मिट्टी की उर्वरा शक्ति कैसे बढ़ाएं? समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन की वैज्ञानिक गाइड

हर साल खेत में यूरिया और डीएपी की बोरियां बढ़ाते रहने के बाद भी अगर फसल पीली पड़ रही है और पैदावार घट रही है, तो समझ लीजिए कि आपकी मिट्टी अंदर से बीमार हो चुकी है। बिना मिट्टी जांच कराए रासायनिक खादों की अंधाधुंध झोंकाई करने के बजाय 12 माह पुरानी सड़ी गोबर खाद, सनई-ढैंचा की हरी खाद और जीवाणु कल्चर के समन्वित प्रबंधन को अपनाए बिना खेती में टिकाऊ मुनाफा पाना असंभव है।

मिट्टी की घटती उर्वरा शक्ति का संकट

मृदा में पाये जाने वाले लाभदायक कीट, जीवाणु और मृदा की जलधारण क्षमता में कमी होती जा रही है। रासायनिक उर्वरक के असंतुलित प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति अत्यधिक प्रभावित हो चली है। सघन फसलोत्पादन लेने के कारण भी भूमि की सामान्य उर्वरा शक्ति में कमी आई है। भूमि से अधिक पैदावार लेने के लिए उसकी उर्वरा शक्ति को बनाये रखना अत्यन्त आवश्यक है। ऐसी स्थिति में समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन आज की प्रमुख आवश्यकता है। इसके लिए निम्नलिखित उपाय किसान को अपनाने चाहिये।

जैविक खाद और 12 माह सड़ी गोबर खाद

जैविक खाद: कार्बनिक खाद जैसे गोबर, कम्पोस्ट आदि के प्रयोग से भूमि की भौतिक, रासायनिक और जैविक स्थिति में काफी सुधार होता है। 12 माह पुरानी सड़ी हुई खाद को मिट्टी में मिलाने से जीवांश पदार्थ की मात्रा बढ़ती है। नत्रजन, फास्फोरस और पोटाश के साथ-साथ पौधों को सूक्ष्म पोषक तत्व भी प्राप्त होते हैं।

इन खाद का प्रभाव मृदा में कई वर्षों तक बना रहता है। इनके प्रयोग से भूमि की जल और पोषक तत्व को धारण करने की क्षमता बढ़ती है। चिकनी मिट्टी भुरभुरी बन जाती है, जिससे उसमें हवा-पानी का आवागमन आसानी से होने लगता है। इन खाद से जीवाणुओं को भी भोजन मिलता है। जिससे उनकी संख्या और कार्यशीलता में वृद्धि होती है।

सनई और ढैंचा से हरी खाद का महत्व

हरी खाद: हरी खाद हेतु मुख्यतः सनई, ढैंचा आदि फसल काम में ली जाती है। हरी खाद के प्रयोग से भी भूमि में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ने के साथ-साथ पोषक तत्व की मात्रा भी बढ़ती है। हरी खाद हेतु ऐसी फसल का चुनाव करना चाहिए, जो कम उपजाऊ भूमि में भी वायुमण्डलीय नत्रजन का अधिक यौगिकीकरण करने की क्षमता रखती हो।

मिट्टी-पानी की नियमित वैज्ञानिक जांच

मिट्टी-पानी की जांच: मिट्टी-पानी की जांच करवाना और सिफारिश के अनुसार उर्वरक प्रयोग आज की प्रमुख आवश्यकता है। फिर भी, किसान भाई मिट्टी और पानी की जांच के प्रति बिल्कुल भी ध्यान नहीं देते हैं। नत्रजन उर्वरक का आवश्यकता से अधिक प्रयोग न केवल कीड़ों और बीमारियों के आक्रमण को बढ़ावा देता है। अपितु, दूसरे पोषक तत्व की उपलब्धता को भी प्रभावित करता है। अतः मिट्टी-पानी की जांच करवाकर आवश्यकतानुसार ही उर्वरक प्रयोग करें।

जीवाणु कल्चर से 10-25% पैदावार वृद्धि

जीवाणु कल्चर: जीवाणु कल्चर/खाद के प्रयोग से भूमि में लाभदायक जीवाणुओं की संख्या में आशातीत वृद्धि होती है। सहजीवी और असहजीवी जीवाणु भूमि में वायुमण्डलीय नत्रजन को स्थिर करते हैं। दलहनी फसल हेतु राइजोबियम कल्चर और दूसरी फसल हेतु एजेटोबैक्टर कल्चर का प्रयोग किया जाता है। जबकि सभी फसल हेतु उपयुक्त फास्फोरस घोलक जीवाणु जमीन में फास्फोरस की उपलब्धता बढ़ाते हैं। जीवाणु कल्चर के प्रयोग से फसल की पैदावार में 10-25 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गई है।

संतुलित उर्वरक और सही समय पर प्रयोग

संतुलित उर्वरक: फसल की अधिक पैदावार लेने हेतु वैज्ञानिकों द्वारा सिफारिश किए गए उर्वरक का प्रयोग संतुलित मात्रा में ही करना चाहिए। आवश्यकता से अधिक उपयोग न केवल फसल को हानि पहुंचायेगा, बल्कि, भूमि की उपजाऊ क्षमता में भी कमी करेगा। साथ ही, धन की भी बर्बादी करेगा। अतः किसान भाई फसल और भूमि की मांग के आधार पर ही उर्वरकों का संतुलित मात्रा में प्रयोग करें।

