आज हम गेहूं की फसल की एक ऐसी महत्वपूर्ण पत्ती के बारे में बात करेंगे, जिस पर अक्सर किसानों का ध्यान कम जाता है, लेकिन जिसका योगदान उत्पादन में सबसे ज्यादा होता है। यह है गेहूं की फ्लैग लीफ, जिसे हम झंडा पत्ती भी कहते हैं। अगर आप सच में गेहूं की पैदावार बढ़ाना चाहते हैं, तो इस पत्ती को समझना और इसकी सही देखभाल करना बहुत जरूरी है।
गेहूं के पौधे में नीचे से ऊपर तक कई पत्तियां निकलती हैं। लेकिन जो सबसे ऊपर की अंतिम पत्ती होती है और जिसके ठीक नीचे से बाली निकलती है, उसे फ्लैग लीफ कहा जाता है। यह झंडे की तरह ऊपर लहराती हुई दिखाई देती है, इसलिए इसे झंडा पत्ती कहा जाता है। यह पत्ती बाली के सबसे पास होती है और दानों के भराव में सबसे अधिक योगदान देती है।
जब गेहूं में बाली निकलती है, तब उसके अंदर परागण और निषेचन की प्रक्रिया होती है। इसके बाद दाना बनना शुरू होता है। दानों को भरने के लिए लगातार भोजन की जरूरत होती है। यह भोजन पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया से बनता है। पत्तियों में मौजूद क्लोरोफिल सूर्य की रोशनी की मदद से कार्बोहाइड्रेट बनाता है। यही कार्बोहाइड्रेट बाद में दानों तक पहुंचता है और उन्हें भरता है।
नीचे की पत्तियां भी भोजन बनाती हैं, लेकिन वे अपने विकास और रखरखाव के लिए उसका बड़ा हिस्सा खुद उपयोग कर लेती हैं। ऊपर की पत्तियां, खासकर झंडा पत्ती, बाली के बहुत नजदीक होती हैं। इसलिए जो भोजन यह बनाती है, वह तुरंत और अधिक मात्रा में दानों तक पहुंच जाता है। दूरी कम होने के कारण भोजन का परिवहन तेज और प्रभावी होता है। यही कारण है कि झंडा पत्ती का योगदान गेहूं के कुल उत्पादन में सबसे अधिक माना जाता है।
अक्सर किसान यह देखते हैं कि फसल ऊपर से हरी दिख रही है, पौधा अच्छा बढ़ा हुआ है, लेकिन बाली छोटी रह जाती है या दाना पतला निकलता है। इसका एक बड़ा कारण यह होता है कि झंडा पत्ती समय से पहले पीली पड़ जाती है या छोटी रह जाती है। यदि यह पत्ती कमजोर हो जाए तो प्रकाश संश्लेषण कम हो जाता है और दानों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप दाना हल्का, सिकुड़ा हुआ और कम वजन का रह जाता है।
झंडा पत्ती को लंबे समय तक हरा और स्वस्थ बनाए रखना उत्पादन बढ़ाने की कुंजी है। इसके लिए संतुलित पोषण प्रबंधन बहुत जरूरी है। नाइट्रोजन पत्ती को हरा बनाए रखने और क्लोरोफिल निर्माण में मदद करती है। यदि नाइट्रोजन की कमी होगी तो पत्ती जल्दी पीली पड़ जाएगी। दूसरी ओर पोटेशियम भोजन के परिवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि पोटेशियम की कमी होगी तो भले ही भोजन बन जाए, वह सही मात्रा में दानों तक नहीं पहुंच पाएगा।
दूधिया अवस्था के आसपास यदि झंडा पत्ती में पीलापन दिखाई दे या वह कमजोर लग रही हो तो जी-पोटाश 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ खेत में स्प्रे किया जा सकता है। यह छिड़काव शाम के समय करना बेहतर रहता है। इससे नाइट्रोजन पत्ती को हरा बनाए रखती है और पोटेशियम भोजन को दानों तक पहुंचाने में सहायता करता है। यदि खेत में पहले से नाइट्रोजन पर्याप्त है लेकिन पोटेशियम की कमी का संदेह है, तो जी पोटाश का जरूरी छिड़काव करें।
इसके साथ-साथ यह भी जरूरी है कि झंडा पत्ती पर किसी प्रकार का रोग या कीट प्रकोप न होने दें। पत्ती झुलसा, रतुआ या कीटों के हमले से पत्ती जल्दी खराब हो सकती है। इसलिए समय पर उचित फफूंदनाशी या कीटनाशी का प्रयोग करें। सिंचाई का भी संतुलित प्रबंधन करें, ताकि पौधा तनाव में न आए। अधिक या कम पानी दोनों ही स्थिति में पत्ती की कार्यक्षमता प्रभावित होती है।
अंत में यही समझें कि गेहूं की झंडा पत्ती ही बाली की असली ताकत है। यह जितने अधिक समय तक हरी, चौड़ी और स्वस्थ रहेगी, उतना ही अच्छा दानों का भराव होगा और उत्पादन बढ़ेगा। खेत में जाकर झंडा पत्ती की स्थिति जरूर देखें और आवश्यकता अनुसार तुरंत पोषण व संरक्षण के उपाय करें।
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