अक्सर हम देखते हैं कि फरवरी तक गेहूं की फसल बहुत अच्छी, हरी-भरी और मजबूत दिखाई देती है, लेकिन जैसे ही मार्च आता है, खासकर होली के बाद, फसल की चमक जैसे खत्म हो जाती है। दाना पतला रह जाता है, बाली पूरी तरह भर नहीं पाती, ऊपर के दाने हल्के रह जाते हैं और वजन कम हो जाता है। इसका सीधा असर पैदावार पर पड़ता है और कई बार 3 से 5 क्विंटल प्रति एकड़ तक उत्पादन घट जाता है।
इस समस्या का सबसे बड़ा कारण मार्च में बढ़ता तापमान, जिसे टर्मिनल हीट कहा जाता है। लगभग 15 मार्च के आसपास तापमान 35 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। जबकि गेहूं के दाने भरने की अवस्था, जिसे दुग्ध अवस्था कहते हैं, उसके लिए आदर्श तापमान 25 से 30 डिग्री के बीच होना चाहिए। जब 90 से 100 दिन की फसल मार्च में इस अवस्था में पहुंचती है।
और तापमान ज्यादा होता है, तो दाने का भराव पूरी तरह नहीं हो पाता। नतीजा यह होता है कि नीचे के दाने कुछ हद तक ठीक रहते हैं लेकिन बाली के ऊपर के दाने कमजोर और हल्के रह जाते हैं। इसका पहला समाधान यह है कि समय पर बुवाई। गेहूं किसानों की कोशिश यह होनी चाहिए कि फरवरी के अंत तक फसल 100 दिन की अवस्था में पहुंच जाए। इससे दाने भरने की मुख्य प्रक्रिया फरवरी के अनुकूल तापमान में पूरी हो जाती है और मार्च की तेज गर्मी का असर कम पड़ता है।
जो किसान लेट बुवाई करते हैं, उनकी दुग्ध अवस्था मार्च में चली जाती है और नुकसान ज्यादा होता है। यदि किसी कारण से बुवाई लेट हो रही है, जैसे धान की देर से कटाई या खेत में पानी भराव, तो ऐसे में गेहूं की किस्म का चयन बदलना चाहिए। कम अवधि वाली या हीट टॉलरेंस वाली किस्में अपनाने से 8 से 10 दिन का फायदा मिल सकता है और दाने का भराव अपेक्षाकृत बेहतर हो सकता है।
दूसरा बड़ा कारण यह है कि नमी प्रबंधन। मार्च में गर्मी के साथ-साथ तेज हवाएं भी चलने लगती हैं। इस समय खेत में मध्यम नमी बनाए रखना जरूरी है। आखिरी सिंचाई बहुत सोच-समझकर करनी चाहिए। खेत को ज्यादा सुखा भी न दें और अत्यधिक पानी भी न लगाएं, क्योंकि ज्यादा नमी और हवा के कारण फसल गिरने का खतरा बना रहता है। मध्यम नमी की स्थिति में आखिरी पानी देना सबसे बेहतर रहता है।
यदि फसल थोड़ी हल्की महसूस हो रही है और दाने का भराव कमजोर लग रहा है, तो जी-पोटाश का स्प्रे किया जा सकता है। पोटाश दानों को वजनदार बनाता है और ऊपर के हल्के दानों को भरने में मदद करता है। इसके साथ बोरोन का सीमित मात्रा में उपयोग करने से दानों में चमक और गुणवत्ता बेहतर हो सकती है।
कुछ किसान बाली अवस्था में नैनो यूरिया या अतिरिक्त नाइट्रोजन का छिड़काव भी करते हैं, लेकिन इस अवस्था में गेहूं को अधिक नाइट्रोजन की जरूरत नहीं होती। ज्यादा नाइट्रोजन से दाने के बजाय पत्तियों पर असर पड़ सकता है और लाभ अपेक्षित नहीं मिलता। इसलिए बाली आने के बाद नाइट्रोजन आधारित स्प्रे से बचना चाहिए।
संक्षेप में देखें तो समय पर बुवाई, सही किस्म का चयन, संतुलित सिंचाई और दाने भराव के समय जी -पोटाश का स्प्रे ये चार मुख्य बातें हैं जो मार्च की गर्मी से होने वाले गेहूं के नुकसान को काफी हद तक कम कर सकती हैं। यदि इन बातों का ध्यान रखा जाए तो 20 से 25 प्रतिशत तक पैदावार में सुधार संभव है।
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