पोषक तत्व: अच्छी पैदावार लेने हेतु सभी पोषक तत्व का, फसल की आवश्यकतानुसार संतुलित मात्रा में मिट्टी परीक्षण के आधार पर प्रयोग करना चाहिये। इससे मिट्टी की उर्वराशक्ति में वृद्धि होती है। पोषक तत्व के असंतुलन से पैदावार पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे भूमि में पोषक तत्व के कमी की समस्या इतनी गंभीर हो जाती है कि फसल में पोषक तत्व की कमी के विशिष्ट लक्षण दिखाई देने लगते हैं और उपज में एकाएक अत्यधिक गिरावट आ जाती है।

अतः हमें सूक्ष्म पोषक तत्व की कमी को भी आवश्यकतानुसार पूरा करना चाहिए। नत्रजन को 2-3 भागों में बांटकर डालने से अधिक लाभ लिया जा सकता है। फास्फोरस और पोटाश उर्वरक भूमि में स्थिर हो जाते हैं। अतः इन्हें बुवाई के समय देना ही लाभदायक रहता है।

समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन (INM) के 3 जरूरी नियम

फास्फोरस और पोटाश को बाद में ऊपर से न फेंकें: फास्फोरस और पोटाश मिट्टी में गतिहीन (स्थिर) रहते हैं; इन्हें खड़ी फसल में ऊपर से फेंकने पर पौधे की जड़ें इन्हें नहीं ले पातीं, इसलिए इन्हें हमेशा बुवाई के समय बीज के नीचे गहराई में ही डालें।

नाइट्रोजन को 2-3 टुकड़ों में ही दें: पूरा यूरिया बुवाई के समय एक साथ कभी न झोंकें; इससे न केवल कीट-बीमारियों का हमला बढ़ता है बल्कि यूरिया पानी के साथ बहकर बर्बाद हो जाता है; इसे फसल बढ़वार के समय 2 से 3 बार में बांटकर दें।

कच्ची गोबर खाद कभी न डालें: खेत में हमेशा कम से कम 10 से 12 महीने पुरानी पूरी तरह सड़ी-गली भुरभुरी गोबर खाद ही डालें; कच्ची खाद डालने से दीमक, फंगस और खरपतवारों का प्रकोप भयानक रूप से बढ़ जाता है।

निष्कर्ष: समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन (INM) केवल खादों का मिश्रण नहीं, बल्कि मिट्टी के जीवन और किसान की आर्थिक सुरक्षा की वैज्ञानिक गारंटी है। मिट्टी परीक्षण के आधार पर रासायनिक खादों के साथ जैविक खाद, हरी खाद और जीवाणु कल्चर का संतुलन बनाकर किसान भाई न केवल खाद की लागत 30% तक घटा सकते हैं, बल्कि अपनी मिट्टी को अगली पीढ़ियों के लिए उपजाऊ और समृद्ध बनाए रख सकते हैं।

अस्वीकरण: यह तकनीकी मार्गदर्शिका Anil Kumar Prasad द्वारा अपने 5 वर्षों के धरातलीय खेती के अनुभव, मृदा विज्ञान अनुसंधान (ICAR/IISS) और किसानों के वास्तविक हितों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। किसी भी रासायनिक खाद या बायो-फर्टिलाइजर के प्रयोग से पूर्व अपने खेत की मिट्टी की जांच कराएं और स्थानीय कृषि रक्षा अधिकारी या KVK से सलाह अवश्य लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन (INM) क्या है और यह क्यों जरूरी है?

उत्तर: INM का अर्थ है मिट्टी की जांच के आधार पर जैविक खाद, हरी खाद, जीवाणु कल्चर और रासायनिक उर्वरकों का संतुलित व संयुक्त प्रयोग करना, ताकि मिट्टी की उपजाऊ शक्ति घटे बिना लंबे समय तक बंपर पैदावार मिलती रहे।

Q2. हरी खाद के लिए ढैंचा या सनई को खेत में कब पलटना चाहिए?

उत्तर: हरी खाद की फसल जब लगभग 45 से 50 दिन की हो जाए और उसमें फूल आने शुरू हों, तब मिट्टी पलटने वाले हल या रोटावेटर से उसे खेत में जोतकर पानी भर देना चाहिए।

Q3. जीवाणु कल्चर (Bio-fertilizer) के प्रयोग से कितना फायदा होता है?

उत्तर: राइजोबियम, एजोटोबैक्टर और फास्फोरस घोलक जीवाणु (PSB) के प्रयोग से जमीन में नाइट्रोजन व फास्फोरस की उपलब्धता बढ़ती है, जिससे फसल पैदावार में 10 से 25 प्रतिशत तक की ठोस वृद्धि होती है।

Q4. फास्फोरस और पोटाश उर्वरकों को बुवाई के समय ही क्यों डालना चाहिए?

उत्तर: क्योंकि फास्फोरस और पोटाश मिट्टी में गतिहीन (स्थिर) होते हैं और आसानी से नीचे नहीं पहुंचते; इसलिए बुवाई के समय जड़ों के पास डालने पर ही पौधे इन्हें ठीक से सोख पाते हैं।

Q5. कच्ची गोबर की खाद खेत में डालने से क्या नुकसान होता है?

उत्तर: कच्ची खाद डालने से मिट्टी में मीथेन गैस और गर्मी बनती है जिससे जड़ें गलती हैं, साथ ही खेत में दीमक, जड़ गलन कवक और खरपतवारों का प्रकोप बहुत बढ़ जाता है।

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