मज़बूत आपूर्ति के बावजूद, बढ़ती ढुलाई लागत ने अफ्रीकी देशों जैसे संवेदनशील बाजारों की क्रय शक्ति को प्रभावित किया है। भारत की कीमतें प्रतिस्पर्धी होने के बावजूद यहां से उठाव काफी धीमा पड़ गया है। बल्क शिपमेंट में माल-भाड़े के बढ़ते दबाव ने खरीदारों को नए सौदे करने से हिचकने पर मजबूर कर दिया है, जिससे निर्यात की वैश्विक रफ्तार सुस्त होती दिख रही है।

इसके विपरीत, वियतनाम और थाईलैंड जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों में चावल की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखा जा रहा है। वियतनाम का 5% ब्रोकन चावल 350 से 355 डॉलर से बढ़कर अब 375 डॉलर प्रति टन तक जा पहुँचा है। वहीं थाईलैंड में भी कीमतें 370 से 375 डॉलर के पार बनी हुई हैं। इन देशों में आपूर्ति की कमी और आसमान छूती लॉजिस्टिक्स लागत ने निर्यातकों को दाम बढ़ाने पर मजबूर कर दिया है।

इस पूरे बदलाव की जड़ें वैश्विक ऊर्जा संकट और पश्चिम एशिया में जारी तनाव से जुड़ी हैं। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने न केवल परिवहन बल्कि मिलिंग और उत्पादन की पूरी मूल्य श्रृंखला को महंगा बना दिया है। साथ ही, प्रमुख समुद्री मार्गों पर बढ़े हुए बीमा प्रीमियम और मालभाड़े ने निर्यातकों के लिए जोखिम और लागत, दोनों को कई गुना बढ़ा दिया है।

वर्तमान में वैश्विक खरीदार ‘रुको और देखो’ की रणनीति अपना रहे हैं, जिससे बड़ी व्यापारिक गतिविधियां फिलहाल ठंडी पड़ी हैं। हालांकि भारत की मज़बूत भंडार स्थिति ने अभी वैश्विक बाजार को एक संतुलन प्रदान किया है, लेकिन अगर ईंधन की कीमतें लंबे समय तक इसी तरह ऊंची बनी रहीं, तो भारतीय निर्यात कीमतों में भी बढ़ोतरी होना तय है।

यह उभरता हुआ रुझान इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वैश्विक खाद्य व्यापार अब ऊर्जा की कीमतों के उतार-चढ़ाव के प्रति पहले से कहीं अधिक संवेदनशील हो चुका है। भविष्य में खाद्य सुरक्षा केवल फसल के उत्पादन पर नहीं, बल्कि वैश्विक ईंधन और लॉजिस्टिक्स की स्थिरता पर भी उतनी ही निर्भर करेगी।

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Filed Under: कृषि समाचार Tagged With: Crude Oil Prices Impact, Global Rice Trade, Indian Rice Exports, Insurance Premium in Export, Shipping Freight Rates

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