सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन (एसईए) के ताज़ा अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2025-26 के रबी सीजन के दौरान देश में सरसों का कुल उत्पादन 3.5 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि के साथ 119.4 लाख टन तक पहुँचने की संभावना है। पिछले वर्ष यह उत्पादन 115.2 लाख टन के स्तर पर दर्ज किया गया था। सरसों के रकबे में हुई बढ़ोतरी और प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में आया सुधार उत्पादन में बढ़ोतरी के प्रमुख कारण है।
चालू सीजन में सरसों की बुवाई का क्षेत्र बढ़कर 93.91 लाख हेक्टेयर हो गया है, जो पिछले वर्ष के 92.15 लाख हेक्टेयर के मुकाबले उल्लेखनीय रूप से अधिक है। सरसों की औसत पैदावार भी 1,250 किलोग्राम से बढ़कर 1,271 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अनुकूल मौसम की स्थिति और उन्नत कृषि प्रबंधन तकनीकों के समावेश ने फसल की गुणवत्ता और मात्रा, दोनों को मज़बूती प्रदान की है। राजस्थान 53.9 लाख टन के विशाल उत्पादन के साथ देश का सबसे बड़ा सरसों उत्पादक राज्य बना हुआ है।
उत्तर प्रदेश ने 18.1 लाख टन और हरियाणा ने 12.7 लाख टन के उत्पादन के साथ क्रमशः दूसरा और तीसरा स्थान हासिल किया है। पश्चिम बंगाल (7.4 लाख टन) और गुजरात (5.9 लाख टन) जैसे राज्यों में भी उत्पादन के मोर्चे पर उत्साहजनक प्रगति देखी गई है। हालांकि, असम में कम उत्पादकता के चलते उत्पादन घटकर 2.1 लाख टन रह गया, जबकि बिहार में स्थिति 0.8 लाख टन के साथ लगभग स्थिर बनी हुई है।
एसईए के अध्यक्ष संजीव अस्थाना के अनुसार, वर्ष 2019-20 में जहाँ देश मात्र 86 लाख टन सरसों का उत्पादन कर रहा था, वहीं अब 120 लाख टन के मनोवैज्ञानिक स्तर के करीब पहुँचना भारतीय तिलहन क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह प्रगति न केवल तिलहन मिशन की सफलता को पुष्ट करती है, बल्कि भविष्य में खाद्य तेलों के आयात पर भारत की निर्भरता कम करने की दिशा में भी एक निर्णायक कदम है।
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